विश्लेषक नहीं मानेंगे, पर चुनाव में चुपचाप काम कर रहा था हिन्दू आक्रोश

डरा हुआ कौन है?

जवाब में, क्या सच सुनना चाहेंगे?

कटु सत्य यह है कि, जाने अनजाने ही सही, लेकिन देश का आम हिन्दू अंदर से डरा हुआ है।

सूचना के युग में देश-दुनिया से मिलने वाली खबरें उसे भयभीत कर रही हैं।

उस के मन में अपने अस्तित्व को लेकर चिंता है।

वो अपने परिवार, विशेषकर बहन बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

और उसका डर अकारण नहीं।

वो देश में वर्ग विशेष के जनसंख्या विस्फोट से भयभीत है।

वो देश में तेज़ी से चल रहे धर्म-परिवर्तन के षड्यंत्रों को जानते ही असहज हो जाता है।

वो इन सब की धार्मिक कट्टरता को देखकर आशंकित है।

वो अकेला है, असंगठित है और जानता है कि आक्रामकता उसका स्वभाव नहीं, इसलिए वो सामने वाले के हर तरह के उन्माद से बचने का प्रयास करता है।

वो जब देखता-सुनता है कि पीड़ित होने पर भी उसे कभी कोई राजनैतिक धार्मिक व शासकीय संरक्षण नहीं मिलता तो वो हर पल भय में जीता है।

ऐसे में भी जब मीडिया और समाज के बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे प्राप्त नहीं होता तो वो ठगा महसूस करता है।

ऊपर से उसे जब हर वक्त बहुसंख्यक होने के ताने मारे जाते हैं, उस पर असहिष्णु होने का आरोप मढ़ा जाता है तो वो बेचैन हो जाता है।

और अंत में वो ऐसे अनगिनत कारणों से अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करता है।

यही असुरक्षा की भावना एक स्तर के बाद आक्रोश में परिवर्तित हो जाती है।

यह आक्रोश समय के साथ बढ़ता जा रहा है।

चूंकि वो मूल रूप से शांतिप्रिय है, यही कारण है जो उसका आक्रोश, हर चुनाव में, एक अंडर करेंट का काम कर रहा है।

यह दिखाई नहीं देता मगर यह सदियों से है।

चुनावी विश्लेषक इसे स्वीकार नहीं करेंगे मगर इसने 2019 चुनाव में भी अपना काम चुपचाप किया है।

जब भी जितना भी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण होगा उतना ही यह करेंट तीव्र होगा।

जो फिर चुनाव के नतीजों को अपने पक्ष में करेगा।

इसी करेंट ने कभी उत्तरप्रदेश, बिहार में काम किया था, आजकल बंगाल में कर रहा है और आज नहीं तो कल केरल और तमिलनाडु में करेगा।

और किसी क्षेत्र में अगर यह करेंट लम्बे समय तक काम नहीं कर रहा तो समझ जाइये कि वो क्षेत्र नया कश्मीर बन चुका है।

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