अहंकार चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का- आत्मघाती ही होता है

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मज़बूत विपक्ष का होना सबसे आवश्यक है। विपक्ष के अभाव में सत्ता-पक्ष की स्थिति बेलगाम घोड़े-सी हो जाती है। राजनीति को कल्याणकारी और रचनात्मक बनाए रखने में सत्ता-पक्ष से अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका विपक्ष की होती है।

क्या यह संभव होता दिख रहा है, क्या मज़बूत विपक्ष के आसार हैं?

निश्चित हैं। इसकी शरुआत विपक्षी नेताओं के गंभीर एवं ईमानदार आत्म-चिंतन से होती है। यदि सर्वेक्षणों को सच मानें तो एक बार फिर मोदी सरकार बनने जा रही है। ख़ैर, जिसकी भी बने, उसे सबको साथ में लेकर चलना चाहिए और जिसकी न बन पाए उसे ईमानदारी से पराजय स्वीकार करनी चाहिए।

ईमानदारी से पराजय स्वीकार करने का अभिप्राय हार के सही कारणों का चिंतन-विश्लेषण करना है। इस विश्लेषण और आत्मचिंतन के लिए सबसे पहले विभिन्न दलों को ईवीएम का रोना बंद करना चाहिए। चुनाव-आयोग ने अनेक बार ईवीएम के दुरुपयोग की संभावनाओं को ख़ारिज किया है।

इन्हीं ईवीएम के बल पर दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में गैर-भाजपा सरकारें बनीं। जब आप जीतें तो ईवीएम सही और हारें तो ग़लत, यह तर्क गले नहीं उतरता। बल्कि ऐसा कर आप लोकतंत्र पर चोट कर रहे हैं, लोकतंत्र के प्रति आम आदमी की आस्था से खेल रहे हैं। मत भूलिए कि आज आप विपक्ष में हैं, कल सत्ता में होंगें। क्या तब भी आपका यही एप्रोच रहेगा?

दूसरा, 2014 के बाद से ही नरेंद्र मोदी को जिताने वाले मतदाता वर्ग को ‘भक्त’ संबोधित करने का जो चलन बढ़ा, उसका निहितार्थ मोदी में विश्वास प्रकट करने वाले वर्ग की समझ को कमतर और न करने वाले को प्रबुद्ध दर्शाना है।

सत्ता-सुख के लिए उसके गलियारों में लंबे समय से चक्कर लगाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उछाले गए इस शब्द में तमाम राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्त्ता फँसते चले गए। यह लोकतांत्रिक परिपाटी नहीं है कि आप हार से इस प्रकार खीझें कि मतदाताओं को ही भला-बुरा कहने लगें।

आप किसी एक उम्मीदवार के हार-जीत में अन्यान्य कारणों को भले ही ढूँढ सकते हैं, पर पूरे देश से आए रुझान-परिणाम को कैसे ग़लत ठहरा सकते हैं? हाँ, आप उससे असहमत हो सकते हैं, उसके कारणों की मीमांसा कर सकते हैं।

जिसने सत्तारूढ़ पार्टी को वोट दिया और जिसने विपक्षी पार्टियों को वोट किया- आख़िर हैं तो दोनों इसी देश के नागरिक। अपने ही नागरिकों की निंदा में लग जाना, सबको विजयी पार्टी का पंजीकृत कार्यकर्त्ता या एजेंट मान लेना- उतावलेपन का द्योतक है। अच्छी नीयत, नीतियों और निर्णयों से धुर-से-धुर विरोधियों का भी दिल जीता जा सकता है।

किसी एक या दो चुनाव-परिणामों से दल विशेष की सभी संभावनाएँ ख़त्म नहीं हो जातीं, जनता के बीच जाएँ, उनके मुद्दों को समझें, उन्हें सड़क से लेकर सदन तक उठाएँ, उनसे क्लोज़ कनेक्ट करें, उनके सुख-दुःख में साथ खड़े हों तो हारी हुई बाज़ी भी जीती जा सकती है। पर इस देश में व्याप्त लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था को भगवान के लिए चोट न पहुँचाएँ।

याद रखिए, बहानों और बयानों को जनता ख़ूब समझती है, उसकी समझ को कम समझने की भूल बहुत महँगी पड़ सकती है। इसलिए जो भी विपक्ष में रहे, उसे सरकार गठन के तुरंत बाद से ही 2024 के लिए ईमानदार पहल और प्रयास प्रारंभ कर देना चाहिए। सत्ता-पक्ष का हिसाब जनता उसे बेदख़ल कर स्वयंमेव चुकता कर लिया करती है। अहंकार चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का- आत्मघाती ही होता है।

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