बड़ी लकीर खींचनी चाहिये

Brand Gandhi को उठाकर कूडे में फेंकना अव्यावहारिक है, उन्हें यथावत रहने दीजिये, अपनी जगह वे काम के हैं।

असल में तो उनका अध्ययन कर के काम की चीज़ें भी निकल आयेंगी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि गांधी के प्रति समाज का दृष्टिकोण इतना दूषित हो चुका है कि उनका अभ्यास करने के लिए युवा निकल आना असंभव सा लगता है ।

आज गांधी के लिये जो एक सार्वत्रिक घृणा सी है वह उनके मुस्लिमों प्रति पक्षपात की अति के कारण है। उनकी विक्षिप्त ज़िद ने भारत का जो दीर्घकालीन नुकसान किया उसके कारण है। इसके साथ साथ, अपने फायदे के लिए काँग्रेस ने उनके इस पक्षपात को भी उनकी महानता बताये रखा, यह भी एक कारण है।

लेकिन इसके इतर, सनातन की एकता के लिए उन्होंने जो प्रयास किए थे उनको आगे चालू रखना तथा उनपर कुछ काम करना काँग्रेस ने फायदे की बात नहीं समझी, बल्कि बहुसंख्यकों को अधिकाधिक विभाजित करते रहना ही काँग्रेस की नीति रही।

डिवाइड एंड रूल – फूट डालो राज करो की अंग्रेज़ नीति के वारिस काँग्रेसी ही रहे। जातिवाद का आरोप लगाते रहे लेकिन जातिवाद को बढ़ावा देकर समाज में दरारें बढ़ाने की नीतियाँ देखें या उसके लिये जिम्मेदार नेता तथा उनके प्रशासन में बैठे अधिकारियों के नाम देखे जाएँ तो काँग्रेसियों को मुंह छिपाने को जगह नहीं बचेगी।

वैसे भी, उनकी जातियों की बात नहीं कर रहा हूँ कि क्या निकलेंगी, बाकी जो नाम निकलेंगे अपनी कहानी स्वयं कहेंगे।

अस्तु, गांधी की बात करते हैं, या उससे भी आगे बढ़कर, ब्रांड गांधी की। Gene Sharp की लिखी Gandhi as a Political Strategist इस पुस्तक का अध्ययन होना चाहिये ऐसा मेरा मानना है।

जीन शार्प स्वयं एक बड़े पॉलिटिकल रणनीतिकार थे जिन्हें भारत में कम लोग जानते हैं। लेकिन उससे उनका महत्व कम नहीं होता। विद्रोह के महागुरु थे। Albert Einstein Institute गूगल करें, वहाँ फ्री का (और वह भी काम का) माल भी बहुत मिलेगा। अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार डाउनलोड कर के पढ़ें, क्षमता विकसित होती जायेगी।

संक्षेप में, “थोथा देई उडाय” वाला अभिगम रखा तो भी गांधी, ‘एम के गांधी’ से ‘काम के गांधी’ बनाये जा सकते हैं। शुरू करते हैं गांधी निंदा को बंद कर के। जितनी निंदा करेंगे उतना उनका प्रभाव बढ़ता जायेगा।

बात ही न करें, उकसाये जाने पर भी अनदेखी करें, काम करें तो उनके काम के मूल्यों पर। और कोई अपने फायदे के लिए उनकी विक्षिप्तता को ही महानता बनाये रखने में मानता है तो जूता तो होगा ही आप के पाँवों में?

अब आते हैं बड़ी लकीर पर।

बड़ी लकीर के लिए भारतीयता की त्रिमूर्ति के रूप में, मैं सावरकर, आंबेडकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम प्रस्तुत करता हूँ।

और असल में तो अपने आचरण से मोदी जी ने भी खुला संकेत दे ही दिया है कि इन तीनों का उनसे कोई विरोध नहीं होगा। वैसे इनका विरोध कौन करेंगे और क्यों करेंगे यह पूरी तरह पता है लेकिन तब का तब देखा जायेगा।

वे दुकानें बंद होने चाहिए जो केवल आगजनी का सामान बेचती हैं। जनता अगर इन तीनों को राष्ट्रनिर्माण की त्रिमूर्ति स्थापित करे तो काफी काम हो सकता है।

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