इस गद्दाफी को भी जाना होगा

यह बंगाल है, भद्रलोक रहते हैं यहां। लेकिन लोकसभा चुनाव के छह चरणों में हमने जो देखा वह बिलकुल मध्ययुगीन अरबिस्तानी बर्बरता का नमूना है। इस बर्बरता के हरावल दस्ते की भूमिका में वही अरबिस्तानी हैं।

बंगाल के हिंदुओं की हालत वैसी ही है जैसे लीबिया के शहर बेनगाज़ी में फंसे लोगों की थी। गद्दाफी की फौज ने शहर को घेर रखा था और धमकी दी जा रही थी कि अगर आवाज़ उठाई तो एक भी ज़िंदा नहीं रहेगा।

बंगाल में अब इंच-इंच का बदला लेने की धमकी दी जा रही है। हम जानते हैं कि किसे लक्षित है। वोट देने पर पीटा जा रहा है, मस्जिदों से हिंदुओं को गांव छोड़ने की धमकी दी जा रही है।

यह जो हो रहा है, नया कुछ नहीं है। बंगाल के भद्रलोक स्लीपवॉकर हैं, वे नींद में चलने वाली बीमारी के शिकार हैं और उनकी झुंड की नेता नींद में उन्हें एक गहरी खाई की ओर हांक कर ले जा रही है।

पहले कम्युनिस्टों और फिर विद्रूप चेहरे तथा कर्कश भाषा की स्वामिनी ने बंगाल को आम हिंदुओं के लिए गुलाग में तब्दील किया है। गुलाग, मतलब वो यातना शिविर जहां स्टालिन कैदियों को खटाता था और यातनाएं देता था और इसी दौरान उनका ब्रेनवॉश भी किया जाता था, साम्यवाद और स्टालिन की महिमा का बखान करके। बंगाल भी गुलाग ही है। यह गुलाग उन मानसिक गुलामों का है जो ब्रेनवाश का शिकार हो चुके हैं।

पॉलिटिकल करेक्टनेस और जुमलों की जकड़ में आकंठ डूबे भद्रलोक के लिए खेल के नियम तय हैं। इनके लिए पीड़ित सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय ही होता है। बाकी बहुसंख्या पर अगर अत्याचार होते हैं तो वह किसी भी हाल में खबर नहीं बननी चाहिए। यदि बन गई तो लेडी स्टालिन का डंडा है जो कोई मुरव्वत नहीं करेगा। डंडे के ज़ोर से बनी पॉलिटिकल करेक्टनेस इस तरह चलती है :

“दादा प्लीज़ आओ और हमें बचा लो। वो हमारे घर जला रहे हैं। क्या आप सुन सकते हैं, बम फटने की आवाज़।”

अमूमन ये पत्रकार होते हैं जो अपने संपर्कों को फोन करते हैं। पर ये गुलाग के पीड़ित हिंदू थे जो फोन कर-कर के पत्रकारों को बता रहे थे। वाकया पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के धूलागढ़ का है जहां मुसलमानों की भीड़ ने हिंदुओं पर हमला बोल दिया था।

पत्रकारों ने ये तो माना कि उनके पास व्हाट्सएप, वीडियो और फोन आए थे लेकिन वे इस बात को लेकर दुविधा में थे कि कहीं इस तरह की खबरें करना गैरज़िम्मेदाराना तो नहीं होगा, लिहाज़ा कुछ नहीं किया। चूंकि यह सांप्रदायिक मामला है इसलिए इसकी रिपोर्टिंग में सतर्कता बरतनी होगी ताकि मामला और न भड़क जाए।

तब उस समय ज़ी न्यूज के मुख्य संपादक सुधीर चौधरी ने एक कार्यक्रम में इस पर चर्चा की। लेकिन इससे नाराज़ होकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चौधरी और ज़ी न्यूज की रिपोर्टर पूजा मेहता और कैमरामैन तन्मय चटर्जी के खिलाफ दंगे भड़काने की कोशिश सहित कई गैरजमानती धाराओं में एफआईआर दर्ज करा दिया।

इसके बाद स्थानीय रिपोर्टर जब मौके पर पहुंचे तो पाया कि ममता की पुलिस सबूत मिटाने के प्रयास में वहां फूंके गए घरों व दुकानों के मलबे हटा रही थी। और घटना के 15 दिन बाद ममता से इसके बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “पत्रकारों को शर्म आनी चाहिए। कुछ भी नहीं हुआ था (धूलागढ़ में)।”

यही हाल मालदा के कालियाचक में भी हुआ। वहां बीएसएफ के काफिले पर मुसलमानों ने हमला किया और घंटों तक कस्बे में कोहराम मचाया। ममता बनर्जी ने कहा, यह कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं बल्कि बीएसएफ और प्रदर्शकारियों के बीच ‘स्थानीय झगड़ा’ था।

वही ममता, चुनाव में तृणमूली गुंडों पर सुरक्षाबलों की फायरिंग में एक शांतिदूत के घायल होने पर कहती है कि मोदी की फोर्स ने गोली चलाई और हमारे एक मुसलमान भाई को गोली लगी।

बंगाल में आज जो हो रहा है वह बस यही दिखाता है कि गुलाग के हिंदू जाग गए हैं। अब वो तृणमूली और वामपंथी गिरोहों द्वारा हांके जाने को तैयार नहीं है। जल्द ही इन तृणमूली गुंडों को बंगाल की जनता हांकेगी। शिकारी जब खुद शिकार होने लगेंगे तब वो खुद भी जय श्री राम के नारे लगाएंगे।

बंगाल में फिलहाल हिंसा का दौर थमने वाला नहीं और इसे थमना भी क्यों चाहिए। अभी तो अंगड़ाई है। गुलाग के विद्रोह की सफलता ही बंगाल के स्वर्णिम भविष्य की राह खोलेगी। गुलाग की जनता जाग गई है और इस गद्दाफी को जाना ही होगा।

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