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nirbhaya shriddhanjali poem making india

आइए, मैं आपको फिल्म के कुछ सीन अलग-अलग एंगल से दिखाता हूं। इस फिल्मी सीन में दिल्ली की घटना के कुछ फैक्ट हैं, कुछ मेरे फैक्ट हैं, कुछ आपके फैक्ट हैं और कुछ फैक्ट इस देश में नपुंसक होती भीड़ के फैक्ट्स हैं ! कहीं न कहीं हम सब इसमें हैं औरत और मर्द !!

पहला सीन

दिल्ली के एक इलाके में माइग्रेन की शिकार बेटी को दवा दिलाकर एक व्यापारी बाप रात को वापस लौटता है। घर से चंद कदम पहले ही मुहल्लाई चौराहे पर कुछ टोपी छाप लफंगे रोजाना की तरह आज एक बीमार लड़की पर फब्तियां कसते हैं। उन्हें अगर ‘वो’ बीमार लड़की भी मिले, तो उसके बदन से कपड़ा नोच के वो उसे एन्जॉय करना चाहते हैं। फिर एन्जॉय करने के बाद उसके गुप्तांग में लोहा, सरिया, लकड़ी, पत्थर जो भी हाथ आए ठूंस देना चाहते हैं ताकि उनका किया पाप ढंक जाए। अगर तब भी कोई खतरा हो तो वह टेंटुआ दबाकर सबूत ही नष्ट कर दिया जाए !?

दूसरा सीन

बीमार लड़की का बाप बेटी को बचाते हुए समझदारी के साथ फब्तियों को नजरअंदाज कर घर की तरफ चल देता है। बेटी से कहता है तुम अंदर चलो, मैं आता हूं। थोड़ा सीन बदलता है, आज उस व्यापारी बाप के भीतर का हीरो जाग गया है, क्योंकि आज उन टोपी वाले लफंगों ने उसकी बेटी को छेड़ने की हिम्मत की है। इसके पहले वह दूसरी लड़कियों को रोजाना इसी तरह जलील होते देखता था, पर ये सोचकर कि खतरा मेरे घर थोड़ी आया है। वह मुंह फेरकर चुपचाप दुकान चल देता था और शाम को उस दिन की कमाई गिनकर खुशी-खुशी घर लौटता था।

तीसरा सीन

हीरो बना बाप बिना किसी को कुछ बताए, निहत्था चला आया है। खुद को रजनीकांत समझते हुए चार अनपढ़, जाहिल, मदरसों की पैदाइश के सामने खड़ा है। रात के साढ़े 11 बजे चौराहे पर सन्नाटा है। बाप- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को छेड़ने की। जवाब में एक चमचमाता हुआ लंबा सा चाकू एक लड़के के कमर से निकला और ‘घुप्प’ करके रजनीकांत बनके आए बाप के सीने में धंस गया। उसके बाद चाकू फिर निकला पेट में धंस गया। घुप्प-घुप्प निकलता और धंसता रहा चाकू। तब तक उन चार में एक लड़का दौड़कर अपने बाप, मां, जीजा, भाई और मुहल्ले के लोगों को बुला लाया। सबके हाथ में कोई न कोई घातक हथियार था। वजह जाने बिना उन्होंने भी रजनीकांत बनकर आए व्यापारी बाप पर ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया। हॉस्पिटल पहुंचने के पहले ही रजनीकांत का the end हो गया।

चौथा सीन

हीरो की तरह 4-4 विलेन को अकेले ठिकाने लगाने आए व्यापारी की सन्नाटे में गूंजती चीखें सुनकर कुछ लोगों ने खिड़की खोलकर बाहर देखा। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी बाहर निकलकर वह हत्यारों से भिड़ के एक आदमी को बचा ले। मुहल्ले के लोग सोच रहे थे बाजू वाला पहले दरवाजा खोलकर बाहर आए, तब मैं भी सोचूंगा। वैसे ही, जैसा यह व्यापारी बाप दूसरों की लड़कियों को जलील होता देख सोचता था कि खतरा मेरे घर थोड़ी आया है, जो मैं दूसरे के लिए पंगा लूँ। अपना धंधा खराब करूँ ?

