23 मई 2019 के बाद का मोदी का भारत : हिंदुत्व व हिन्दुओं के स्वर्णकाल का अरुणोदय

यह सृष्टि का नियम है कि झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए, लेकिन भारत और स्वयं उसके हिंदुओं ने शताब्दियों से इस नियम की अवेहलना कर रखी थी।

इसी का यह परिणाम हुआ है कि भारत में हिन्दू नामों के पीछे सत्ता व उसके तंत्रों में विधर्मी स्थापित हुये (आज तो इसका पता चलना भी मुश्किल हो चुका है) और हिन्दुओं को प्रताड़ित व उनका दमन करने के लिए, ‘भगवा आतंक’ ‘हिंदुत्व आतंक’ शब्दावली को गढ़ा गया।

लेकिन यह सब, 16 मई 2014 से बदल गया जब भारत की सत्ता के शीर्ष पद पर एक ऐसा व्यक्ति प्रतिष्ठित हुआ जिसने हीनता से सजी, झुकने की संस्कृति को तज कर, स्वाभिमान के गोटे से चमकती दमकती, झुकाने की संस्कृति को आत्मसात किया।

पिछले वर्षों में, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अक्सर कट्टर हिन्दू मित्र इस बात को लेकर आलोचनात्मक व आक्रोशित होते थे कि, ‘आखिर मोदी ने हिंदुओं के लिए किया क्या है?’

मैं उनसे यही कहता था कि किसी भी परिवर्तन को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए सबसे पहले, ‘मिलने की अभिलाषा’ का त्याग कर, वातावरण में हो रहे बदलाव की आहट लेनी होगी।

आज जब 2019 के चुनाव का प्रथम चरण पूरा हो चुका है, मुझे परिवर्तन भी दिख रहा है और वातावरण बदला हुआ दिख रहा है।

सोनिया गांधी का ईसाई परिवार, जो हिन्दुओं को भगवा आतंकी कहता था, जिसकी सरकार न्यायालय में प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को अस्वीकारती थी और जो हिन्दू परम्पराओं का उपहास करती थी, वह आज मंदिर में, पूजा करते हुए व हवन का फोटो खिंचवा कर, जनता को दिखा, अपने को हिन्दू दिखाना ज़रूरी समझने लगा है।

जिस परिवार का सर जालीदार टोपी और हिजाब रख, सिर्फ दरगाहों और मस्जिदों में झुकता था वो आज टेढ़े मेढ़े होकर, हिन्दू पूजन में बैठे हुए है।

क्या यह परिवर्तन नहीं है? क्या यह हिंदुत्व की उठान नहीं है?

मेरी दृष्टि में नरेंद्र मोदी के इन 5 वर्ष के काल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि हिन्दू, हीनता से मुक्त हुआ है। आज से 5 वर्ष पूर्व जो हिन्दू शिष्टाचार, भीरुता या दूसरों को असहज लगेगा कि दुविधा में जकड़ा, हिंदुत्व की आलोचना करने वालों या अन्य धर्मों के लोगों से तर्क करने की जगह चुप बैठा, अपमानित होता था, उसने मौन तोड़ दिया है।

जो हिन्दू, अपने धर्म की कुछ कमियों को लेकर, अपने वामी, लिबरल, ईसाई व मुस्लिम मित्रों के सामने अपराधबोध से ग्रसित, लकवाग्रस्त रहता था, वह आज वह इस अपराधबोध से मुक्त, समयानुसार बदलाव की बात करता है।

जो हिन्दू, आदि काल से चल रही हिन्दू परम्पराओं को लेकर अज्ञानी था और उन सबका उपहास करने में, अपने को मॉडर्न व शिक्षित समझता था, वह आज उन परम्पराओं को समझने के लिए, अपने ज्ञान की परिधि बढ़ा रहा है व उसकी जड़ में जा रहा है। वह हिन्दू आज उसको स्वीकार कर, न सिर्फ गौरवान्वित हो रहा है बल्कि अपने मूल का अन्वेषण भी कर रहा है।

इन सिर्फ 5 वर्षो में इतना बड़ा परिवर्तन क्या कम है? हिन्दुओं की नस्ल जो 15 अगस्त 1947 से पहले, शताब्दियों से मुगलों और अंग्रेज़ों की दास रही है और उसके बाद उसके काँग्रेसी शासकों द्वारा थोपी गयी पाश्चात्य व वामपंथी बौद्धिकता की दास रही है, वह मोदी जी के प्रधानमंत्रित्व काल में इतना जग गयी है, क्या वह कम है?

मेरा विश्वासपूर्वक यह मत है कि मोदी जी के काल में जो 2019 तक हिन्दुओं में जागरण हुआ है वह उस पथ के निर्माण का प्रथम चरण है, जहां से मोदी जी का 23 मई 2019 के बाद का भारत, हिन्दुओं व हिंदुत्व को नये आयामों पर पहुंचाने के लिए नवीन साधनों के संग्रह उपलब्ध होंगे।

इसी के साथ, आज रामनवमी के दिन हम सभी को यह संकल्प लेना है कि हमें न सिर्फ अपना ही मत देना है बल्कि आखिरी हिन्दू तक को हमें मतदान के दिन मत स्थल तक पहुंचा कर उसका मत पड़वाना है। हम हिन्दुओं को, हिंदुत्व के स्वर्णिमकाल के अरुणोदय का साक्षी बनने के लिए, मोदी जी को एक बार फिर और बड़ी ताकत से, भारत का प्रधानमंत्री बनाना ही होगा।

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