स से सनातनी को स से साम्यवाद और सेक्युलरिज़्म क्यों आकर्षित करता है?

एक बेहतरीन ह्वाट्सएप पोस्ट था कि क्या आप जानते हैं कि एक मुसलमान के घर एक मुसलमान पैदा होता है और एक ईसाई के घर ईसाई पर एक हिन्दू के घर में सेक्युलर भी पैदा होते हैं।

इसी मुद्दे पर आज ये आलेख आपकी सेवा में है।

क्या आपने कभी गौर फ़रमाया है कि अल्लाह में यकीन रखने वाला हर एक मुसलमान ज़्यादा से ज़्यादा तालीम हासिल करके भी खुद को तरक्की पसन्द तो मानता है पर उस अल्लाह की अकीदत में थोड़ा और मशगूल हो जाता है और अपनी या अपनी कौम की हर कामयाबी पर इंशाअल्लाह कहना नहीं भूलता? अपने मज़हब और मज़हबी फ़रमानों को उस परवरदिगार का फ़रमान मान कर ताउम्र अपने दीनी जिम्मेदारियों में अपनी ज़िन्दगी बिताना एक फ़ख्र की बात मानता है।

लगभग यही हाल ईसाइयों का है, कैथोलिक या प्रोटेस्टेण्ट में बँटे हैं पर उस ईश्वर के बेटे पर एक भी सवाल बर्दाश्त नहीं। अक्षतयौवना मरियम के पुत्र प्राप्ति की वैज्ञानिकता पर आज तक किसी सेक्यूलर! एक भी रविवार चर्च नहीं गये तो आपका यीशु रूठा, सेण्टा क्लाज़ के चश्मे के नम्बर पर कोई सवाल किया तो आप ईश निन्दक और हो सकता है कि यमकोटि ( न्यूजीलैण्ड ) का कोई हार्डकोर ईसाई आपको गोलियों से भून दे।

सनातन की कोख से जनमे पंथों की आवाज़ धम्मम् शरणम् गच्छामि या णमो अरिहन्तारम् या फिर सत श्री अकाल का उद् घोष करके भी दकियानूसी, पुराणपन्थी या असभ्य और पिछड़ी सोच वाले नहीं कहलाती तो अचानक ये खयाल आता है कि आखिर सनातन धर्म में ही सारी बुराई क्यों है जिसे हमारे पढ़े लिखे आधुनिक हिन्दू युवा पढ़ने लिखने के बाद (खास कर केन्द्रीय वि०वि० में ) जान जाते हैं और एक सुर से सनातन धर्म की पिछड़ी सोच, कर्मकांड की फ़फ़ूँद, अनगिनत कुरीतियों के खिलाफ़ मोर्चा खोल देते हैं। कभी बीफ़ पार्टी मनाते हैं तो कभी हिन्दू आस्था केन्द्रों में कतिपय पीड़ादायी दिनों में कराहती सनातनी स्त्रियों के प्रवेश को कानूनन वैध बनाने के प्रयास में जुट जाते हैं।

मार्क्स की बात कि “धर्म अफ़ीम है” के अधूरे कथन को लेकर चाय की प्याली में तूफ़ान उठाने वाले प्रगतिवादी हिन्दू स्वामी विवेकानंद की इस बात को दरकिनार कर देते है कि जहाँ विज्ञान की हद समाप्त होती है वहीं से अध्यात्म शुरू होता है और अल्बर्ट आइन्स्टीन की भी नहीं सुनते कि धर्म और विज्ञान एक दूसरे के बिना अंधा या लंगड़ा है मतलब ये एक दूसरे के पूरक हैं।
गज़ब लग रहा है ना !

एक बात और आप चाहे मैकाले की शिक्षा को दोष दें या अंग्रेज़ीदाँ युवाओं की आधुनिक सोच को साम्यवाद के माध्यम से सेक्युलरिज़्म की सोच को बढ़ाने का श्रेय दें पर बात वह नहीं कुछ और है। अगर आपको लगता है कि उच्च शिक्षा प्राप्ति से सनातन धर्म की रूढ़ियों का पर्दाफ़ाश हो रहा है तो आपको यह बताना आवश्यक होगा कि सनातन धर्म एक जीवन शैली है।

यहाँ ब्लासफ़ेमी जैसा कोई टर्म नहीं जिससे किसी को उस परम तत्व की निन्दा के लिये मौत की सज़ा सुनाई जा सके बल्कि आपका हर विरोध और आलोचना आपको एक नये वाद का प्रवर्तक बना सकती है।

