हत्यारों के चमचों चाटुकारों को देश कभी नहीं स्वीकारता

जून 1977 से मई 2011, लगातार 34 वर्षों तक कम्युनिस्टों ने पश्चिम बंगाल में एकछत्र राज किया था।

वह राज कितना भयावह था यह इसी से समझा जा सकता है कि अपने कुकर्मों को दबाने छुपाने की कला में माहिर कम्युनिस्टों की सरकार के दस्तावेज़ भी यह बताते हैं कि उन 34 वर्षों के दौरान बंगाल में लगभग 35 हज़ार राजनीतिक हत्याएं हुईं थीं।

हालांकि स्वतन्त्र पर्यवेक्षकों और मीडियाई रिपोर्टों के अनुसार उस दौरान की गई राजनीतिक हत्याओं का आंकड़ा लगभग 55 हज़ार था।

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि 1997 तक बंगाल में कम्युनिस्ट राजनीति की एकमात्र विरोधी काँग्रेस ही हुआ करती थी। अतः ज़ाहिर है कि बंगाल की उस हिंसक राजनीति का सर्वाधिक शिकार उसके ही कार्यकर्ता हुए थे।

1997 में काँग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने नया राजनीतिक दल बना लिया था। उस समय तक बंगाल की राजनीति में भाजपा की उपस्थिति नगण्य हुआ करती थी।

आज़ादी के 51 वर्ष पश्चात 1998 में हुए लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को पहली बार एक सीट पर विजय मिली थी। वह विजय भी तृणमूल काँग्रेस के साथ गठबंधन के कारण ही सम्भव हो सकी थी।

शेष भारत में जहां भाजपा सशक्त थी वहां उसकी मुख्य प्रतिद्वंदी काँग्रेस हुआ करती थी। उन क्षेत्रों में कम्युनिस्टों का कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं था। लेकिन इसके बावजूद पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की खूनी राजनीति का शिकार बन रहे काँग्रेसी कार्यकर्ताओं की निर्मम नृशंस हत्याओं का जबरदस्त विरोध अटल जी और लालकृष्ण आडवाणी समेत भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता संसद से सड़क तक करता था।

संसद की कार्रवाई से सम्बंधित दस्तावेजों में भाजपाई दिग्गजों के ऐसे सैकड़ों भाषण दर्ज हैं जिसमें उन्होंने बंगाल में कम्युनिस्टों की हत्यारी राजनीति के खिलाफ जमकर अपनी आवाज़ बुलंद की है। ऐसा करते समय अपनी मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंदी काँग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की उन्होंने हमेशा उपेक्षा और अनदेखी की।

किन्तु आज बंगाल में टीएमसी के गुंडों द्वारा की जा रही भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं की राजनीति को राहुल गांधी समेत पूरा काँग्रेसी नेतृत्व जिस तरह चुप्पी साधकर टीएमसी की हत्यारी राजनीति को अपना मौन अपरोक्ष समर्थन जितनी निर्लज्जता के साथ दे रहा है वह शर्मनाक तो है ही साथ ही साथ यह भी बता रहा है कि बंगाल के साथ ही साथ शेष देश से भी अपने राजनीतिक सफाए की कगार पर क्यों पहुंच चुकी है काँग्रेस।

ध्यान रहे कि हत्यारों के चमचों चाटुकारों को देश कभी नहीं स्वीकारता।

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