मोदी है तभी मुमकिन है

मैं एक नेता नहीं हूँ। मैं अगर भारत में चुनाव प्रचार कर रहा हूँ तो नेता की नहीं, जनता की हैसियत से कर रहा हूँ।

मैं भारतीय जनता पार्टी को और इसके नेतृत्व को अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त करने आया हूँ। इसकी विचारधारा के प्रति समर्पण व्यक्त करने आया हूँ। पर इसकी चरण वंदना करने नहीं आया हूँ। क्योंकि मेरा चरम समर्पण इस पार्टी के लिए नहीं, देश के लिए, राष्ट्र के लिए है। और राष्ट्र की आत्मा जिस भाव में बसती है, उस भाव के लिए… धर्म के लिए है।

पाँच साल पहले हम कहाँ थे? किन मुद्दों की बातें कर रहे थे? किन समस्याओं से जूझ रहे थे? और इन पाँच सालों में हमने कितना रास्ता तय किया है? उससे भी महत्वपूर्ण है, अपना रास्ता बदलने में कितनी सफलता पाई है?

पाँच साल पहले जो शब्द सबसे ज्यादा था जुबान पर वह था घोटाला। हज़ारों करोड़, बल्कि लाखों करोड़ों के घोटाले। तरह तरह के चुटकुले बनते थे, मीम बनते थे… A से Z तक घोटालों की लिस्ट बनती थी। पिछले पाँच सालों में कान घोटाले की खबर सुनने को तरस गए। उच्च सरकारी स्तर पर एक भी घोटाला नहीं हुआ। यह एक अकेली बात होनी चाहिए थी जो नरेंद्र मोदी को पुनः पूर्ण बहुमत के लिए काफी होनी चाहिए थी…

आज कोई भी महंगाई का नाम तक नहीं ले रहा। शायद यह भारत के इतिहास का पहला चुनाव होगा जिसमें महंगाई एक मुद्दा नहीं है। मैं 1977 से चुनावों को देख रहा हूँ। तब के नारे आजतक याद हैं – ‘खा गई चीनी, पी गई तेल… ये देखो इंदिरा का खेल’। मुझे याद नहीं कि ऐसा कोई चुनाव लड़ा गया हो आज तक जिसमें कोई महंगाई की बात उठा भी नहीं रहा। क्योंकि हर आवश्यक चीज के दाम लगभग स्थिर हैं या कम ही हुए हैं।

पाँच साल पहले की सरकार में किसी दिन अगर घोटाले की खबर नहीं होती थी तो उस दिन धमाके की खबर होती थी। बाज़ार में, मंदिरों में, बसों में, ट्रेन में… यह रोज़ की बात थी, दो चार लोगों के मरने की खबर भी नहीं बनती थी।

वहीं पिछले पाँच साल में आतंकी नेटवर्क की कमर लगभग टूट चली है। कश्मीर हो या बरेली-आज़मगढ़… आतंकियों की बत्ती गुल है। जैशे मोहम्मद का लीडर बनने को कोई तैयार नहीं है। हमारी सेनाएं रोज़ आतंकियों को ठोक रही हैं। कुछ दुखद घटनाएँ हुई हैं जिसमें अपने सैनिक भी मारे गए हैं… पर सिविलियन पॉपुलेशन को सुरक्षा देने में सरकार पूरी तरह सफल हुई है। और सेना पर हुए हमलों का दुश्मन के घर में घुस कर जवाब दिया गया है।

सरकार की सफलताओं की लिस्ट तो इतनी लंबी है कि वह तो आप अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं। कैसे गैस की लाइनें गायब हो गईं, कैसे घर पर पासपोर्ट बनकर आ जाता है। कैसे संपत्ति का रजिस्ट्रेशन आधार से लिंक हो जाने से बेनामी संपत्ति खरीदना असंभव हो गया है। जिनके पास दो नंबर के पैसे रहे भी हों, वो भी उसे हिला डुला नहीं सकते। कैसे टैक्स कलेक्शन efficient होने से टैक्स कलेक्शन बढ़ा और 5 लाख तक की आमदनी को इनकम टैक्स स्लैब से मुक्त करना संभव हुआ। कैसे गरीबों को 5 लाख तक के इलाज के लिए आयुष्मान भारत योजना मिली…

पर काम कितने भी हों, कम लगते हैं। लगने भी चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ ही लोकतंत्र को गतिमान बनाये रखती हैं। पर अब मैं कुछ काम ऐसे गिनाऊँगा जो नहीं हुए… पर होने चाहिए थे… और मोदी सरकार को वापस लाना है उनसे उन कामों को कराने के लिए… मोदी सरकार की सफलताएँ उन्हें दोबारा चुनने के लिए पर्याप्त कारण हैं। पर इसकी कुछ असफलताएं भी हैं जो इसे दोबारा चुनने के लिए उससे बड़ा कारण है।

देश में कुछ लोग और संस्थाएँ ऐसी देश विरोधी हरकतें कर रहे हैं, जिनका देश के प्रति कोई उत्तरदायित्व ही नहीं है। देश के कुछ उच्च शिक्षण संस्थाओं में कुछ कॉमरेड टाइप छात्र हमारे सैनिकों की हत्याओं का जश्न मनाते हैं। उनके इन जश्नों में उन संस्थाओं के प्रोफेसर भी शामिल होते हैं। वहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ के नारे लगते हैं…

और हमारी व्यवस्थाएं ऐसी हैं कि ऐसे देशद्रोहियों को जेल भेजना संभव नहीं हो पाता। उनके लिए वकीलों की फौजें खड़ी हो जाती हैं। उनके लिए ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स निकल के आ जाते हैं। उनसे सहानुभूति रखने वाले जज निकल आते हैं।

आज उनमें से एक देशद्रोही चुनाव लड़ रहा है और उसके लिए देश भर के टीवी पत्तलकार और बुद्धिजीवी जोर शोर से चुनाव प्रचार में लगे हैं। चुनाव तो वह नहीं ही जीतेगा, फिर भी देश के युवाओं को एक गलत संदेश तो जा ही रहा है कि कन्हैया बनकर सफल होने का, अमीर और प्रसिद्ध होने का रास्ता खुला है। देशद्रोह का यह रास्ता तिहाड़ को नहीं जाता, उन्हें किसी जंगल में, किसी गड्ढे में, किसी गंदे नाले में पड़ी लाश में नहीं बदलता, देशद्रोह को एक कैरियर बनाने की संभावनाएं जगाता है।

मोदी ने जो काम किये हैं अगर वे आपके लिए उन्हें वोट देने का पर्याप्त कारण नहीं हैं तो उन कामों की लिस्ट बनाइये जो मोदी ने नहीं किये हैं। अगर मोदी की सफलताएँ पर्याप्त नहीं हैं तो मोदी की असफलताओं को याद कीजिये। जो हुआ है यदि वह काफी नहीं है, तो जो होना है उसे याद कीजिये। और वह कोई करेगा तो वह मोदी ही है।

हमारी लड़ाई मोदी को जिताने पर खत्म नहीं होती, मोदी की जीत से शुरू होती है। हमें एक ऐसी सरकार बनानी है जिससे हम वह करवा सकें जिसमें हमारी जीत है। मोदी की सफलता में हमारे बच्चों के भविष्य का रास्ता खुलता है।

मोदी है तो मुमकिन है… इसमें कुछ शक हो सकता है पर इसमें कोई शक नहीं कि मोदी है तभी मुमकिन है।

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