यही है असली शक्ति या पावर का प्रदर्शन

प्रयागराज विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के अध्ययन के समय हंस मोर्गेंथाऊ की राष्ट्रों के मध्य राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विचारों के बारे में पढ़ाया गया था।

मोर्गेंथाऊ ने राष्ट्रीय शक्ति के तत्वों में किसी देश की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, औद्योगिक क्षमता, सैन्य तैयारियों, जनसँख्या, राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्रीय मनोबल, कूटनीति और सरकार की गुणवत्ता को माना है।

उन्होंने कूटनीति की गुणवत्ता को इन तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण माना। उन्होंने लिखा था कि राष्ट्र की कूटनीति इन विभिन्न तत्वों को जोड़ता है, उन्हें दिशा और वजन देता है, और राष्ट्र की शक्ति को जागृत करता है।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण मोर्गेंथाऊ की पावर या शक्ति की परिकल्पना है। वे मानते थे कि पावर के प्रयोग का मतलब यह है कि एक मनुष्य या राष्ट्र के द्वारा अन्य राष्ट्रों या मनुष्यों के मन और कार्यों पर नियंत्रण करना।

ध्यान दीजिये : पावर का अर्थ है राष्ट्रों या मनुष्यों के मन और कार्यों पर नियंत्रण करना, ना कि उन्हें सैन्य शक्ति द्वारा पराजित करना।

अब भारत की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, और जनसँख्या को कोई बदल नहीं सकता। औद्योगिक क्षमता और सैन्य तैयारियां विभिन्न सरकारों ने अठारह-उन्नीस की होगी और प्रधानमंत्री मोदी उसे इक्कीस-बाइस पर ले आये। लेकिन राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्रीय मनोबल, कूटनीति और सरकार की गुणवत्ता को मज़बूत दिशा देने के मामले में पिछली सभी सरकारों से कई गुना आगे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद उस आतंकी देश की सेना, नेताओं और जनता के मन और कार्यों पर भारत का नियंत्रण हो गया है।

इस हद तक कि वह देश एक ऐसे देश की गोद में जाकर बैठ गया है जहाँ पर एक समुदाय विशेष को प्रताड़ित किया जा रहा है, उन्हें त्यौहार नहीं मनाने दिया जाता, व्रत रखने नहीं दिया जाता।

उस आतंकी देश ने अपने सबसे घनिष्ठ और पुराने देश – अमेरिका – से दुश्मनी मोल ली, उसके समाचारपत्रों और टीवी न्यूज़ में हर दिन भारत के बारे में चर्चा होती है, सभी पड़ोसी देशों से अनबन हो गयी है, हर समय वह खौफ में जीता है कि कब सर्जिकल स्ट्राइक हो जाए, उस देश की कूटनीति का सारा समय इस बात पर व्यतीत होता है कि उसे भारत से कहीं कुछ नुकसान ना हो जाए, उसकी आर्मी का फोकस केवल भारत तक सीमित है। यहाँ तक कि भारत के डर से उसने उड़ानों के लिए अपना एयर स्पेस तीन महीनो से बंद कर रखा है।

ऐसी नीति का परिणाम यह हुआ कि आतंकी देश दिवालिया हो चुका है। इस देश की अर्थव्यवस्था इतनी दयनीय हो चुकी है कि यह अपने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए उधार ले रहा है। यानि कि खर्च का ही पैसा नहीं निकल पा रहा और उधार पर ब्याज अभी देना बाकी है; मूल धन चुकाने की बात ही भूल जाइये।

एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने उस देश का वह हाल कर दिया है कि वहां अब लोकतंत्र कई वर्षो तक पनप नहीं सकता, राष्ट्र भीख का कटोरा लेकर खड़ा है, मुद्रा की हालत नेपाल, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से भी बदतर हो गयी है – भारत से तो तुलना ही नहीं है।

वे आर्मी और कठमुल्लों की छत्र-छाया में रहने को विवश है, उनकी आर्मी के सारे हथियार अब एक देश से आ रहे है, उनका एक-एक कार्य भारत को नज़र में रखकर होता है। और तो और, अपनी अर्थव्यवस्था को भी उस देश ने एक अन्य देश को एक तरह से गिरवी रख दिया है।

दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री मोदी उस देश को नॉर्थ कोरिया बनने की तरफ धकेल रहे है।

एक तरह से, प्रधानमंत्री मोदी ने उस आतंकी देश का राष्ट्रीय चरित्र और मनोबल, कूटनीति और सरकारी तंत्र को ध्वस्त कर दिया है, यह भी तब जब उस देश के पास ‘बम’ है।

अब आतंकी देश दिवालिया हो गया है, इसपर हम प्रसन्न तो हो सकते है, लेकिन यह विचार का मुद्दा नहीं होना चाहिए।

मुद्दा यह होना चाहिए कि क्या भारत उस आतंकी देश और उसके निवासियों के मन और कार्यों पर नियंत्रण कर रहा है?

उत्तर है : “हाँ”।

यही है असली पावर या शक्ति का प्रदर्शन।

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