उत्तर प्रदेश में घर बैठ रहा है गठबंधन का वोटर

लोकसभा 2019 चुनाव के तीसरे चरण तक कुछ सीटों पर 2014 के मुकाबले मतदान प्रतिशत के घटने की चर्चा अलग-अलग ढंग से की गई।

मतदान के तीसरे चरण तक देखा गया कि कुछ सीटों पर अमूमन 3 के लगभग प्रतिशत की औसत से 2014 के मुकाबले कम मतदान का ट्रेंड बन रहा है। सबसे ज्यादा चौंकाया मैनपुरी और फिरोजाबाद ने 2014 के मुकाबले 3 से ऊपर प्रतिशत मतदान कम कर के।

लेकिन मतदान के इन्हीं चरणों में वोटिंग 2014 के मुकाबले बढ़ता भी दिखा। तीसरे चरण की एटा सीट पर यहीं बढ़ के वोटिंग हुई। एटा लोकसभा क्षेत्र में 62.65 फीसदी वोटिंग हुई। पिछले चुनाव में यहां 59 फीसदी वोट पड़े थे।

वहीं इसी चरण के फिरोज़ाबाद में 59.61 फीसदी मतदान हुआ। मैनपुरी के भी मतदाताओं ने मतदान को लेकर जोश कम दिखाया। इस बार 2014 की तुलना में यहां 3.09 प्रतिशत कम मतदान हुआ है।

ये वो सीटें हैं जहां उत्तर प्रदेश के सपा-बसपा गठबंधन और सैफई राजनीतिक घराने की विरासत दांव पर है।

मुलायम सिंह यादव के मैदान मैनपुरी संसदीय क्षेत्र में मैनपुरी- 56.91, भोगांव- 58.03, किशनी- 59.80, करहल- 56.53, जसवंतनगर- 55.60 प्रतिशत मतदान हुआ। बात अगर 2014 के चुनाव की करें तो उस समय 60.46 प्रतिशत मतदान हुआ था।

ऐसे में उत्तर प्रदेश में तीसरे चरण के मतदान तक दो बड़े सवाल ज़रूर खड़े होते हैं :

-औसत तौर पर 3 के लगभग प्रतिशत में मतदाता पोलिंग स्टेशनों तक नहीं पहुंच रहा है तो उसकी वजह क्या है?

-यह किसका वोटर है जो मतदान नहीं कर रहा है, घर पर बैठ रहा है?

इसका उत्तर है : उत्तर प्रदेश में तीसरे चरण तक गठबंधन का वोटर घर बैठ रहा है।

ऐसा कैसे हो रहा है? आइये, प्रथम चरण के तहत हुए मतदान की गाज़ियाबाद सीट को लेते हैं जो बीजेपी की सिटिंग सीट है। लोकसभा सीट पर इस बार कुल 57.60 प्रतिशत मतदान हुआ। यह पिछली बार के मुकाबले लगभग बराबर यानी दशमलव के कुछ अंक अधिक मतदान हुआ है।

यहां के कुछ बूथों का वोटिंग पैटर्न देखिये : भूर भारत नगर इलाके का बूथ जो हिन्दू(सामान्य-दलित)-मुसलमान की मिलीजुली आबादी वाला है और 13% वोट करता है। इसी तरह की दलित आबादी वाला एरिया नंद ग्राम 25% मतदान करता है। जबकि इसी लोकसभा का राजनगर एक्सटेंशन क्षेत्र का बूथ हिन्दू मिडिल क्लास या नॉन मुस्लिम, दलित आबादी का है, 72% मतदान करता है।

गठबंधन के लिए नाक वाली मैनपुरी, फिरोज़ाबाद सहित उत्तर प्रदेश के कम मतदान वाली सीटों से खड़े प्रश्नों का उत्तर पहले चरण की बीजेपी सिटिंग सीट गाज़ियाबाद दे चुकी है।

जहां ईवीएम पर हाथी नहीं मौजूद वहां बसपा का कट्टर और भाव स्तर पर जुड़ा वोटर पोलिंग बूथ से दूरी बना रहा है। यही स्थिति गठबंधन की उन सीटों की है जहां सपा के वोटर को साइकिल नहीं मिल रही ईवीएम में।

वहीं 2014 में जो दलित, ओबीसी प्रतिशत वोट ने एनडीए-बीजेपी के पास आकर बसपा को शून्य और सपा को महज चार सीटों पर समेट देने का काम किया था वह अभी भी अपनी 2014 की स्थिति पर न सिर्फ कायम है बल्कि ज़मीन पर पांच सालों में उज्ज्वला, आवास, बिजली, शौचालय, किसान पेंशन की दो किश्तें निजी तौर पर पाकर यानी सरकार की योजनाओं का लाभार्थी होकर और अपने आस-पास के हो रहे विकास के कामों की तेज गति और पूरे होते कामों को देख कर इन पांच सालों में और भी बढ़ा है।

ये आंकड़े और वोटिंग पैटर्न गवाह हैं और पुष्टि करते है इस बात की… कि 2014 के मुकाबले उत्तर प्रदेश के गठबंधन से लेकर सामान्य सीटों पर लगभग बराबर से अधिक और कम मतदान वाली सीटों पर अभी तक गठबंधन का वोटर उदासीन होकर घर बैठ रहा है।

इसकी वजह यह कि सपा-बसपा और अजित सिंह का गठबंधन महज इनके नेताओं का गठबंधन है, इनके मतदाताओं का नहीं।

इस सबके ऊपर और नीचे एक राष्ट्रीय स्तर पर आजमाए और पांच साल देखे, महसूस किए लहर के तौर पर मज़बूती से खड़ा और चढ़ा हुआ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में एक भरोसा… जो 2014 के जनादेश के जरिये उसने दिया और इस बात में यकीन को बढ़ते पाया कि मोदी हैं… तो मुमकिन है।

इसलिए उत्तर प्रदेश में 2014 के मुकाबले गठबंधन का वोटर घर बैठ रहा है और एनडीए बीजेपी के साथ आया 2014 वाला इस तबके का वोटर 2019 में भी न सिर्फ कायम है, बल्कि बढ़ा है।

यह मज़बूत और तकनीकी संकेत है तीसरे चरण के मतदान की समाप्ति और चौथे चरण की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश से, कि बीजेपी-एनडीए प्रदेश में 2014 से मज़बूत स्थिति में खड़ी है।

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