भारत में विख्यात सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, वैशेषिक और वेदान्त आदि आस्तिक छहो दर्शन लगभग एक दूसरे के विरोध और समालोचना से ही पनपे हैं। वैदिक संस्कृति के विरोधी सिद्धार्थ को हमारा सनातन धर्म विष्णु का ९ वाँ अवतार मान चुका है। अगर इस्लाम की अवधारणाएँ कुछ नया कह कर या कर के सनातनियों को आकर्षित कर पातीं तो आज तक हज़रत मुहम्मद को सनातन धर्म में ११ वाँ अवतार मान कर इस्लाम को भी खुद में एक नये वाद के रूप में समाहित कर चुका होता।

सनातन धर्म तो विरोध और समालोचना की प्रवृत्ति वेदों, पुराणों, उपनिषदों के मुख्य पात्रों में भी रही है। उदहरण के लिये शिव का निन्दक उनके ससुर दक्ष प्रजापति ही थे तो कृष्ण का कटु और सार्वकालिक आलोचक उनका मौसेरा भाई शिशुपाल रहा है।

कठोपनिषद में पिता के द्वारा बूढ़ी गायों के दान का विरोध खुद उस ब्राहमण का किशोर पुत्र करता है और परिणाम स्वरूप पिता का श्राप पाकर उसे यम के पास जाना पड़ता है। यम और उस बालक का वार्तालाप ही कठोपनिषद का सार है।

रावण के कुकृत्यों के आलोचकों में मन्दोदरी, विभीषण और कुम्भकर्ण प्रमुख रहे जबकि राम या हनुमान ने कभी भी रावण की निन्दा नहीं की। कर्मकाण्ड के विरोधी स्वामी दयानन्द को भी सनातन धर्मी हेय दृष्टि से आज कल नहीं देखते जबकि मदीने से मदीने वाले को भागना पड़ा था।

सुकरात, जीसस, मार्टिन लूथर किंग के विरोधी उनकी जान तक ले चुके हैं जबकि हमारा सनातन धर्म तो बौद्ध और जैन के तीर्थंकरों को विष्णु का रूप मानकर सिर झुका चुका है और नास्तिक दर्शन के रूप में बौद्ध और जैन दर्शन चार्वाक दर्शन के साथ आज भी सनातनियों के लिये आज भी तो आस्था का प्रतिमान है।

उस परम तत्व की गवेषणा में प्रयुक्त सिद्धान्त अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि सिद्धान्त भी आलोचना और विरोध की नींव पर जनमें सनातन धर्म के विशाल वट वृक्ष हैं जो आज भी सनातन धर्म के लिये मणिकाञ्चन संयोग के समान है तो फिर आज ऐसा क्यों है कि हमारे सनातनधर्मी साम्यवाद से प्रभावित होकर सेक्युलर बने जा रहे हैं और हर जगह अपने धर्म का तीया पाँचा कर रहे हैं और उस पर तुर्रा ये कि उनके साथ बैठे अन्य मतावलंबी उन्हें प्रगतिशील होने का तमगा देते हुए इंशाअल्लाह पूरे हिन्दोस्तान में ऐसे ही तरक्की पसन्द और दकियानूसी सोच से दूर हिन्दुओं की तादाद बढ़ने की दुआ करते हैं पर अपने गले से क्रास नहीं उतारते हैं या अपने सर से टोपी नहीं उतरते हैं।

मतलब हम हिन्दुओं को सेक्यूलर दिखने के लिये अपने धर्म के आस्था प्रतिमानों की निंदा करना ज़रूरी है पर वहीं इस्लाम, ईसाइयत आदि के नियमों और उसकी बन्दिशों को अक्षरशः मान कर ये अन्य मतावलंबी पूर्ण धर्मनिरपेक्ष बने रह जाते हैं। तो फिर हिन्दुओं खासकर शिक्षित प्रगतिशील और प्रोफ़ेशनल तबके का यह मात्र सनातन निन्दक धर्मनिरपेक्ष रूप क्यों दिन प्रति दिन विराट होता जा रहा है?

आखिर क्यों?

इस पर एक सोच बड़े मारक ढंग से हमारे सामने आती है और ये बस एक डर की वज़ह से है और वह डर है रोटी का, रोटी गँवाने का, रोटी नहीं कमा पाने का, रोटी की संभावना समाप्त होने की आशंका का।

खैर आपका एक जायज़ सवाल होगा कि कैसा डर? कहाँ है डर? किससे डर? किसका डर?

