बीजेपी व संघ की असली ताकत हैं करोड़ों भारतीय, जिनकी आँखों में पलता है सनातन भारत का सपना

वामी-कांगी विचारधारा से जुड़े हवा-हवाई लोगों की असली कमज़ोरी है–उनकी मिथ्या अवधारणाएँ ! आश्चर्य है, रवीश कुमार जैसे वामी-कांगी कथित सरोकारी पत्रकार टाइप लोग भी यह कैसे नहीं देख पाते कि चाहे चुनाव हो या न हो, संघ के लाखों कार्यकर्ता लोगों के बीच राष्ट्रीय विचारों और सेवा-कार्यों की अलख जलाए रखते हैं? वह भी निःस्वार्थ भाव से-अपना धन और समय दोनों खर्च करके ।

भारत के राष्ट्रभक्त जनमानस को रवीश और उनकी सुविधाभोगी जमात कभी समझ ही नहीं पाई, न समझ सकती है। भाड़े के लोग जुटाए जा सकते हैं, पर देश के लिए मर मिटने या जीने का भाव कहाँ से लाया जा सकता है? यह भाव रातों-रात पैदा भी नहीं किया जा सकता!

जिनका ध्येय ही येन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना हो उनसे इन भावों की अपेक्षा करना तो और भी बड़ी मूढ़ता होगी। देश के लिए मर मिटने या जीने का यह भाव ही संघ और कुछ हद तक बीजेपी की भी असली ताकत है।

लंबी गुलामी के कारण आज़ाद भारत का मध्यम वर्ग देश और समाज से भावनाओं के उस स्तर पर जुड़ ही नहीं पाया, जिस स्तर पर उसे जुड़ा होना चाहिए । माता भूमि पुत्रो$हं पृथिव्यां- का भाव उसे आयातित और आरोपित लगता है। जबकि संघ के स्वयंसेवक मातृभूमि के साथ पुत्रवत जुड़े होते हैं। संघ के स्वयंसेवकों को बचपन से देशभक्ति के संस्कार घुट्टी में पिलाए जाते हैं । वे संस्कार ही हैं कि कहीं कोई आपदा, दुर्घटना या जन-सरोकार से जुड़े सेवा-कार्य हों- सबसे पहले सहयोग के लिए संघ के स्वयंसेवक पहुँचते हैं। वे परमुखापेक्षिता के शिकार नहीं हैं।

एक ओर संघ के कार्यकर्ता और स्वयंसेवक इतने अनुशासित होते हैं कि बिना अपने वरिष्ठ अधिकारियों से विचार-विमर्श किए सामाजिक तो क्या निजी जीवन का भी निर्णय नहीं लेते। वहीं दूसरी ओर सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकार से जुड़े कार्यों या संकट-काल में उनका सहज-स्वाभाविक विवेक एवं त्वरित निर्णय-क्षमता चकित कर जाता है। ऐसी स्थितियों में वे ऊपर से आने वाले किसी निर्देश की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि स्वविवेक से निर्णय लेते हुए त्वरित गति से उपचारात्मक कदम उठाते हैं और प्राणार्पण से कार्य में जुट जाते हैं।

और आश्चर्य यह कि जिस देश में मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना की उक्ति प्रचलित हो, वहाँ संघ के स्वयंसेवकों की सामूहिकता एवं चिंतन-प्रक्रिया में पाई जाने वाली राष्ट्रव्यापी एकरूपता सहसा अविश्वसनीय-सी प्रतीत होती है। संघ से बाहर का व्यक्ति यह देखकर चकित रह जाता है कि अटक से कटक और कन्याकुमारी से कश्मीर तक संघ के स्वयंसेवक एक ही रीति-नीति से सोचते और व्यवहार करते हैं।

इसलिए रवीश जी, कृपया आप जैसे पत्रकार रहने दें, आपसे उनका यथार्थ विश्लेषण न हो सकेगा ! विचारधारा की लीक-लीक पर चलकर तो कदापि नहीं। सुविधा एवं सत्ता के लिए निष्ठा बदलने वाले लोग संघ की ताकत के मूल उत्स तक कभी पहुँच ही नहीं सकते। उस मूल उत्स तक पहुँचने के लिए आपको भारत की त्यागमयी सनातन संस्कृति की ओर लौटना पड़ेगा और उसे नहीं-नहीं(नेति-नेति) कहते हुए भी स्वीकार करना पड़ेगा। आप स्वीकार करना भी चाहें तो संभव है आपका वैचारिक व्यामोह या मिथ्या अहं आपको यह स्वीकार करने नहीं दे, और परिणाम– एक और मिथ्या निष्कर्ष !

रवीश जी के सदृश जो लोग बीजेपी के विस्तार को सोशल मीडिया, फेसबुक, ट्विटर आदि प्रचार-माध्यमों से जोड़कर देख रहे हैं, वे भ्रमित हैं, उन्हें यथार्थ का बोध ही नहीं। दरअसल बीजेपी की असली ताकत संघ के वे हजारों-लाखों कार्यकर्ता हैं, जो अपना घर-द्वार छोड़कर, अपना सब कुछ राष्ट्र के लिए होम करने हेतु तैयार और तत्पर खड़े रहते हैं ।

‘इदम न मम, इदम राष्ट्राय’ का संकल्प व भाव लेकर जो कार्यकर्त्ता ग्रामों-नगरों, जंगलों-बीहड़ों, खेतों-खलिहानों, कूलों-कछारों में रात-दिन एक किए हैं और राष्ट्र की बलिवेदी पर अर्पित करने हेतु अपना तन लिए-लिए फिरते हैं– वे हैं बीजेपी और संघ की असली ताक़त ! क्या सुदूर वनांचलों या उत्तर-पूर्व के राज्यों में जाकर कोई अपना जीवन खपा सकता है ? बिना जीवन खपाए क्या संस्कृति का कमल खिलाना संभव होगा? क्या अँधेरे में उतरे बिना उजाले का वाहक बना जा सकता है?

बीजेपी व संघ की असली ताक़त हैं वे करोड़ों भारतीय जिनकी आँखों में सनातन भारत का सपना पलता है, जिनकी आँखों से राम-कृष्ण, बुद्ध-महावीर, चाणक्य-चंद्रगुप्त का भारत कभी ओझल न हो पाया। बीजेपी और संघ की असली ताकत हैं वे कोटि-कोटि जन जिनकी सांस्कृतिक-राष्ट्रीय चेतना हुकूमतों की बूटों तले कुचली जाने पर भी मरी नहीं, जो तमाम हुकूमती ज़ुल्मो- सितम के बीच भी फिर-फिर सिर उठाती रही, दीवारों में चिनवाए या फाँसी के फंदे पर चढ़वाए जाने पर भी जो परवान चढ़ती रही। और जब तक राष्ट्र की धमनियों में ऐसी सांस्कृतिक-राष्ट्रीय चेतना की अस्फुट-मद्धिम-सी धारा भी प्रवाहित है, तब तक कोई भी प्रायोजित या आयातित शक्तियाँ संघ-बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकतीं।

समझे कॉमरेडों! यदि मुकाबले में उतरना है तो राष्ट्र की चिति, राष्ट्र की आत्मा को समझ उसके अनुकूल रीति-नीति विकसित करनी होगी; पर तुमसे न हो सकेगा कॉमरेड! विचार ले भी आएँ तो साधना के तेज़ में तपा आचरण व व्यक्तित्व कहाँ से आएगा….?

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