इस चिंतन से निबटे बग़ैर कैसे सुरक्षित हो सकता है सभ्य समाज?

आतंक का फैलता साम्राज्य, आतंक के गहराते साये… यह शब्दावली अब पुरानी हो चली है। समाचारपत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (और अब 5-7 साल से सोशल मीडिया) में वर्षों से आ रहे ऐसे शीर्षक अब कोई असर नहीं छोड़ते।

आप में से थोड़ी पुरानी पीढ़ी को ध्यान होगा कश्मीर के नंदीमर्ग, बांदीपोरा, अनंतनाग, श्रीनगर आदि में हिन्दुओं की हत्याओं पर भी समाचारपत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ऐसे ही हैडिंग लगाए गए थे।

9/11 के बाद विश्व भर के समाचारपत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी यही कहा गया था। श्रीलंका की घटनाओं के बाद भी यही कहा जा रहा है।

स्वाभाविक है कि मन में प्रश्न उठे कि आख़िर यह समस्या क्या है? इसे सभ्य समाज कब समाप्त कर पायेगा? समाचारपत्र, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कब सच सामने लाएंगे?

इन प्रश्नों से पहले प्रश्न यह भी उठता है कि क्या वैश्विक समाज अर्थात हम सच जानने-सुनने-समझने और फिर उस पर कार्यवाही करने के लिए तैयार भी हैं?

प्रजातंत्र के कारण कई नये मुहावरे, शब्दावली प्रचलन में आयी है। उन्हीं में से एक पॉलिटिकली करेक्ट होना और पॉलिटिकली इन्करेक्ट होना है।

हो ये रहा है कि पिछले 100-150 वर्षों से प्रजातंत्र सभ्य विश्व में प्रचलन में आ गया है। इस्लामी राष्ट्रों में अलबत्ता बड़े पैमाने पर धींगामुश्ती चलती है।

प्रजातंत्र में इकट्ठे वोट डालने वाले समूहों की बड़ी क़द्र है। इस्लामी हर प्रजातान्त्रिक देश में इकट्ठे वोट डालते हैं अतः किसी भी प्रजातान्त्रिक देश में उनकी बड़ी पूछ होती है। व्यवहार शास्त्र यह बनता है कि हर देश का प्रजातंत्र अपने देश के इस्लामी चिंतन का उपकरण बना हुआ है।

मुलायम सिंह यादव, सोनिया गाँधी, मायावती, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, अखिलेश यादव, लालू यादव, ममता बनर्जी कोई भारत में ही नहीं हैं। अमरीका के पिछले प्रेसिडेंट बराक ओबामा वहाँ के अखिलेश यादव, ममता बनर्जी थे। फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूज़ीलैंड, बेल्जियम आदि योरोप के प्रजातांत्रिक देशों के राजनैतिक नेतृत्व की पूंछ उठाइये। आपको गोरे-चिट्टे मुलायम सिंह यादव, सोनिया गाँधी, मायावती, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर… मिल जायेंगे। यही पॉलिटिकली करेक्ट होना और पॉलिटिकली इन्करेक्ट होना है। इस्लामियों के वोटों के लिये सभी सच की अवहेलना करते हैं और चुप रहते हैं।

बिलकुल अराजनैतिक ट्रम्प यूँ ही अमरीका के राष्ट्रपति नहीं बने। जिस बेचैनी ने 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी के आने का मार्ग प्रशस्त किया उसी बेचैनी ने अमरीका में ट्रम्प को पदारूढ़ किया। देखियेगा यही बेचैनी श्रीलंका में घोर राष्ट्रवादी नेतृत्व उपजायेगी मगर इसकी बड़ी क़ीमत दे कर यह हो रहा है। असंख्य निर्दोषों की हत्यायें, लहूलुहान-आहत समाज, आतंक के साये में जीते निर्दोष लोग प्रजातंत्र के राजनेताओं के पॉलिटिकली करेक्ट होने, पॉलिटिकली इन्करेक्ट न होने की क़ीमत चुका रहे हैं।

कुल मिला कर प्रजातंत्र में सच गया भाड़ में, पॉलिटिकली करेक्ट होना और पॉलिटिकली इन्करेक्ट उद्देश्य है। 300 साल तक ब्रिटेन के प्रोटेस्टेंट ईसाई इस्लाम से क्रूसेड लड़े और आख़िर में थक कर बैठ गये। चलिये वो तो पुरानी बात है, ताज़ा इतिहास खँगालते हैं। 9-11 हुए, अफ़ग़ानिस्तान को ढेर हुए, तालिबान को निबटे बरसों हो गए। ओसामा को मरे, अल जवाहिरी का बाजा बजे, मुल्ला उमर का बिस्तर गोल हुए ज़माना हो गया। दाइश की खाट खड़ी हो चुकी मगर समस्या वहीँ की वहीँ है… क्यों? क्यों? क्यों?

आख़िर इसकी जड़ कहाँ है? आईएसआईएस सीरिया, ईराक़ में हार गया। उसके कुटे-पिटे, बचे-खुचे हत्यारे अपने-अपने देशों को लौट गये और स्लीपर सैल बन कर काफ़िरों के क़त्ल की अपनी बारी के इंतज़ार में हैं। तथाकथित 72 कुँवारी हूरें, 70 कमनीय काया वाले गिलमां उनकी लपलपाती कमर का इंतज़ार कर रहे हैं। उनके हिसाब से उनके ख़ून की पहली बूँद धरती पर गिरने से पहले जन्नत में ज़मर्रुद के महल बन जायेंगे, शराब की नहरें उनके लिये बहने लगेंगी।

इस चिंतन से निबटे बग़ैर सभ्य समाज कैसे सुरक्षित हो सकता है? रावण की नाभि में बाण मारे बिना कैसे दशानन का पतन होगा? रक्तबीज की अंतिम बूँद नष्ट किये बिना भगवती काली की विजय कैसे होगी?

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