सत्ता के लिए इससे नीचे नहीं जाया जा सकता

राजनीति में आज दो घटनाएं हुईं, दोनों ही स्त्री अस्मिता से जुड़ी हैं।

दस साल तक काँग्रेस की सेवा करते हुए आज प्रियंका चतुर्वेदी शिव सेना में शामिल हो गईं।

वैसे तो चुनावों के समय इधर उधर नेताओं का आनाजाना चलता रहता है, मगर अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा जिल्लत झेलने के बाद और उन कार्यकर्ताओं पर कार्यवाही न होने के बाद एकदम धुर विरोधी पार्टी में जाना थोडा अजीब लगता है।

अभी हाल ही में प्रियंका गांधी ने स्त्री सुरक्षा के मुद्दों पर सरकार को घेरने का काम किया था, मगर प्रियंका चतुर्वेदी जैसी नेता काँग्रेस के कार्यकर्ताओं की शिकायत करे और उस पर कोई कदम न उठाया जाए, यह उचित नहीं।

खैर, प्रियंका चतुर्वेदी जी बहुत मुखर रूप से आवाज़ उठाती हैं, अब वह शिवसेना की तरफ से पक्ष रखेंगी।

अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया साहब ने स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों ने बदतमीजी की थी, उन्होंने माफी मांग ली थी और चूंकि पार्टी को उनकी ज़रूरत थी, इसलिए सिंधिया जी ने ही उन्हें माफी दिलवाई।

महिला कार्यकर्ता पर लफंगों को प्राथमिकता देना बहुत दुखद है।

दूसरी तस्वीर आज की राजनीति की सबसे दुखद तस्वीर है।

आज मैनपुरी में मायावती और मुलायम सिंह यादव एक साथ आए।

जिन्हें राजनीति में रूचि बस इतनी है कि उनके आकाओं के द्वारा दिए गए निर्देश पर लिखें, या केवल मोदी का विरोध ही करें, उन्हें इस तस्वीर में कुछ अजीब नहीं लगेगा।

मगर जिन्हें राजनीति में रूचि है, और जो स्त्री अस्मिता को समझते हैं, उन्हें इस तस्वीर से दर्द होगा, क्षोभ होगा और पीड़ा होगी। यह पीड़ा इस तथ्य को लेकर है कि मुझे लगता था कि एक स्त्री सब कुछ माफ़ कर सकती है, मगर जिसने उसकी अस्मिता पर हाथ डाला, उसे क्षमा नहीं कर सकती।

पर आज मेरा यह भ्रम टूट गया।

द्रौपदी का जब भरी सभा में अपमान हुआ था तब उसने हर उस इंसान का विनाश करने की कसम खाई थी। और जब तक उसने उन सभी का नाश नहीं कर दिया, तब तक वह चैन से नहीं बैठी। उसके सामने भी अपमान भुलाकर सत्ता का लोभ दिया गया था, परन्तु द्रौपदी को पता था कि स्त्री का उठाया गया एक कदम आने वाली हर पीढ़ी के लिए सन्देश है।

और आज मायावती ने मुलायम सिंह के साथ एक मंच पर आकर, आने वाली पीढ़ी के लिए यह आदर्श स्थापित कर दिया कि स्त्री के लिए सत्ता ही महत्वपूर्ण है, उसके लिए उसका आत्मसम्मान और उसकी इज्ज़त कतई भी आवश्यक नहीं है।

वर्ष 1995 में 2 जून की तारीख थी, जब मुलायम सिंह ने बसपा से समर्थन ले लिया था। मायावती को सत्ता पर बैठाने की तैयारी थी। मायावती भाजपा, काँग्रेस और जनता दल के समर्थन के साथ सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर चुकी थीं।

मुलायम सिंह का गुस्सा अपने चरम पर था. इधर मायावती लखनऊ में अपने सिपाहसालारों के साथ मिलकर बैठक कर रही थीं। शाम चार से पांच बजे तक का समय होगा जब समाजवादी पार्टी के विधायकों और कार्यकर्ताओं की लगभग दो सौ लोगों की भीड़ ने गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया।

जाति सूचक गालियों के साथ साथ उन्होंने वहां पर आतंक मचा दिया और उन्होंने मायावती को भी नहीं छोड़ा। भद्दी भद्दी गालियाँ वह लोग मायावती को दे रहे थे। मायावती जल्दी से एक कमरे में छिप गईं थी और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया था। पुलिस मूकदर्शक बनकर खड़ी थी और कई रिपोर्ट के अनुसार मायावती के साथ गाली गलौज और मारपीट की बात मिलती है।

यह बात पुरानी है मगर इतनी पुरानी नहीं कि उसे भूला जा सके। ज़रा कल्पना करिए कि एक दल की नेता जो कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री बनने जा रही थी उसके साथ यह सब करने का दुस्साहस सपाइयों ने किया।

सपा के कार्यकर्ता तो हमेशा से ही अपनी गुंडई के लिए कुख्यात रहे हैं। परन्तु आज जब मुलायम सिंह के साथ मायावती खड़ी हुई होंगी तो क्या वह अपनी देह और आत्मा पर किए गए प्रहारों को भूल गयी हैं? क्या स्त्रियों के लिए सत्ता ही महत्वपूर्ण हो गई है?

हर राजनीतिक दांव एक तरफ, मगर स्त्री की अस्मिता को इस तरह सत्ता के लिए विस्मृत करना एकदम अलग। यह ऐसा ही है जैसे द्रौपदी दुर्योधन के साथ सत्ता के लिए हाथ मिला ले।

सत्ता के लिए इतना नीचे गिरना, और स्त्रियों के लिए राजनीति की डगर और कठिन और अपमानजनक करने के लिए मायावती को माफ़ नहीं किया जा सकता।

सत्ता के लिए इससे नीचे नहीं जाया जा सकता।

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