पांचवा सीन

घटना घट चुकी है। बेटी का बाप बेरहमी से मारा गया है। बाप को बचाने आया बेटा मरणासन्न हॉस्पिटल में पड़ा है। अर्थी के पास दिल्ली के कुछ लोग शोक मनाने एकत्रित हैं। मुहल्ले के वे लोग भी छुपे छुपे खड़े हैं, जिन्होंने खिड़की की दरारों से सारा वाकया देखा था। न्यूज़ चैनल वाले सरकार, कानून और मर चुकी दिल्ली को चीख-चीख कर कोस रहे हैं। एंकर और रिपोर्टर मरने वाले के पड़ोसियों को ऐसे ‘नपुंसक’ साबित करने में लगे हैं। मानो इनके पड़ोस में ऐसी कोई घटना होती तो आज बेटी का बाप जिंदा होता और मर्चुरी में उन चारों बदमाशों की लाशें पड़ी होती ! लेकिन मजे की बात है न तो कोई रिपोर्टर अपराधियों का मजहब पहचान पा रहा है न कोई एंकर !! वजह है हमारा सेकुलर ढांचा। यदि इसका उल्टा होता तो अभी तक हिन्दू धर्म का पोस्ट मार्टम हो चुका होता। जावेद अख्तर इस पर शोक गीत लिख चुके होते और टॉपलेस स्वरा भास्कर अपने स्तनों को एक तख्ती से ढंकी होती जिस पर लिखा होता “असहिष्णुता”

छठवां सीन

इस सीन में मेरी एंट्री है, आपकी एंट्री है, दिल्ली और देश के लोगों की एंट्री है। (थोड़ा फ़्लैश बैक) मैं वही ‘नपुंसक’ हूँ जिसने अपने घर की खिड़की के दरारों से एक आदमी को मरते देखा है। इसके पहले भी मैं यही करता रहा हूं, आगे भी यही करता रहूंगा लेकिन समाज में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए पुलिस और सरकार को गाली देना नहीं भूलता। आखिर, मेरे भी अस्तित्व का सवाल जो ठहरा? जैसा उस लड़की का बाप करता था, जो अब मर गया ! उसे लगता था, खतरा मेरे घर तक नहीं आया है। जैसे मुझे लगता है, जैसे आपको लगता है !? आज उस अर्थी को देखने के लिए तमाशबीनों की भीड़ उमड़ी हुई है, उसी भीड़ में मैं भी खड़ा हूं सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए। मेरी तरह आप भी भीड़ में दबे-छुपे खड़े हैं ये सोचकर कि कोई चैनल वाला हमसे ‘आंखों देखा हाल’ न पूछ लें उस रात की। और खामखां हम पुलिस के चक्कर में पड़ जाएं। हाँ, पुलिस को गाली देना मेरा काम है, आपका काम है पर उनकी मदद करना हमारा काम नहीं है। क्योंकि हम तो नपुंसक हैं।

