कुकरहांव : आतंक और आतंकवादी

भारतीय इंटेलेक्चुअलिज़्म एक पागलपन के दौर से गुजर रहा है।

कमल हासन नामक एक अभिनेता ने कुछ बोल दिया और कुकरहांव मच गया।

दोनों तरफ से कुकरहांव मचा हुआ है।

यही हमेशा तुम करते आये हो।

विभाजन के असली अपराधी ब्रिटिश थे।

उन्होंने यह कृत्य एक नीति के तहत किया था।

सुरक्षित बहिर्गमन (safe exit) चाहिए था उन्हें देश से।

क्योंकि सुभाष चन्द्र बोस के द्वारा किया गया आक्रमण ब्रिटिश दस्युओं की समाधि बनाता भारत की धरती पर।

भारतीय नौसैनिक विद्रोह करने के लिए कमर कस कर तैयार थे।

ऐसे में अंग्रेज़ निकलते किधर से?

उन्होंने ब्रिटिश संसद से प्रस्ताव पारित करवा कर अपने safe exit के लिए भारत को विभक्त करने की चाल चली। ताकि तुम लड़ मरो और वे सुरक्षित निकल जाएं।

वही किया उन्होंने। उस योजना के सहयोगी थे जिन्ना, नेहरू और पटेल। इनके पास उस प्रस्ताव को स्वीकार करने का कारण भी था – सत्ता का लोभ।

गांधी ने तो साफ बोला कि – He is a spent bullet. कोई उनकी सुन नहीं रहा था। उनकी उपयोगिता खत्म हो चुकी थी। कई केजरीवाल पैदा हो चुके थे। ये दूसरी बात है कि 60 सालों में केजरीवालों का भी स्तर समय के साथ गिरा है।

वरना जिस प्रदेश से सुभाषचन्द्र बोस और श्री अरबिन्दो जन्मते हैं, उस प्रदेश की मुखिया ममता बनर्जी जैसी औरत न होती। लेकिन तब लोकतंत्र न था। जनता के हाथ बंधे थे। जनता वही कर सकती थी जो गोडसे ने किया।

लेकिन बलिदान गांधी को होना पड़ा।

आपत्तिकाल में और आवेश में लिए गए सारे निर्णय विवेकपूर्ण नहीं हो सकते। वह निर्णय गांधी का हो या गोडसे का।

लेकिन असली अपराधियों को भारतीय इंटेलेक्चुअल्स ने आज तक निशाने पर नहीं लिया।

कारण – ये एलियंस और मूर्ख पिछलग्गू हैं।

न इनको इतिहास का ज्ञान है और न ही घटनाओं का।

ये राग द्वेष से ग्रस्त सम्मोहित लोग हैं।

समग्र दृष्टि का अभाव है।

वरना एक फिल्म अभिनेता को इतना महत्व न देते।

इनके अंदर यदि विवेक होता तो पहले पूछते कि आतंक क्या होता है?

यदि किसी व्यक्ति की कोई हत्या इसलिए कर देता है कि वह उसे किसी घटना का उत्तरदायी समझता है तो वह आतंक नहीं है। और न ही वह आतंकवादी।

आतंकवादी उनकी हत्या करता है जिनको वह जानता भी नहीं है, न उसकी कोई उससे व्यक्तिगत दुश्मनी होती है, किसी भी कारण से। वह हत्या इसलिये करता है कि उसको मृत्यु के बाद जन्नत की तमन्ना होती है। और हत्या किसकी करनी है यह तय वह करता है, जिसने जन्नत भेजने की सुपारी दे रखी है।

मोटी मोटी बात भी बुद्धि में घुस जाय तो नैरेटिव बदल जाता है।

लेकिन कौन कहे कि राजा गइयाँ ढांप ल्यो?

टोटल इंटेलेक्चुअल बैंकरप्सी…

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