तो चलिये मीमांसा प्रारंभ करते हैं। एक भी सरकारी नौकरी वाला या भरण पोषण की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त व्यक्ति साम्यवादी नहीं होता, न ही धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर। उसे न इफ़्तार से गुरेज़ है न सेण्टाक्लाज़ की टाफ़ियों से। वह दशहरे में भी खुश है और ईद पर भी। अगर परेशान होगा भी तो धंधे की मंदी से या त्योहारों की छुट्टी कट जाने से।

तो फिर सेक्युलर है कौन? ये वे अल्पसंख्यक हैं जो बस इस इन्तज़ार में बैठे हैं कि कब उनकी आबादी 40% को पार करे और ये मुल्क उनका मज़हब मानने को विवश हो जाये। वर्ना ये सनद रहे कि ये जहाँ भी बहुमत में हैं वह देश सेक्युलर नहीं है बल्कि उस हर एक मुल्क का एक राष्ट्र धर्म है।

जब तक ये अल्पसंख्यक हैं तभी तक ये सेक्युलरिज़्म के हिमायती हैं। इसके लिये साम, दाम, दण्ड और भेद का प्रयोग चालू है। ये बात भी आप मान लेंगे पर अब मुद्दा उठता है कि हमारे सनातनी साम्यवादी आगोश में धर्मनिरपेक्षता के गीत क्यों गुनगुना रहे हैं जबकि घूमने के लिये कटासराज या हिंगलाज मन्दिर पसन्द करते हैं न कि मक्का या बैटिकन जाना। तो आइये चलते हैं इस बात की तह की ओर।

अगर आप यूपीएससी की परीक्षा देना चाहें तो उपलब्ध किताबें वामपन्थी लेखकों की लिखी हुई हैं और उत्तरपत्रक जाँचने वाला धड़ा भी उन्हीं उत्तरों के पूरे अंक देगा अगर आपका उत्तर उनकी अवधारणाओं से मेल खाये तो। खैर अगर आप चुनाव लड़ना हो तो अल्पसंख्यक मत को लुभाने के लिये आपको सेक्यूलर दिखना पड़ेगा।

अगर आप कला, संगीत, अभिनय, लेखन या मुशायरे अपना भविष्य सौंपना चाहते हैं तो मामला और पेचीदा है। इन सारे मंचों पर लगभग सेक्यूलर सोच का कब्ज़ा है। आपकी आमद तभी स्वीकार की जायेगी अगर आप की रचनाओं, अभिनय या संगीत का स्वरूप धर्म निरपेक्ष दिखाई दे। अब इस धर्मनिरपेक्षता का अर्थ वह नहीं जो आक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी कहती है। अंग्रेज़ी में सेक्यूलर का मतलब यह है कि सत्ता धर्म के आधार पर कोई भेद भाव नहीं करेगी पर अपने भारत में सेक्यूलरिज़्म का मतलब अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बनकर रह गया है।

आपके लेख अगर सनातन धर्म की गरिमा का बखान करता हुआ दिखा तो आपका लेख कम्यूनल कहलायेगा पर वही लेख अगर किसी अल्पसंख्यक धर्म के समर्थन में हो तो आप सेक्यूलर (अगर आप हिन्दू हैं) तो पर अगर मुसलमान या ईसाई होकर कोई इस्लाम/ ईसाइयत की तारीफ़ों के पुल बाँधें तो यह उसका कम्यूनलिज़्म नहीं बल्कि सेक्यूलरिज़्म ही कहलायेगा।

कविता का मंच और मुशायरे सेक्यूलरिज़्म की सदारत में चल रहे हैं।

मेरे एक आदरणीय मित्र ने लिखा है कि अगर मैं अपना एक आलेख किसी अंग्रेज़ी पत्रिका में भेजूँ तो बगैर संपादक से जान पहचान के मेरे आलेख के छपने के खूब आसार होते हैं और मानदेय भी मिल जाता है पर यही काम अगर मैं हिन्दी या किसी आंचलिक पत्रिका में करूँ तो परिचय के बाद भी छप जाये ये संभावना कम है और छपे तो मानदेय की कल्पना तो गूलर के फूल वाली ही रहेगी।

