प्राइवेट स्कूलों की ‘लूट’ : भाग 1

मेरे एक मित्र हैं, भिवानी – हरियाणा के रहने वाले हैं। किराने की आपकी wholesale/ Retail की दुकान है भिवानी शहर में।

आपने प्राइवेट स्कूलों की ‘मनमानी’ और ‘लूट’ पर एक बड़ा मार्मिक लेख लिखा है और तगादा प्रधानमंत्री मोदी से किया है कि हे मोदी जी… आप क्या कर रहे हैं? आपने ये लूट बंद क्यों नहीं की?

अब चूंकि मैं भी इसी लाइन का आदमी हूँ और प्राइवेट शिक्षा के इस गोरखधंधे से पिछले 30 साल से जुड़ा हूँ… और इस क्षेत्र में मैंने 30 साल ज़मीन पर काम किया है…

ये बड़ा ही वृहद विषय है जिसे सिर्फ एक लेख में नहीं समेटा जा सकता इसलिए मैं इसपर पूरी एक श्रंखला लिखूंगा…

आज से कोई 10 साल पुरानी बात है। जालंधर की एक महिला से मेरा परिचय हुआ। वे जालंधर के एक बेहद सम्पन्न, उद्योगपति घराने की बहू थीं और बेहद महत्वाकांक्षी थी। एक Empowered Woman की जीती जागती प्रतिमूर्ति थीं।

उन्होंने अपना जीवन एक आलीशान बंगले के AC में बैठ के सास बहू के सीरियल देखने में नहीं बिताया था। वो अपने ससुर और अपने पति से इतर अपना खुद का एक उद्यम खड़ा करना चाहती थीं और एक Finishing School चलाती थीं…

उनके पास गज़ब के ideas थे पर उनका उद्यम click नहीं कर रहा था। मैंने उन्हें सलाह दी कि आप एक Play School खोलिये… जैसे ये कोठी किराये पर ली है, वैसे ही कोई बड़ा बंगला किराये पर लेकर खोलिये। इस सुझाव पर लंबी चर्चा हुई।

“Fees कितनी होनी चाहिए?”

मैंने पूछा, ‘जालंधर का सबसे महंगा स्कूल कौन सा है और कितनी fees लेता है।’ उन दिनों सबसे महंगे स्कूल की fees 4000 रूपए महीना थी। मैंने कहा ‘आप 5000 रूपए लीजिये…’

“इतना महंगा?”

‘जी हां… सस्ता खोलेंगी तो पिट जाएगा… Flop हो जाएगा…’ उनको मेरी बात पर भरोसा न हुआ…

‘आपने नया स्कूल खोला… आपके पास Result दिखाने को तो कुछ है नहीं… आप लोगों को क्या दिखाएंगी? सिर्फ Pomp and Show?’

अपनी Superiority दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है Price Tag… अपने Product को जबरदस्त तरीके से launch करो, महंगी Publicity करो और उसका दाम अपने मूर्ख उपभोक्ता से वसूलो…

महंगी कीमत देख के ही लोग इस भ्रम में आ जाते हैं कि माल अच्छा है…

मेरी इस सलाह से वे कितनी सहमत या असहमत हुईं पता नहीं पर कुछ साल बाद मुझे पता चला कि उन्होंने वो Play School शुरू कर दिया था और उसकी मासिक फीस कोई 10,000 रु महीने से भी ज़्यादा थी… 1,25,000 वार्षिक।

Ideas उनके पास थे ही… अपने Finishing School में वो एक फ़िल्म की क्लिप दिखाया करती थीं जिसमें England की महारानी की टेबल कैसे सजती है और उसमें कितने किस्म के छुरी कांटे और ग्लास प्लेट होते हैं, और 16 Course Meal किस नफासत से खाया जाता है, छोटे बच्चों को यही सब सिखाने का दावा वो किया करती थीं…

अब आप बताइये कि किसी नव धनाढ्य, धनपशु की बहू या पत्नी अपनी एकमात्र इकलौती संतान को Queen Elizabeth की तरह व्यवहार करने की कल्पना मात्र से impress हो के क्या सिर्फ 10,000 रुपल्ली भी न दे देगी?

और 20 लाख की आबादी वाले शहर में आपको अपना धंधा चलाने के लिए ऐसे कितने Clients चाहिये?

सिर्फ 50… आज उनके Play School की विभिन्न शहरों में Franchisee है…

अब आइये मूल विषय पर… उन मित्र ने जो प्राइवेट स्कूल की लूट का विषय उठाया है उसपर…

शहरी उपभोक्ता बेहद Brand Conscious हो गया है… हमारे ज़माने में हम लोग 100 रूपए वाला सफेद PT Shoe पहन के बड़े हुए… आज का बच्चा पैदा ही Nike, रीबॉक पहन के होता है… Brand Conscious व्यक्ति को आप समझा सकते हैं क्या?

PVR में सिनेमा देखते आदमी को आप समझा सकते हैं कि क्यों 20 रु की popcorn 600 रु में खरीद रहे हो?

क्या मोदी जी को PVR में Pop Corn की बिक्री रोक देनी चाहिए?

समाज में बड़े brand के स्कूल में पढ़ाना अब Status Symbol बन गया है… और इन स्कूलों में क्या पढ़ाई होती है, मुझसे बेहतर कौन जानेगा?

महेंद्रगढ़ जिले में बाबा रामदेव जी का गांव है अलीपुर… उसके सरकारी स्कूल में 5 मास्टर नियुक्त थे और कुल 15 बच्चे आते थे स्कूल… इसके अलावा 14 प्राइवेट स्कूलों की बसें आती थीं गांव में जिनमें करीब 400 बच्चे जाते थे…

आखिर ये समस्या खड़ी क्यों हुई?

इसका हल क्या है?

क्रमशः…

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