लड़ाई का नया लेवल – ‘कंपनी पॉलिसी’

कुछ किस्से सुनाई दिये हैं जहां कुछ राष्ट्रवादी, हिन्दुत्ववादी युवाओं को लगभग किसी नौकरी में फाइनलाइज़ होने के बाद, उनकी फेसबुक प्रोफाइल देखकर रिजेक्ट किया गया है। ये किस्से यहाँ के हैं, विदेशों में यह अब नया नहीं है, वहाँ तो ये स्थापित बात है।

कुछ दिनों पहले मैंने Roosh Valizadeh नाम के एक अमेरिका स्थित दक्षिणपंथी का उल्लेख किया था और उसके साथ उनके लेख The Resistance Pyramid की लिंक भी दी थी जहां किस तरह से दक्षिणपंथियों के पेट पर लात मारने का काम होता है और किस तरह उसका प्रतिकार संभव है उसपर विस्तार से लिखा गया था।

(जिसे इंटरेस्ट हो वो Roosh Valizadeh > The Resistance Pyramid गूगल करें, मिल जाएगा। मैं लिंक नहीं देनेवाला, कृपया इतना तो कष्ट करें। लिंक मांगनेवाले से बाद में कभी चर्चा करें तो 99% यही पता चलता है कि उसने पढ़ा ही नहीं है)

अस्तु, मूल मुद्दे पर आते हैं – फेसबुक प्रोफाइल देखकर अगर इंटरव्यू में रिजेक्ट कर सकते हैं तो चलती नौकरी में भी प्रताड़ित कर के नौकरी छोड़ने को बाध्य कर सकते हैं या फिर फर्जी कारणों से निकाला जा सकता है।

न्याय की इनकी व्याख्या हमेशा एकतरफा होती है, और आप के मुंह पर केवल दो शब्द फेंके जाएँगे – कंपनी पॉलिसी। इसपर कोई इलाज नहीं होता क्योंकि इन दो शब्दों से लड़ने का किसी के पास न हौसला होता है, न पैसा और न समय। दूसरी नौकरी भी तो चाहिए, वहाँ आप का यह पूर्व एम्प्लायर का रिफ्रेन्स दिक्कत दे सकता है। इसलिए चुप्पी विवशता हो जाती है।

हम कितना भी चाहें, अभी तक अपना इको सिस्टम बना नहीं है और न ही किसी को कुछ करने में रस है। मोदी ये नहीं कर सकते, उनका पद ही इसमें सब से बड़ी बाधा है। जो संगठन हैं वे ऐसा कोई उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। होता है, नब्बे साल गुजारे आदमी से कितनी फुर्ती की अपेक्षा रखेंगे? अस्तु, बात भटक रही है इसलिए मूल मुद्दे की तरफ लौटते हैं।

राष्ट्रवादियों के लिए यह अधिक काम की बात होगी कि वे अपनी आईडी का नाम बदले, और फोटो में चमकना चमकाना बंद करें। प्रसिद्ध लोगों के साथ सेल्फ़ियाँ लेना बंद करें और स्वयं अगर उभर रहे हैं तो अन्यों को अपने साथ सेल्फ़ियाँ लेने से नम्रतापूर्वक मना कर दें। आप की आय पर लात पडे तो ये केवल सहानुभूति ही दे सकते हैं।

नौकरी के लिए अप्लाई कर रहे हैं तो या तो एक अलग ID रखिए जहां आप केवल एक साधारण व्यक्ति हैं जो पिकनिक के फोटो, गुड मॉर्निंग गुड नाइट करनेवाला फेसबुकिया दिखें, यह बेहतर होगा। क्योंकि मोबाइल में फेसबुक अगर रहेगा और देखने को मांगा तो दिक्कत हो सकती है।

ऑफिस के दिये किसी भी डिवाइस – PC, लैपटाप, टैब या मोबाइल से फेसबुक या WA या कोई भी सोशल मीडिया का प्रयोग न करें। कंपनियाँ भले ही आँख मूँदती हो, लेकिन नियमों में इसके प्रति कोई वर्जनाएँ होती हैं जिसका जब चाहे आप के विरुद्ध उपयोग किया जा सकता है।

आदर्शवाद अच्छा है लेकिन आदर्शवादी होने से मूर्खता की छूट नहीं मिलती। सपोर्ट सिस्टम है नहीं, तो प्रैक्टिकल रहें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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