एक कमज़ोर और सत्तालोलुप नेतृत्व का परिणाम आज भी भुगत रहा है भारत

यह लेख मैं अपने 80 वर्षीय पिताजी के आग्रह पर लिख रहा हूँ। विचार और शब्द दोनों उनके हैं।

पहली जनवरी 1947 को ब्रिटैन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने लार्ड माउंटबैटन को एक मीटिंग के लिए बुलाया। माउंटबैटन को यह भान था कि प्रधानमंत्री उनसे क्यों मिलना चाहते थे। भारत पर अंग्रेजी शासन दुश्वार होता जा रहा था और ब्रिटेन किसी तरह से भारत छोड़ना चाहता था।

एटली के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल भारत पर अंग्रेजी शासन बनाये रखने को प्रतिबद्ध थे। चर्चिल ने सार्वजानिक रूप से कहा था कि “मैं ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन की अध्यक्षता करने वाली सरकार का प्रधानमंत्री नहीं हो सकता।”

लेकिन एटली यह जिम्मेवारी माउंटबैटन को भारत का अंतिम वाइसराय नियुक्त कर के सौपना चाहते थे।

प्रधानमंत्री से मीटिंग के दौरान माउंटबैटन ने दो शर्ते रखीं, जिनमें से पहली हम भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण है।

माउंटबैटन ने कहा कि वह वाइसराय की नियुक्ति का ऑफर तब तक स्वीकार नहीं करेंगे, जब तक ब्रिटिश सरकार भारत की स्वतंत्रता की तिथि घोषित नहीं कर देती।

यानि कि माउंटबैटन भी अपने सर पर ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन का दाग नहीं लेना चाहते थे; न ही वह इतिहास में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्ज होना चाहते थे।

एटली ने आह भरते हुए माउंटबैटन की यह शर्त मान ली।

18 फ़रवरी 1947 को एटली ने अनाउंस कर दिया कि भारत को 30 जून 1948 के पहले स्वतंत्रता दे दी जायेगी और इस कार्य को संपन्न करने के लिए माउंटबैटन भारत के अंतिम वाइसराय नियुक्त किये जा रहे हैं।

यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है कि ब्रिटेन का कोई भी लीडर या अधिकारी ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन से अपना नाम नहीं जोड़ना चाहता था।

लेकिन जवाहरलाल नेहरू को ऐसी कोई चिंता नहीं थी। उन्हें प्रधानमंत्री बनने की इतनी जल्दी थी कि उन्होंने माउंटबैटन और भारत की जनता से कोई वार्ता किये बिना भारत के विभाजन पर सहमति जता दी और हस्ताक्षर कर दिए।

नेहरू के लिए आम भारतीय का कोई अस्तित्व ही नहीं था। अतः उन्होंने भारतीयों से परामर्श की आवश्यकता ही नहीं समझी।

अगर माउंटबैटन की तरह नेहरू भी राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत होते, तो वे विभाजन के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से मना कर देते।

चूंकि नेहरु विदेश में पले-बड़े और पढ़े थे, अतः उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए। जबकि महात्मा गाँधी ने यह कहा था कि भारत का विभाजन नहीं होगा और यदि होगा तो मेरी लाश पर होगा।

अगर विभाजन न हुआ होता, तो आज भारत विश्व की एक महाशक्ति होता।

जब माउंटबैटन उन्हें विभाजन के लिए मनाते, तब नेहरू भी अपनी कुछ शर्ते रख सकते थे। इनमें विभाजन पूर्व सीमा रेखा का निर्धारण, जनसँख्या का ट्रांसफर, करतारपुर साहिब का भारत में विलय और पाकिस्तान द्वारा युद्ध न करने की शर्ते प्रमुख हो सकती थी।

स्वतंत्रता के समय लगभग 15 लाख भारतीय बिना किसी अपराध के मौत के घाट उतार दिए गए। उनमे से अधिकाँश को यह पता ही नहीं था कि कौन सा भूभाग किस राष्ट्र के हिस्से में आएगा।

जहाँ ब्रिटिश नेतृत्व इस बात के प्रति जागरूक था कि ब्रिटिश साम्राज्य का विघटन नहीं होना चाहिए, वहीं नेहरू को भारत की अखंडता से कोई सरोकार नहीं था।

वह इतिहास में पहले प्रधानमंत्री के दर्जे से ही प्रसन्न थे, भले ही वह पद भारत के विभाजन और 15 लाख भारतीयों के खून के बाद मिला हो।

यही फर्क उस समय के ब्रिटिश नेतृत्व और भारतीय नेतृत्व में था।

ब्रिटिश नेतृत्व अपनी अखंडता को बनाए रखना चाहता था, जब कि नेहरु को राष्ट्र की अखंडता से कोई सरोकार नहीं था। भले ही भारत का विघटन हो जाए, उसके लिए उन्हें कोई पीड़ा नहीं थी।

वही गुण उनकी आने वाली पीढ़ियों – राहुल और प्रियंका – में भी दिखाई देता है जब वह JNU में भारत के टुकड़े करने वालो के समर्थन में खड़े हो जाते हैं।

नेहरु ने कश्मीर समस्या को इस तरह से उलझा दिया कि आज भी भारत उससे जूझ रहा है और अरबो-खरबों की धनराशि खर्च हो गयी और हो रही है।

स्वतंत्रता की प्रक्रिया के कुछ वर्षो के दौरान एक कमज़ोर और सत्ता लोलुप नेतृत्व का परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है।

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