नि:संदेह गोडसे देशभक्त थे, यह कहने में शर्म कैसी? थे तो थे!

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मुझे ईमानदार नज़र आती हैं। सियासी फायदे नुकसान से बेपरवाह उन्होंने वो बोला जो उनके दिल में है।

जिस तरह से जिहादी, रोहिग्यां और पाकिस्तानपरस्त खुल कर याकूब मेमन के लिये एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते हैं, रात के दो बजे कोर्ट खुलवाते हैं, उस तरह से हिंदुओं में साहस क्यों नहीं उत्पन्न हो रहा? क्यों हीनभावना से भरे हुये हैं? क्या आत्मरक्षा के लिये भी आक्रामक नहीं होंगे?

साध्वी ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया तो सारे चैनल इसे विवादित बयान बताते हैं, यहां तक उनके अपने भी उनके साथ खडे नज़र नहीं आ रहे, क्यों? किसी व्यक्ति का हत्यारा देशभक्त नहीं हो सकता?

नाथूराम गोडसे ही नहीं, ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं जिन्होंने अतिवादिता में हथियार हाथ में उठाया। मगर इससे उनकी देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकते। हिटलर, मुसोलिनी भी देशभक्त थे। चन्द्रशेखर, भगतसिंह, रामप्रसाद विस्मिल, जोरावर बारहठ, अरविंदो घोष भी देशभक्त थे।

न्यू ज़ीलैंड का वो हमलावर जिसने अभी पचास से ज्यादा जानें लीं, वो भी एक देशभक्त है। म्यांमार का बौद्ध रक्षक संत भी देशभक्त है जो जिहादियों से अपने देश को बचाना चाहता है। श्रीलंका में भी अब जल्द कोई देशभक्त नज़र आने वाला है।

भारत की जेलों में बंद सभी कैदी देशभक्त हैं। उन्होंने निजी कारणों से किसी की हत्या की होगी मगर जब बात देश की आयेगी तो वो कैदी मर मिटेंगे। भारतीय अतिवादियों और अरबी जाहिलों में बस यही मूल अंतर है। पहले हमारे अंदर देशभक्ति का भाव अंग्रेज़ों ने पैदा किया था और आज ये जंगली हवसी।

नि:संदेह गोडसे देशभक्त थे। इस बात को बोलने में शर्म कैसी? थे तो थे! बोलिये, खुल कर बोलिये। प्रज्ञा का साथ दीजिये। सभी आतंकी ममता के साथ खडे हैं तो आपको प्रज्ञा के साथ खडे होने में डर क्यों लगता है? उन्हें मज़बूत कीजिये।

आगे आने वाले समय में हमें हर बेटी को प्रज्ञा बनाना पड़ेगा वरना हर घर में ध्रुव त्यागी, अमित सक्सेना और डॉ नारंग की लाश पड़ी होगी।

प्रज्ञा ठाकुर को माफी नहीं माँगना चाहिए थी। कोई ज़रूरत ही नहीं थी। खैर, प्रज्ञा जी आगे ध्यान रखें। सभी राष्ट्र प्रेमी प्रज्ञा ठाकुर के साथ हैं।

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