अगर ध्यान दें तो अंग्रेज़ी की सारी पत्र पत्रिकायें सेक्यूलर प्रवॄत्ति की हैं जो भारतीय आस्तिकता का सम्मान कभी नहीं करती हैं और शायद ही सनातन धर्म की विशेषता से सबन्धित कोई आर्टिकल छपा है या होगा। पर जैसे ही उसकी कुरीतियों, कर्मकाण्डों या दकियानूसी बातों से जुड़ा हुआ आलोचनात्मक आलेख हो तो प्रकाशन सूची में जगह मिलने की संभावना में कोई संदेह नहीं।

तो अगर कोई सनातनी लेखक के रूप में अपने कलम के जोर पर आजीविका की सोचे तो उसे सेक्युलर दिखना ही पड़ेगा वरना राष्ट्रीयता से ओतप्रोत पत्रिकायें और अखबार तो अपना खर्चा मुश्किल से चला पा रहे हैं और उनके पाठक भी माँग मूँग कर ही ऐसी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों को पढ़ते हैं तो उनसे मानदेय की उम्मीद तो रेत की पेराई करके तेल निकालने जैसा ही होगा।

दक्षिणपन्थ की महान पत्रिका पाञ्चजन्य में भी आलेख के लिये मानदेय मिलता होगा इस पर मुझे शक है और अगर मिलता होगा तो छपना और भी मुश्किल होगा। तो अगर आप लेखक हैं तो आपको सेक्यूलर दिखना होगा। अगर आप चित्रकार हैं और दक्षिण पन्थी भी तो गीता प्रेस का कल्याण ही आपका अन्तिम सहारा है।

जो प्रेस सनातन के उत्थान में होम हो गया पर आज अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा हो उसमें आस्तिकता से संबंधित चित्रों की छपाई से प्राप्त मानदेय से पेट पालना आकाशकुसुम ही साबित होगा पर जैसे ही आप वामपन्थी और सेक्यूलर बने आपकी फटी बनियान जिसपर आपने कूँची पोंछी होगी, माडर्न आर्ट का अनमोल नमूना बन कर किसी आर्ट गैलरी में लटक जायेगी और आपको लाखों के बारे न्यारे करवा देगी। गीता प्रेस की किताबों में भगवान आदि चित्रकार सरस्वती के चित्र बना कर ताउम्र गुमनाम ही रहे पर अर्ध नग्न आभासी नारी की डूडलिंग बना कर मकबूल ने उसे सरस्वती नाम क्या दिया वह एक बेहतरीन आर्ट पीस बन गई और हुसैन शायद अपने समय का सबसे अमीर भारतीय चित्रकार रहा, वज़ह थी उसका सेक्यूलर होना।

और अगर आप एक आस्तिक मूर्तिकार हैं तो आपका धंधा भी दशहरा दीवाली, वसन्त पंचमी और गणेश चतुर्थी के मौके पर ही कुम्हार के नाम से चलेगा, मशहूर स्कल्पचर आर्टिस्ट तो आप होने से रहे। पर एक बार आप सेक्युलर हो कर देखें आपकी टूटी हुई आर्ट पीस, छेनी, हथौड़ी भी माडर्न आर्ट गैलरी में सजी हुई मिलेगी। शायद रोटी का जुगाड़ ही है कि कोई मीनाकुमारी और दिलीप कुमार बनकर खुश है तो कोई गुलज़ार कहला कर।

मतलब सेक्यूलर दिखने से है।
एक काफ़ी चर्चित गाना है कि —
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ।

अगर आप दृश्य श्रव्य जगत में, पत्रकारिता में, लेखन में, कवि सम्मेलनों और मुशायरों में, चित्रकला और मूर्तिकला में, फ़िल्मों में अपना करियर बनाने की चाहत रखते हैं और सनातन धर्मी हैं तो आपको सेक्युलर दिखना ही पड़ेगा वर्ना आपको अपनी कला का सर्जक, कद्रदान, समर्थक और खरीददार खुद ही बनना पड़ेगा। अगर अगले शेर में “हसीनों” को आप वामपन्थ, सेक्यूलरिज़्म और साम्यवादी विचार मान लें तो इस आलेख के बारे में आपकी दृष्टि और ज्यादा स्पष्ट हो जायेगी। शेर कुछ यूँ है कि –

रिसालों और अखबारों पे सेन्सर है हसीनों का
हम अपनी दास्तान ए इश्क़ छपवाने कहाँ जायें?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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