क्या केजरीवाल बस एक और राजनेता ही हैं या…?

अरविंद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा चुनाव 2015 के दौरान जनता से लुभावने 70 वायदे किए थे। लेकिन पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर (पीपीआरसी) की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि दिल्ली सरकार 70 में से 67 वायदों को पूरा करने में नाकाम रही है।

यह खबर सच है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि हम अगर केजरीवाल को महज़ एक महत्वाकांक्षी राजनेता मानते हैं तो हमारी सब से बड़ी भूल है।

दिल्ली देश की राजधानी है।

आम दिल्लीवासी की सोच, आशाएँ, आकांक्षाएँ क्या हैं?

महत्वाकांक्षाओं के सामने नीतिमूल्य क्या हैं?

समाज में ‘मेरा क्या’, ‘मुझे क्या’ की भावना कितनी है?

स्वार्थ के सामने सही गलत की अहमियत कितनी है?

भ्रष्टाचार को समाजमान्यता (social sanction) कितनी है?

गलत के प्रति – क्यों लफड़ा मोल लेना, ये तो चलता ही है – वाली सोच कितनी है?

अगर दिल्लीवाले यह पूछना चाह रहे हैं कि क्या आप के यहाँ या अन्यत्र ऐसा नहीं है क्या, तो भारत में लगभग सभी जगह लोग ऐसा ही सोचते हैं, मगर देश की राजधानी दिल्ली है।

इन सभी बातों को समझकर केजरीवाल ने वादे किये।

पता उन्हें भी था कि कुछ पूरा नहीं होगा।

उनका असली वादा और इरादा एक ही था।

अवैध झुग्गियों को पक्का कर देना।

यह वादा कल्याणकारी था या नहीं, यह दिल्ली के करदाता मतदाता सोचें।

क्योंकि दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं होता, किसी न किसी को कीमत चुकानी पड़ती है।

सोचिए पक्के घरों की कीमत किसने चुकाई।

क्या वे करदाता बने हैं? क्या उनको सभी सुविधाएं उसी दर में मिलती हैं जो आप को मिलती हैं या आप उनको सस्ते में देने के लिए ज़्यादा चुका रहे हैं? या अगर ऐसा भी नहीं है तो यह पैसा कहाँ से आ रहा है?

कुल मिलाकर देश की राजधानी में ऐसे स्थान बने जो अब वैध हुए और उनका उपद्रवमूल्य (nuisance value) बढ़ गया।

देश की राजधानी में होते उपद्रव देश की छवि पर असर करते हैं।

सभी विदेशी दूतावास यहां हैं, सभी मंत्रालय यहाँ हैं।

और केजरीवाल समय समय पर निगम सफाई कर्मचारियों से पंगे लेते हैं, वे हड़ताल करते हैं और देश की राजधानी कूड़े के ढेरों से गंधाने लगती है।

नागरिक असुविधा से त्राहि माम कर जाते हैं और केजरीवाल कुल मिलकर ऐसा इंप्रेशन बना देते हैं कि उनकी असुविधा मोदीजी के कारण है, वे उन्हें सहयोग देते तो वो दिल्ली बेहतर चलाते।

याने कंगाल लव जिहादी, अमीर की बेटी भगा लाये और फाके पड़ने लगे तो कहे कि ये तेरे बाप के कारण है, वो मुझे पैसे देता तो मैं तुझे रानी जैसी रखता।

आम नागरिक को यह सब नहीं समझना, वो मोदी के नाम से गालियां देता है।

अगर आप को याद हो तो शुरू शुरू में ये खुद को anarchist कहते थे। अराजक।

जोड़िए कड़ियां, क्या ये वाकई केवल एक राजनेता हैं?

मैं तो उन्हें कब से individual नहीं बल्कि investment कहता आया हूँ।

वैसे उनकी खाड़ी देशों की यात्राएं भी सभी जानते ही हैं।

वहाँ क्यों जाना है इसका उत्तर वे ही दे सकते हैं।

वो मैगसेसे अवार्ड को भी याद कीजिये।

और सोचिए, क्या ये बस एक और राजनेता ही हैं?

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