वो दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था

कमाल की बात ये है कि कुछ लोग इतने जबर्दस्त आशावादी नज़रों से राहुल गांधी को देखते हैं, जितनी तो उनकी मम्मी नहीं देखती होंगी।

रवीश कुमार को राहुल गांधी ने हाल ही में एक इंटरव्यू दिया, और उसमें उन्होंने ठीक ठाक तरीके से पहली बार अपनी बात रखी।

ये वही राहुल गांधी हैं, जिनका पहला इंटरव्यू अर्णब गोस्वामी ने लिया था, और सुनने, पढ़ने में आया था कि बिचारे तख्तियां देख कर उत्तर बोलते, तिस पर भी अपनी बेइज्जती करा बैठे थे।

अबकी बार इंटरव्यू ठीक ठाक गया है। “लोकतंत्र असुरक्षित है ” वाला गैंग अब खुशियों से लबरेज़ है। राहुल गांधी ने इंटरव्यू अच्छा दिया है। चलिए, बहुत अच्छी बात है और जान के अच्छा लगा।

जिस परिवार से भारत वर्ष को तीन घोषित प्रधानमंत्री और एक अघोषित परन्तु लगभग प्रधानमंत्री मिले हों, उस परिवार का चिराग अब भाषण और इंटरव्यू देना सीख गया है।

तवलीन सिंह ने अपनी पुस्तक दरबार में राहुल जी के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के बारे में काफी चीजें कही है, जिसको आज हम आज के राहुल युग से जोड़ सकते हैं।

1975 के इमरजेंसी के बाद संजय गांधी को सत्ता के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा। उस वक़्त राजीव गांधी जी इंडियन एयरलाइन्स में एक पायलेट थे।

उनकी दोस्ती की दुनिया सीमित लोगो की थी, जिसमें बड़े बिजनेसमैन और कुछ अति विशिष्ट लोगों की टोलियां शामिल थीं। राजीव का रहन सहन, उनके तौर तरीके बिल्कुल अभिजात वर्गीय थे। उन्हें देहात में बसते भारत की बिल्कुल भी समझ नहीं थी।

तवलीन जी आगे बताती हैं कि उस वक़्त उनसे अगर कोई कहता कि एक दिन राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे, तो शायद वो ठठा के हंस पड़तीं। तवलीन जी के अनुसार, राजीव जी के पास जो बहुमत की ताकत थी, और उस दौर में जो हालात थे, अगर राजीव जी ने चाहा होता तो आज देश की हालत कुछ और होती।

कुछ इसी तरह आज अगर कोई ये कहे कि भविष्य में राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो कुछ लोगों को छोड़ कर बाकी लोगों के चेहरे पर थोड़ी हंसी तो दिख ही जाएगी।

ज़्यादा ज्ञान है नहीं मुझे राजनीति और उसके इतिहास का, लेकिन मुझे यही लगता है कि जिस तरीके से राजीव जी को पीएम बनाया गया, हो सकता है कि राहुल गांधी का भी महिमामंडन कर के उन्हें भी “महान प्रधानमंत्री” बनवा दिया जाए। (अलग बात है राहुल जी मौका ही ज्यादा नहीं देते हैं ) ।

आज कल बुद्धिजीवियों और सत्ता पक्ष के विरोधियों का सबसे बड़ा डर है “भारतीय लोकतंत्र पर मंडराते खतरे के बादल”\ और ठीक उसी समय ये लोग राहुल गांधी के एक इंटरव्यू ठीक दे देने पर खुश हुए जा रहे हैं \। कांग्रेस और उसके समर्थक तथाकथित खतरे में पड़े लोकतंत्र को बचाने के लिए जब राहुल गांधी जैसे योद्धा को आगे भेजते हैं, तो लोकतंत्र का भी सीना दर्द के मारे कराह उठता होगा।

क्या पूरे विपक्ष में एक ढंग का नेता नहीं बचा, जिसको हम आज के दौर में लोकतंत्र बचाने को आगे भेजें? क्या विपक्ष की औकात राहुल गांधी तक की रह गई हैं?

राजीव गांधी के ज़माने में सेक्युलरिज्म, लोकतांत्रिक संस्थाएं और सौहार्द कहने सुनने तक की बातें थीं। उस ज़माने में 64 करोड़ के घोटाले बोफोर्स में राजीव जी की संलिप्तता पाई गई।

शाहबानो प्रकरण में संसद में कांग्रेस के प्रचण्ड बहुमत का दुरुपयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के उल्टा विधेयक पारित करवा लिया।

बड़ा पेड़ गिरता, और धरती थरथरा उठती थी।

और हाय रे राजीव गांधी जी का लोकतांत्रिक शासन, जिसमें अपने देश के सैकड़ों मासूमों के कातिल एंडरसन को भगा दिया जाता था।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में तो राजीव सरकार एक कदम आगे थी। 1992 में टाइम्स ऑफ इण्डिया ने एक रपट प्रकाशित की जिसमें कहा गया था कि सोवियत संघ की गुप्तचर संस्था के जी बी ने राजीव को धन मुहैया कराया था।

धन्य है आज सोशल मीडिया, जिसके दम पर पिछली सरकारों में हुई चीजें खुल के सामने आने लगी हैं, और साथ ही साथ अब किसी को जबरदस्ती महान नहीं बनाया जा सकता। नहीं तो क्या पता आने वाले समयों में राहुल गांधी जी भी अच्छे इंटरव्यू देने वाले महान प्रधानमंत्री बना दिए गए होते।

मुझे नहीं पता कि आज कल लोकतंत्र खतरे में है भी या नहीं, पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलट देने का काम जो पार्टी कर चुकी हो, वो और उसके समर्थक अगर ये कहेंगे कि उन्हें लोकतंत्र बचाना है, तो मुझ जैसे लोगों को उन लोगों की सत्ता में वापिस आने की तीव्र लालसा भर दिखेगी।

विपक्ष को मान लेना चाहिए कि राहुल गांधी एक फूंके कारतूस हैं और अगर सच में विपक्ष को लोकतंत्र की फिकर है तो पहले एक बढ़िया नेता प्रोजेक्ट करे, जिसके पास एक क्लियर विज़न हो और बड़ी बात ये कि कंफ्यूज़ न होता हो।

दिन लद गए जब एक पायलट अचानक से प्रधानमंत्री बन जाता था और उसकी महानताओं के किस्सों से पूरा माहौल पाट दिया जाता था।

अब सोशल मीडिया है। लोगों का दिमाग खुल रहा है और आंखें सच देखने के लिए तत्पर।

अब समय है गंभीर और सकारात्मक राजनीति करने का, जिससे देश का भला हो।

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