70 वर्षों से भयभीत क्यों हैं बुद्धिपिशाच?

अदालत के रिकॉर्ड में आज भी उस बयान की एक एक लाइन सुरक्षित है जिसमें नाथूराम गोडसे ने बहुत विस्तार से बताया था कि मैंने गांधी वध क्यों किया।

गांधी हत्याकांड के उस मुकदमे में दोनों पक्षों द्वारा की गई बहस का पूरा रिकॉर्ड भी कठोर गोपनीयता के आवरण में आज भी सुरक्षित है।

आज तक वो बयान, वो बहस देश के आम नागरिक के लिए सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

इस देश में फूलनदेवी, सुल्ताना डाकू यहां तक की दाऊद इब्राहिम, हाजी मस्तान सरीखे तस्करों, हत्यारों, अपराधियों तक को महानायक की तरह प्रस्तुत करनेवाली फिल्में बन सकती हैं तो न्यायालय द्वारा सत्यापित गांधी हत्याकांड का सच देश को बताने से 70 सालों तक उन बुद्धिपिशाचों ने परहेज क्यों किया जो इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े लठैत बनकर घूमते रहे, आज भी घूमते हैं।

130 करोड़ भारतीय किसी व्यक्ति के विषय में क्या सोचें, क्या नहीं सोचें… यह तय करने का अधिकार दिल्ली के राजनीतिक/ मीडियाई गलियारों में मंडराने वाले मुट्ठी भर बुद्धिपिशाचों को नहीं सौंपा जा सकता।

क्या नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या किसी धन सम्पत्ति, राजनीतिक लिप्सा/ महत्वाकांक्षा के तहत की थी? या भारत के किसी दुश्मन देश की साज़िश के अंग के रूप में की थी? या साम्प्रदायिक उन्माद के कारण की थी? या देशहित में की थी?

इसका फैसला उन अदालती दस्तावेज़ों को पढ़ने के पश्चात ही किया जा सकता है जो आज तक देश के समक्ष उजागर नहीं किये गए। ऐसी स्थिति में यह स्वभाविक है कि धारणाएं, मान्यताएं अफवाहें मनचाहे रूप में पैदा भी होंगी, जमकर पैर भी पसारेंगी।

अतः देश के समक्ष न्यायालय द्वारा सत्यापित वो दस्तावेज़ सार्वजनिक करिये। देश के सामने सच आने दीजिये। देश तय कर लेगा कि नाथूराम गोडसे देशद्रोही था, गद्दार था या देशभक्त था?

उपरोक्त सवालों से अधिक महत्वपूर्ण सवाल आज यह है कि गांधी हत्याकांड का वह कौन सा सच है जिसे सार्वजनिक करने का साहस बुद्धिपिशाच 70 वर्षों तक नहीं जुटा सके? ऐसा क्या है उस सच में जिससे 70 वर्षों से भयभीत हैं देश के बुद्धिपिशाच?

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