क्या आरोपी का मज़हब तय करता है मीडिया और सेलेब्रिटीज़ की मुखरता या मौन?

दिल्ली में परिवार की बेटी से हुई छेड़खानी का विरोध परिवार को भाड़ी पर गया। पश्चिमी दिल्ली के मोतीनगर में बसई दारापुर इलाके में बीते शनिवार देर रात इलाज करवाकर पिता और भाई के साथ आ रही लड़की पर कुछ लड़कों ने सीटियां बजाई व फब्तियाँ कसी, जिसका विरोध पिता ने किया। विरोध करने पर पिता की हत्या कर दी गयी, और उसके भाई पर भी जानलेवा हमला किया गया, जिससे वह अभी पास के ही अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है।

दुःखद बात यह भी है कि पीड़ित परिवार उस इलाके में बरसों से रह रहा था और वारदात के समय काफी लोग भी मौजूद थे मगर बीचबचाव करने या पीड़ितों का साथ देने भी कोई नहीं आया।

इसे जान का डर ही कहें या पुलिस जाँच से बचने का डर, मगर लोगों ने बीचबचाव नहीं किया, जिससे लड़की के पिता को बेरहमी से हत्या कर दी गयी। हमला करने वालों में 4 लड़के थे, जिनमें से दो पीड़ितों के पड़ोसी ही बताये जा रहे हैं। उनके अलावा 2 नाबालिग इस हमले में शामिल हैं। चारों की गिरफ़्तारी हो चुकी है। मुख्य हत्यारे मोहम्मद आलम और ज़हीर खान हैं।

इस बेरहम घटना के बाद बड़े मीडिया घरानों में चुप्पी यह बताती है कि मुस्लिम समाज को खुश करने के लिए किस प्रकार से उन्हें सवालों से वंचित रखा जाता है। वहीं शनिवार की इस घटना को दो दिन बीत चुके हैं लेकिन किसी बड़ी हस्ती द्वारा इसका विरोध किया जाना उन्हें भी सवालों के घेरे में लाता है कि क्या वे भी मुस्लिम तुष्टिकरण करते हैं?

जम्मू कश्मीर के कठुआ में एक बच्ची से बलात्कार के बाद जिस प्रकार से देश में हिन्दू धर्म की आस्था और संस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खड़े होने लगे थे, वह आज मुस्लिम आस्थाओं के विरुद्ध नहीं हो रहा; ऐसे में बड़े मीडिया घराने व नामचीन हस्तियों की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

बहरहाल दिल्ली शहर में डर इस तरीके से फैला है कि अपनी बहू बेटी की रक्षा करने भी परिवार का सदस्य नहीं जा सकता। हर बार पुलिस और सरकार से उम्मीद करने वाला समाज ज़िम्मेदारी से बच निकलने की कोशिश करता है, जबकि समाज में बुरे लोगों के ख़िलाफ़ खड़े होने की ज़िम्मेदारी समाज की भी होनी चाहिए।

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