सातवां सीन

मैं नपुंसक क्यों हूं? एक औरत का कोई बीच सड़क पर चीरहरण करता है तो मैं जड़ क्यों हो जाता हूं। आगे बढ़कर उसे बचाता क्यों नहीं ? मेरा दिमाग तब तेजी से क्या सोचता है या मैंने क्या पहले से सोच रखा है कि मैं क्यों दूसरे के पचड़े में पडूं। हाँ, मैंने सोच लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए मैं दूसरों के पचड़े में नहीं पडूंगा। क्योंकि मेरे ऊपर औरतों ने 3 झूठे केस लगाए हैं। मेरे साफ सुथरे जीवन में दोषी होने का झूठा दाग लगाया है औरतों ने। 9 साल से अलग-अलग शहरों में कोर्ट के चक्कर लगा रहा हूं उसके लिए जो मैं कभी था ही नहीं। मेरा पूरा परिवार कोर्ट के चक्कर लगा रहा है। जज और वकील ने हमको इस तरह ‘पेंट’ कर दिया है जैसे हम इस देश में सम्मान से जीने के हकदार नहीं हैं ! वकील और कोर्ट के बाबुओं को लगता है हम उनकी रिश्वतखोरी का स्रोत हैं। तारीख देने के लिए भी वह पैसा लेता है। 26 सालों की करियर बनाने की मेहनत मिट्टी हो चुकी है। हर महीने दो-दो तीन-तीन तारीखों में एक शहर से दूसरे शहर भागते हुए जो कुछ था, अब खत्म हो चुका है और 9 साल बाद केस इस स्टेज पे आ खड़ा हुआ, जहां झूठा केस दर्ज कराने वाली एक औरत 10 लाख रुपए देने पर केस वापस लेने की बात कह रही है तो दूसरी औरत 25 लाख रुपए नकद और मुम्बई का 2bhk फ्लेट हड़पकर हमें केसों से मुक्त करने की बात कर रही है। और ये दोनों औरतें कोई और नहीं वो हैं जिन्हें हमने आदर्शवादी बनते हुए बिना दहेज के स्वीकारा था। अपना घर सौंपा था। अपनी इज्जत सौंपी थी। उसके साथ सुनहरे भविष्य का सपना देखते हुए क्षमता से ज्यादा मेहनत कर वस्तुएं जोड़ने में लगा था। लेकिन सब मिट्टी में मिल गया।

आठवाँ सीन

मैंने कहा न जब त्यागी को मारा जा रहा था, मैं वहीं था बंद खिड़की के पीछे दरारो में आंख गड़ाए। मैं क्यों दरवाजा खोलकर बाहर आता हीरो बनने के लिए ? ताकि फिर कोर्ट के नए चक्कर में फंसने के लिए। पहले की अदालती तारीखें कम है जो एक और तारीख बांध लूं गले, हर महीने !? माफ कीजिए साहब, अब मैं त्यागी से ज्यादा समझदार हो गया हूं। कोई मेरी बेटी को छेड़ेगा तो मैं रजनीकांत नहीं बनूँगा। उस इलाके को छोड़कर किसी सुरक्षित जगह चला जाऊंगा। वहां भी अगर कोई आलम, जहांगीर मेरी बेटी को छेड़ेगा तो दूसरी कोई सुरक्षित जगह तलाश लूंगा। न, न, मुझे उपदेश मत दीजिए- बताइये तो डेढ़-दो लाख मुसलमानों में से कुछ हजार टोपी वालों ने 40 साल पहले कश्मीर में पोस्टर चिपका दिया कि गैरमुसलमानों तुम्हारे पास 3 दिन का टाइम है वादी छोड़कर भाग जाओ। नहीं तो उसके बाद कि सुबह का सूरज नहीं देख पाओगे। और साढ़े 5 लाख हिन्दू सिखों ने सामान पैक करना शुरू कर दिया और ठीक चौथे दिन उनके घरों में बिना मूंछ की दाढ़ी, जालीदार टोपी वाले मासूम लोग अपनी कामयाबी पर अल्लाह का शुक्रिया अता फरमा रहे थे। और आप चाहते हैं मैं पहलवानी दिखाऊँ?

नवाँ सीन

अरे महोदय, आप भी तो नपुंसक हैं। आपने भी तो त्यागी को मरते हुए देखा है। मेरी तरह आप भी त्यागी को रोजाना नमस्कार करते थे। आप दरवाजा खोलकर पहले बाहर क्यों नहीं आए? जैसे आप चाहते थे कि मैं पहले बाहर निकलूँ वैसे ही तो मैं भी चाहता था आप पहले बाहर निकलो। क्या कह रहे हैं आप- मुझे 9 साल से कोर्ट का चक्कर लगाते देख आप मेरी तरह कोर्ट-कचहरी और पुलिस के पचड़े में फंसना नहीं चाहते। हम्म्म्म…. हाँ, ठीक ही तो कह रहे हैं। आप तो दो कदम आगे सोचते हैं, जिंदगी में इतनी जिम्मेदारियां है कि मुझे तो ‘अखबार’ तक पढ़ने का वक्त नहीं मिलता! टीवी पर न्यूज़ तक देख नहीं पाता। इसलिए देश में क्या चल रहा है पता ही नहीं। बस, मैं तो आंख-कान-नाक से मिलते-जुलते लोगों को वोट कर आता हूं। टैक्स भर देता हूं अब ये गो टैक्स लेने वाले कि जिम्मेदारी है वह देश को कैसे चलाता है ? हाँ कोई ‘चोर-चोर’ चिल्लाए तो Mtv में करीना को पतली कमर हिलाते हुए देखके मैं भी चोर-चोर चिल्ला देता हूँ। बस……

