यह एक व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता की नहीं, पूरे समाज की जिजीविषा की परीक्षा है

नेतृत्व के क्या क्या कॉम्पोनेन्ट होते हैं?

अपने आसपास जितने भी प्रभावशाली व्यक्तित्वों को देखता हूँ और जितने भी ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के आंकलन का प्रयास करता हूँ तो मुझे नेतृत्व के पाँच मुख्य कॉम्पोनेन्ट पहचान में आते हैं।

  1. संगठन क्षमता
  2. प्रशासनिक क्षमता
  3. राजनीतिक दाँव-पेंच
  4. संवाद करने की क्षमता
  5. बौद्धिक क्षमता

नेतृत्व के रोल में स्वीकार्य होने के लिए नेता को इन गुणों में से एक या दो में असाधारण होना चाहिए, और बाकी गुणों में एक न्यूनतम स्तर का होना चाहिए।

सामान्यतः भारतीय संदर्भ में जो लोग अपने दम पर नेता के रूप में स्थापित होते हैं उनमें पहला, तीसरा और चौथा गुण पाया जाता है। जो अच्छे संगठनकर्ता और ठीकठाक वक्ता होते हैं, उनकी स्वीकार्यता होती है। पर उनके बीच जिनमें अच्छी प्रशासनिक क्षमता भी होती है उनकी कीमत बहुत होती है।

वर्तमान सरकार में नितिन गडकरी और अरुण जेटली इस श्रेणी में आते हैं जो बहुत अधिक जनाधार नहीं होने पर भी विशुद्ध रूप से उनकी प्रशासनिक क्षमता की वजह से सरकार में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए। जेटली ने तो एक समय में तीन तीन महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले।

पिछली पीढ़ी के नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी विलक्षण थे। उपरोक्त सभी गुणों के साथ साथ उनका बौद्धिक स्तर दूसरे किसी भी नेता से कई हाथ ऊँचा था, पर शुद्ध राजनीतिक दाँव-पेंच में उनकी नैतिकता आड़े आ जाती थी। इस गुण की कमी को उनके समय में प्रमोद महाजन पूरा किया करते थे।

प्रधानमंत्री मोदी असाधारण हैं। उनमें ये पहले चारों गुण विलक्षण मात्रा में हैं। और पाँचवे में भी वे शेष भाजपा नेतृत्व से बेहतर हैं… पर इतिहास में अपने स्थान के लिए वे विश्व इतिहास के जिन व्यक्तित्वों से स्पर्धा में हैं उस लीग में मैं उन्हें औसत ही मानूँगा।

इस सदी के नेतृत्व में पुतिन और जिनपिंग बेहद सफल हैं, पर मोदी कुल मिला कर उन पर व्यक्तिगत रूप से बीस ही पड़ते हैं, उन्नीस नहीं। पर मोदी के सामने जो चुनौतियाँ हैं वे भी असाधारण हैं और इसलिए उनकी तुलना उन नेताओं से करनी होगी जिन्होंने उस स्तर की चुनौतियों का सामना किया।

इस दृष्टि से मैं नाम लेना चाहूँगा इंग्लिश इतिहास में चर्चिल और थैचर, अमेरिकन इतिहास में रूज़वेल्ट, निक्सन और रेगन, इज़रायली डेविड बेन गुरियन, चीनी जो एन लाई और देंग सियाओ पिंग और मेरे फेवरेट सिंगापुर के ली कुआन यू।

इन सारे नामों की तुलना में मोदी बौद्धिक रूप से थोड़े हल्के साबित होते हैं, जबकि उनके सामने जो चुनौती है वह एक एक्सिस्टनशिएल क्राइसिस है। उनके निर्णयों पर निर्भर करता है कि हम एक सभ्यता के रूप में सर्वाइव करेंगे या नहीं। ऐसे में समाज के बुद्धिजीवियों का दायित्व है कि वे उन विषयों और समस्याओं की ओर मोदी का ध्यान आकर्षित करें जो संभव है कि उनके निशाने पर नहीं हों।

कोई भी परफेक्ट नहीं होता। गलतियाँ निकालने वाले धोनी की बैटिंग तकनीक में बीस गलतियाँ निकालते हैं, पर काम की बात यह है कि उसकी तकनीक चाहे द्रविड़ की तरह परफेक्ट ना हो, पर काम पड़ने पर उसने मैच जिताये हैं। तो मोदी के प्रशंसक और आलोचक भी मोदी को उसी रूप में लें। प्रशंसक स्वीकार करें कि मोदी परफेक्ट नहीं हैं, आलोचक भी स्वीकार करें कि उपलब्ध नेतृत्व में मोदी सर्वश्रेष्ठ हैं।

और इतिहास के इस मोड़ पर यह एक व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता की परीक्षा मात्र नहीं है, पूरे समाज की जिजीविषा की परीक्षा है। इस बात की परीक्षा है कि हम अपने अहम और अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर कलेक्टिवेली सोच सकते हैं या नहीं।

समाज के सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना है। 23 मई का दिन अभूतपूर्व विजय देगा। यह एक और मोमेंटम देगा जैसा 2014 में मिला था। पर 2014 का मोमेंटम हमने गँवा दिया।

नरेंद्र मोदी भी लुटियन्स की दुनिया में नए थे। हम भी मोदीनामा में खोए थे… कब टुकड़े टुकड़े गैंग हावी हो गया, यह समझ ही नहीं पाए। इस बार वह गलती ना हो। हम सभी संगठित रूप से अपनी अपेक्षाएँ मोदी जी तक पहुँचाएँ। यह स्वर मोदीजी के समर्थकों और हिंदुत्व के समर्पित कार्यकर्ताओं की साझा आवाज़ बने।

मोदी जी विश्राम नहीं करते। अभी इस समय वे सिर्फ चुनाव प्रचार ही नहीं कर रहे, अपनी अगली सरकार का एजेंडा भी तय कर रहे हैं। और अगर मोदी सोशल मीडिया की पल्स पर थोड़ी भी नज़र रखते हैं तो उनतक अपनी आवाज़ पहुँचाने का समय अभी और आज है।

आप सबसे अनुरोध है, अपनी अपेक्षाएँ संयमित पर सुदृढ़ स्वर में सामने रखें। अपने स्पष्ट विचार #WhatNext और #येकामअभीबाकीहैं हैशटैग के साथ सोशल मीडिया में रखें। हम लड़ेंगे, जीतेंगे, जिएंगे… और आवश्यकता होगी तो अपनों के सामने भी लड़ेंगे… जैसे गणेश जी, शंकर जी के सामने अड़े थे और गजानन बने थे।

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