मीडिया ने कभी सबूत नहीं मांगे, तो एक के बाद एक चालें चलते चले गए काँग्रेसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध काँग्रेसियों के सारे झूठे और कुटिल दांव असत्य निकल रहे है और अप्रभावी हो रहे हैं। सभी चालें और दांव कुछ ही घंटे में व्यर्थ हो जाते हैं।

चूंकि मीडिया ने कभी भी राहुल और काँग्रेसियों से उन आरोपों के बारे में सबूत नहीं मांगे, कभी भी उन आरोपों को विस्तार से एक्सप्लेन करने को नहीं कहा, अतः काँग्रेसी एक के बाद एक चालें चलते गए।

उदहारण के लिए, अवार्ड वापसी की करतूत मोदी सरकार को सत्ता के शुरुवात में ही पंगु बनाने की चाल थी।

काँग्रेसियों का अनुमान था कि प्रधानमंत्री मोदी की आभा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में असहिष्णुता के आरोप के कारण धूमिल पड़ जायेगी। साथ ही, मध्यम वर्ग – जो उस अवार्ड वापसी गैंग की रचनाएं पढ़ता और देखता रहा है – सरकार से विमुख हो जाएगा।

फिर, काँग्रेसियों ने गौवंश को खाने के अधिकार के नाम पर सरकार को घेरने का प्रयास किया।

उसके बाद, सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा हमला, प्रधानमंत्री मोदी और उनके कुछ कैबिनेट सहयोगियों की शैक्षणिक योग्यता, GST (जबकि उनके द्वारा शासित राज्यों के वित्त मंत्री GST की बैठकों में इसी GST का सपोर्ट करते थे), नोटबंदी, संस्थाओं को कमज़ोर करना, सीबीआई, EVM, विदेश नीति के सञ्चालन पर आरोपों की बौछार कर दी।

इन सब के बीच पिछले वर्ष रफाल का मुद्दा उछाल दिया। कुल मिलाकर एक आरोप को घुमाते रहे कि रफाल में अनिल अम्बानी की जेब में 30000 करोड़ रुपये डाल दिए गए।

अब यह किसी भी मीडिया वाले ने नहीं पूछा कि कुल 59000 करोड़ की डील में कैसे अनिल अम्बानी को 30000 करोड़ रुपये मिल गए!

काँग्रेसी रफाल का केस सुप्रीम कोर्ट ले गए। वहां भी सुप्रीम कोर्ट ने लड़ाकू विमान की खरीद प्रक्रिया को सरकारी नियमों के अनुसार उचित बताया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑफसेट सप्लायर्स (वे भारतीय कंपनियां जो दास्सो के उत्पादों को भारत में बनाएगी; इन 71 ऑफसेट कंपनियों मे एल एंड टी, महिंद्रा समूह, रिलायंस, कल्याणी समूह, गोदरेज एंड बॉयस, टाटा समूह सम्मिलित हैं) की पसंद से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है, जो पूरी तरह से दास्सो ने किया था।

अब समाचार यह चलवा दिया कि जब रफाल के खरीद के दौरान वर्ष 2015 में फ्रांस ने रिलायंस का 14.37 करोड़ यूरो के टैक्स को माफ कर दिया।

यह कोई नहीं बतलाता कि रिलायंस पर यह टैक्स वर्ष 2007 से 2012 के दौरान टेलीकॉम के क्षेत्र में लगाया गया था, जिसे रिलायंस ने चुनौती दी थी। इस चुनौती के बाद फ्रेंच टैक्स अधिकारियों ने टैक्स की रकम कम कर दी।

यह आरोप कोई नहीं लगाता कि आखिरकार फ्रेंच लोगों ने वर्ष 2007 से 2012 तक के टैक्स लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने की प्रतीक्षा क्यों की? क्यों नहीं वे टैक्स सोनिया सरकार के समय में वसूले गए?

सोनिया सरकार के समय में वोडाफोन पर भारत सरकार ने 22000 करोड़ का टैक्स और पेनल्टी लगा दी थी। वोडाफोन ने इसे चुनौती दी थी और कोर्ट में केस जीत लिया।

अभी हाल ही में अमेरिकी टैक्स अधिकारियों ने कुछ तकनीकी इशू के कारण मेरी पत्नी से लगभग 5000 डॉलर अतिरिक्त टैक्स की मांग की थी। हमने इसे चुनौती दी और कहा कि केवल 250 डॉलर का ही अतिरिक्त क्लेम बनता है। कल ही टैक्स ऑफिस का पत्र आ गया जिसमें उन्होंने पत्नी के क्लेम को स्वीकार कर लिया।

चूंकि मैं प्रधानमंत्री मोदी के विज़न के समर्थन में लिखता रहता हूँ, तो क्या यह माना जाए कि अमरीकियों ने प्रधानमंत्री मोदी के दबाव में यह निर्णय लिया?

क्या वास्तव में विपक्ष को लगता है कि फ्रेंच सिस्टम में कर अधिकारी सरकारी दबाव में टैक्स माफ़ कर देंगे?

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