इन आम चुनावों में किसके नाम पर दें वोट MP या PM?

दोस्तों! लोकतंत्र का महापर्व यानि आम चुनाव चल रहे हैं। ये आम चुनाव 5 वर्षों में एक बार होते हैं। ऐसे चुनाव राज्य स्तरों पर भी होते हैं, मगर अभी जो चुनाव चल रहे हैं इन्हें महापर्व कहने का आशय यह है कि इस समय सारा देश अपना मत देगा।

देश का हर मतदाता इन चुनावों में मत देगा, इसलिए ये लोकतंत्र का महापर्व है। लोकतंत्र के इस महापर्व में हमें अपना मत देना होता है, सो सबसे बड़ी चिंता तो यह होती है कि हम किसे मत दें और किसे नहीं।

अब मत देने के भी कई पहलू होते हैं, कई विषय होते हैं; उनमें से दो विषयों पर हमेशा से ही बहस होती रही है, मगर इस बार यह बहस बड़ा रूप ले चुकी है और यह बहस है कि आम चुनावों में मत सांसद के नाम पर दें या प्रधानमंत्री के नाम पर? यानि मत देने का आधार क्या होना चाहिए?

अब यह बताने वाले हम तो कोई नहीं होते कि मत किसे दें मगर हम इस बहस को थोड़ा सुलभ ज़रूर बना सकते हैं जिससे हमें यह समझ आ जाए कि मत किस आधार पर दिया जाना चाहिए।

दोस्तों आम चुनाव जिसे हमने अभी लोकतंत्र का महापर्व कहा उसे संसदीय चुनाव भी कहते हैं और इन चुनावों में हम अपने अपने क्षेत्रों से सांसद चुनते हैं। जी हाँ मित्रों! इन चुनावों में हम सांसद ही चुनते हैं। अब ज़रा बड़े ही संक्षेप में यह समझ लेते हैं कि सांसद कहा किन्हें जाता है?

चुनाव जिन क्षेत्रों में होते हैं उन्हें संसदीय क्षेत्र कहा जाता है। एक संसदीय क्षेत्र का क्षेत्रफल 1:10 लाख की जनसंख्या में होता है। यानि कम से कम 1 लाख व अधिक से अधिक 10 लाख की जनसंख्या पर एक संसदीय क्षेत्र है। प्रत्येक संसदीय क्षेत्र से एक सांसद का चुनाव होता है। चुनाव की प्रक्रिया बहुत आसान है। एक संसदीय क्षेत्र में कितने भी प्रत्याशी चुनाव लड़ सकते हैं। लड़ने वाले प्रत्याशियों में से सबसे अधिक मत जिस प्रत्याशी को उस संसदीय क्षेत्र की जनता देती है, वह प्रत्याशी विजयी होता है और सांसद कहलाता है।

ऐसे ही देश में 543 संसदीय क्षेत्रों से सांसद चुने जाते हैं। चुनाव में हमारा यानि आम जनता का किरदार तो यहीं तक था, मगर इसके बाद भी काफ़ी काम बचा रहता है। और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि देशभर से चुने गए 543 सांसद मिलकर देश के हित में नीतियां तब तक नहीं बना सकते जब तक उनमें अनुशासन न हो, या वे किसी एक विचार या इरादे से बंधे ना हों।

ऐसा इसलिए क्योंकि हर नीति पर 543 विचार होंगे, और यदि ऐसा हो गया तो देश के लिए समस्या खड़ी हो जाएगी। इसलिए संविधान प्रावधान देती है सरकार का। 543 में से 15 प्रतिशत सांसदों के साथ (यानि करीबन 82 सांसद) सरकार बनाई जा सकती है।

ध्यान रहे कि यह सरकार ही सारी हितकारी योजनाएं, नीतियां लागू करती है और देश के हित का ध्यान रखती है। देश की सुरक्षा, अखंडता, संविधान को लागू कराना, हर व्यक्ति को न्याय पहुँचना यह सब ज़िम्मेदारी सरकार की ही होती है। यहाँ तक की कानून व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था यानि देश का वर्तमान और भविष्य, दोनों ही सरकार के हाथों में होता है। यानि चुनावों के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम होता है, और वह है सरकार का गठन।

मगर ज़रा ठहरिए, ज़रा ध्यान दीजिये ‘सरकार का गठन’! संसद की संख्या के 15 प्रतिशत सांसद भी यदि एकजुट होकर काम संभालने लगे तो इस बात की क्या गारंटी है कि उनके काम करने का तरीका अराजक न होकर एक दिशा में होगा? इस बात की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए सरकार एक दिशा में काम करे, इसके लिए आवश्यक है सरकार के मुखिया का होना जो अपनी सरकार को एक दिशा प्रदान कर सके। सरकार के इस मुखिये को प्रधानमंत्री कहते हैं। प्रधानमंत्री ही अपनी कैबिनेट यानि सरकार की दशा और दिशा तय करता है, जिससे देश की दशा और दिशा भी निर्धारित होती है।