दसवां सीन

छुट्टी का दिन है आज। अभी बाजार से लौटी पड़ोसी की बेटी ने अपने पिता को बताया कि जब वो अपनी सहेलियों के साथ लौट रही थी, तब जमानत पर छूटे त्यागी के हत्यारों आलम, जहांगीर और उसके उन्हीं नाबालिक दोस्तों ने पहले उन पर फब्तियां कसी। फिर एक ने चुनरी खींचकर हवा में उछाल दिया। सभी ठहाके लगा रहे थे। दूसरे ने सहेली का हाथ पकड़ उसे कसकर जकड़ लिया और हमें इधर-उधर हाथ लगाया। जो लोग देख रहे थे उन्होंने हमें बचाया तक नहीं। किसी तरह हम बचकर वहां से चले आए। पड़ोसी लड़की का बाप त्यागी की तरह बेवकूफी नहीं करना चाहता था। उसने चुपचाप शहर के बाहर मुहल्ले के लोगों की मीटिंग बुलाई। उनमें से कई लोगों ने अपने परिचितों को भी उस मीटिंग में बुला लिया। क्या औरतें और क्या आदमी, सभी वहां पहुंचे। जिनको कुर्सी नहीं मिली वह वापस नहीं लौटे। डटे रहे। वहां एक फैसला हुआ। सब अपने घरों को लौट गए।

क्लाइमेक्स

वही चौराहा है। सुबह के साढ़े 11 बजे हैं फिर भी इलाके में सन्नाटा है। आलम, जहांगीर अपने और दोस्तों के साथ शिकार आने का इतंजार कर रहे हैं। उन्हें आश्चर्य हो रहा है आज कोई नहीं दिख रही जिसे छेड़ सके। तभी मुहल्ले के बाहर की कोई लड़की आती दिखी। पर्ची हाथ में- भैया ये एड्रेस जरा बता दीजिए।

आलम- दिखाओ तो जरा। और उसने चुनरी खींचकर हवा में लहर दिया। दूसरे ने हाथ पकड़ा और अपनी तरफ लड़की को खींचने ही वाला था कि पड़ोस से एक व्यक्ति चीखता हुआ बाहर निकला, बहुत हो गया आलम। अब ये सब यहां नहीं चलेगा। लड़की का हाथ छोड़ जहांगीर। और वह जैसे ही लड़की को बचाने उसकी तरफ गया। आलम ने चमचमाता हुआ लंबा सा चाकू फिर निकाल लिया, और एक नाबालिग घर की तरफ दौड़ा। तभी एक लाठी उसके सिर पर पड़ी। आलम जमीन पर तड़प रहा था। सैकड़ों लोग उन्हें घेर कर पीट रहे थे और चिल्लाए जा रहे थे। अब बस…. हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। तब तक आलम की मां, बहन, जीजा, भाई, मामा और उसके पड़ोसी चाकू, तलवार लेकर आ पहुंचे। लोगों ने उन्हें भी घेर लिया। थोड़ी ही देर में मीटिंग में लिया गया “फैसला” अंजाम तक पहुंचा दिया गया। उसी वक्त वही जज साहब वहां से गुजर रहे थे, जिन्होंने त्यागी के हत्यारों को जमानत दी थी। ये केस भी उन्हीं की अदालत में पहुंचा और उन्होंने अपने फैसले में इस घटना को ‘नेचुरल जस्टिस’ बताया और कहा कि जितने लोग भीड़ के हाथों मारे गए हैं उन्हें प्रशासन अनजान जगह पर दफना दे, ताकि भविष्य में वहां कोई मजार न बने और किसी की धार्मिक भावना आहत न हो।

– मनोज शराफ

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