पांच वर्ष में मोदी ने खड़ी कर दी कानूनी और गैरकानूनी धन के बीच दीवार

पहले धनी लोग अपने नंबर 2 के पैसे को मॉरिशस या साइप्रस ले जाते थे। वहां पर उन्हें टैक्स नहीं देना पड़ता था। फिर वह उस पैसे को शेल या कागज़ी कंपनियों के जरिए भारत ले आते थे।

उदाहरण के लिए, वे लोग किसी शेल कंपनी का शेयर मार्केट में उतारते थे और मॉरिशस या भारत से उस शेयर को कई गुना दामों में खरीद लेते थे। दिखाया जाता था कि शेल कंपनी को शेयर बेचने से भारी लाभ हुआ है और वह पैसा नंबर एक का हो जाता है।

दूसरा उदाहरण – भ्रष्ट लोग किसी वस्तु का दाम कई गुना बढ़ाकर विदेशों में निर्यात करते थे। आप मानिये कि उस वस्तु का एक्चुअल दाम 200 रूपए है लेकिन विदेश में बैठा व्यवसायी उस वस्तु का 5000 रुपए देने को तैयार है। आपको बैठे-बिठाए उस पर 4800 रुपए का फायदा हो गया।

मज़े की बात यह है कि भारत से निर्यात करने वाला और विदेश में उस वस्तु को खरीदने वाला व्यक्ति एक ही है। यहां से शेल कंपनी के द्वारा निर्यात किया, वहां पनामा या मॉरिशस में पंजीकृत शेल कम्पनी ने उसे आयात किया। और इस तरीके से फिर वह पैसा नंबर 1 का बन गया।

अब उनका काला धन, चाहे भारत में हो या विदेश में, फंसा हुआ हैं और वह धन व्यापारी और उद्योगपतियों की सहायता करने में असमर्थ है। अब तक 6.70 लाख कागज़ी कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया जा चुका है, या उनके बैंक अकाउंट फ्रीज़ या बंद कर दिए गए हैं।

वर्ष 2010-11 में इंजीनियरिंग कंपनियों ने 30 बिलियन डॉलर (1 लाख 32 हज़ार करोड़ रुपये) का निर्यात किया था, जबकि मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में पंजीकृत इंजीनियरिंग कंपनियों के द्वारा किया गया निर्यात केवल 1.8 बिलियन डॉलर (6100 करोड़ रुपये) था।

यह 28 बिलियन डॉलर (लगभग 1 लाख 23 हज़ार करोड़ रुपये) निर्यात कहां से हुआ और किस इंजीनियरिंग कंपनी ने किया? क्या यह संभव है कि 28 बिलियन डॉलर का निर्यात छोटी छोटी कंपनियां कर सकें जो मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में पंजीकृत ही नहीं हैं?

ऐसे हो गया 1 लाख 23 हज़ार करोड़ रुपये का ‘निर्यात’ या क्या काले धन का आगमन और पलायन! सिर्फ एक वर्ष में। वह भी सिर्फ एक क्षेत्र – इंजीनियरिंग – से।

लेकिन अब बड़े उद्योगपति और व्यवसायी जो प्रोजेक्ट चलाना चाहते थे, या निवेश करना चाहते थे या बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बनाना चाहते थे, उनके पास विदेशो में जमा काला धन भारत में लाने और भारत का धन गैरकानूनी तरीके से विदेश भेजने के रास्ते बंद हो गए हैं।

यह हुआ है प्रधानमंत्री मोदी के विज़न, क़ानूनी प्रक्रिया, पारदर्शिता और कठोर कार्रवाई से। तभी आप देख रहे हैं कि एक के बाद एक जमी हुई कंस्ट्रक्शन कंपनियां, एयरलाइन्स इत्यादि बंद हो रही हैं।

इसलिये राहुल और चिदंबरम चिल्ला रहे हैं। राहुल और प्रियंका ने स्वयं एक कागज़ी कंपनी – Backops – खोली थी जिसके विदेशी पार्टनर उलरिक मैकनाईट को भारतीय रक्षा सौदों का कॉन्ट्रैक्ट मिला।

चिदंबरम के परिवार के बारे में तो आप पढ़ ही रहे होंगे कि कैसे एक के बाद उनके पुत्र के विदेशों में 28 बैंक खातों, व्यवसाय और प्रॉपर्टी का पता चल चुका है जिसे उन्होंने छुपाया हुआ था।

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि प्रधानमंत्री ‘खानदान’ के ‘उत्तराधिकारियों’ ने राष्ट्र के रक्षा सौदों से धन ‘कमाने’ का धंधा खोल रखा था? वह भी तब जब उनकी माता जी की सरकार सत्ता में थी!

अंत में, फिर दोहरा रहा हूं कि प्रधानमंत्री मोदी भारत में जमे हुए, खानदानी भ्रष्ट लोगों का क्रियेटिव डिस्ट्रक्शन या रचनात्मक विनाश कर रहे हैं। इस कार्रवाई के बिना नए भारत की नींव नहीं पड़ सकती।

आप स्वयं सोचिए कि भारत के नवयुवक और नवयुवतियों को कैसे उद्यम लगाने का मौका मिलेगा, कैसे वह इन भ्रष्ट लोगों से कंपटीशन कर पाएंगे जब उनके पास पूंजी ही नहीं है? जबकि भ्रष्ट लोग विदेशों से जब चाहे काली पूंजी ला सकते थे।

प्रधानमंत्री मोदी की कार्रवाई से आने वाले भविष्य का रास्ता साफ हो रहा है और कोई भी व्यक्ति ईमानदारी और मेहनत के साथ अपना उद्यम लगा के इन लोगों से टक्कर ले सकता है।

मुझे भारत के नवयुवाओं और नवयुवतियों पर पूर्ण विश्वास है कि अगर उन्हें सही वातावरण मिले तो वे किसी टाटा, बिड़ला, सहारा, जुकरबर्ग, बिल गेट्स, टिम कुक, जेफ़ बेज़ोस से कम नहीं है।

बस दो फेज़ के चुनाव बचे हैं। अधिक से अधिक संख्या में घर से निकलिए और मतदान करके प्रधानमंत्री मोदी के विज़न को समर्थन दीजिये।

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