तो अब मुद्दा यहां आकर रुक गया है कि देश की दशा और दिशा सांसद नहीं, मंत्री व प्रधानमंत्री कर रहे हैं। सांसद तो केवल अपने संसदीय क्षेत्र की दशा और दिशा तय कर सकते हैं, और उसमें भी उनके जिम्मे काफी कम ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। एक सांसद के ज़िम्मे जो काम आते हैं वे निम्नलिखित हैं:

  1. स्थानीय चुनावों में अपनी भागीदारी निभाना
  2. विभिन्न समितियां व आयोगों का हिस्सा रहना
  3. संसद में अनेकानेक प्रस्तावों पर अपना मत रखना
  4. सरकार से प्रश्न करना
  5. और सांसद विकास निधि से अपने क्षेत्र में विकास कार्य करवाना

इसके अतिरिक्त और कुछ काम एक अकेले सांसद के ज़िम्मे नहीं होता है। एक सांसद जब मंत्री बन जाता है तो वह विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन करवा सकता है, और उसका मंत्री बनना या न बनना प्रधानमंत्री का फैसला होता है।

लेकिन प्रधानमंत्री या सरकार बनती कैसे है? ज़रा इसे भी एक बार समझते हैं। चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस भी पार्टी को बहुमत या गठबंधन को बहुमत प्राप्त होता है, उसे राष्ट्रपति की तरफ़ से न्यौता मिलता है सरकार बनाने को। ध्यान रहे ये राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत होते हैं, इसलिए ये महज़ कोई संगठन नहीं हैं। ये अपने घोषणापत्र जारी करके अपने इरादे स्पष्ट करते हैं। जिन्हें जान कर, इनके पिछले इतिहास को ध्यान में रखकर आप इनका विश्लेषण कर सकते हैं।

तो अगर आप केवल आम चुनावों को सांसद का चुनाव मान कर बैठे हैं तो भूल कर रहे हैं। आप केवल किसी सांसद को चुनाव जितवा कर देशहित में नीतियां नहीं बनवा सकते न ही लागू कर सकते हैं। यह चुनाव केंद्र की सरकार बनाने का चुनाव है। यह चुनाव पार्टियों को केंद्र की कुर्सी पर काबिज़ करवाने वाला चुनाव है। यहाँ अगर ठोस इरादों वाली सरकार चुनी जाएगी तो वह आने वाले भविष्य में देशहित में फ़ैसले करेगी। अगर बिना किसी इरादे, बिना किसी मुद्दे के कोई सरकार आएगी तो वह पशोपेश में फंसे रहकर ही समय निकाल देगी।

किसी ऐसी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर मत दीजिये जिनके अपने इरादे ही न तय हों, भविष्य को लेकर जिनके मुद्दे ही न तय हों; जो पार्टियां केवल अपने प्रतिद्वंदी को हराने का लक्ष्य रखती है, उस पार्टी के पास प्रतिद्वंदी को हराने के अलावा कोई और लक्ष्य नहीं होता है।

आप सोचिए और तय कीजिये कि आप जिस प्रत्याशी को मत देंगे वह निर्दलीय है या नहीं? यदि किसी दल से है तो क्या वह इतने क्षेत्रों में चुनाव लड़ रही है कि वह सरकार बना सके या उसे गठबंधन की आवश्यकता पड़ेगी? यह वह निर्दलीय है तो उसके जीत जाने से वह नीतियों पर क्या प्रभाव डालेगा? यदि आप किसी दल के प्रत्याशी को चुन कर सांसद बनाएंगे तो क्या वह दल मज़बूत सरकार दे पाएगी या नहीं? उस दल का प्रधानमंत्री का दावेदार कौन है? उस दल की भविष्य को लेकर क्या योजनाएं और क्या लक्ष्य हैं? उसके पास देश को लेकर क्या रूपरेखा है? वह दल किनके हक़ में बात करती है? उस दल का इतिहास क्या रहा है?

इन सब प्रश्नों पर विचार करके अपना बहुमूल्य मत देने अवश्य जाएं, और उसी दल को मत दें जो आपके प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर दे सकती है। क्योंकि ध्यान रहे, यह चुनाव केवल सांसद चुनने का नहीं उन सांसदों को प्रधानमंत्री व मंत्री बनाने का चुनाव है।

संदर्भ:

https://www.quora.com/What-is-the-maximum-number-of-ministers-who-can-be-in-the-cabinet-of-India

https://www.quora.com/How-are-Lok-Sabha-seats-divided-based-on-the-states-and-UTs-of-India

https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://www.swaniti.com/wp-content/uploads/2015/03/Role-of-an-MP-MPLADS.pdf&ved=2ahUKEwiwjcyOtPXhAhVEPo8KHeauAKYQFjABegQIDRAE&usg=AOvVaw221UMC-75BzclW8i8_rppR

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