राजनीतिक शिष्टाचार में श्री गांधी का अनन्य योगदान

आप राहुल गांधी जी के प्रशंसक भले न हों लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को आप अनदेखा नहीं कर सकते।

2004 में जब उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया तो उनके चॉकलेटी चेहरे पर फिदा लोगों ने कहना शुरू कर दिया, भला आदमी है, इसे देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए।

हाथ पकड़कर अमेठी से उनका नामांकन करते समय सोनिया गांधी भावुक हो उठी थीं। खूब फोटो छपे थे इस कोरियोग्राफ्ड भावुकता के।

यह भी याद है कि उस समय सुकुमार गांधी जी जब गर्मियों में प्रचार करने अमेठी में थे तो अक्सर उन्हें धूप और लू लग जाती थी और तत्काल उन्हें दिल्ली लौटना पड़ता था। बताते हैं कि आस्ट्रेलिया से मंगाई गई एक विशेष एअर एंबुलेंस हमेशा तैनात रहती थी कि लू लग जाने पर राहुल जी को तुरंत दिल्ली पहुंचाया जा सके।

तमाम सद्भावनाओं के बावजूद राहुल गांधी जी का राजनीतिक करियर चमक नहीं पाया। विरक्त भाव के श्री गांधी राजनीति के लिए नहीं बने थे शायद। उनका मन यूरोप और अमेरिका की वादियों में रमा करता था सो ज्यादातर समय भी वहीं बीतता था।

मां सोनिया गांधी जब तक सक्रिय रहीं तब तक उनकी अनुपस्थिति नहीं खली। लेकिन इस बीच एक के बाद एक घोटालों के बाद गांधी परिवार की विश्वसनीयता को गहरा झटका लग चुका था। स्थिति भांप कर राहुल गांधी राजनीति में सक्रिय होना शुरू हुए।

फिर उन्हें इस ग्रह के सबसे ईमानदार आदमी के तौर पर स्थापित करने के भगीरथ प्रयास शुरू हुए। इसे कांग्रेस का सबसे बड़ा मैराथन कहा जा सकता है क्योंकि पार्टी इतने लगन से आज तक किसी एक मोर्चे पर कभी डटी नहीं रही। पार्टी का इतिहास है मौकानुकूल पलटी मार लेना।

रौ में श्रीमंत गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाया गया अध्यादेश भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में फाड़ दिया। बेचारे प्रधानमंत्री विदेश में थे। वहां से घिघियाते हुए बयान आया कि राहुल गांधी जैसे महान नेता के नेतृत्व में काम करके मुझे अपार-अनंत खुशी होगी। धन्य हैं आप।

लेकिन इसी बीच गांधी परिवार के घोटालों का लाभ लेने के लिए अरविंद केजरीवाल जैसे महान व्यक्ति राजनीति में अवतार ले चुके थे जिन्होंने हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आज़ादी की दूसरी लड़ाई छेड़ी।

अरविंद सर हमेशा कई ट्रक सबूतों के साथ ही घर से निकलते थे और रोज़ महाभ्रष्ट नेताओं की सूची जारी करते। कालांतर में उन्होंने ज्यादातर से माफी मांगी और जिनसे माफी मांगने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, उनसे गठबंधन करने की चिरौरी शुरू की ताकि आज़ादी की दूसरी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जा सके।

2013 की अक्तूबर में शायद राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा के नतीजे आए। कांग्रेस सब जगह स्वाहा हो चुकी थी। आजादी की दूसरी लड़ाई के अग्रदूत को दिल्ली में 28 सीटें मिलीं। उसी शाम राहुल गांधी ने दस जनपथ पर जमा टीवी कैमरों के आगे कहा कि हम केजरीवाल से बहुत कुछ सीख सकते हैं और हम सीखेंगे।

यहां से पहली बार राहुल गांधी ने दिखाया कि वे सीखने में कितने तेज़ हैं। शुरू हुए तो लगा मानों एक ही कैसेट कहीं एक जगह अटक गया हो। कहीं सूखा पड़ गया हो या बाढ़ हो वे, वे तत्काल इसके पीछे नागपुर और संघ परिवार का हाथ ढूंढ निकालते।

ठीक ईमान बहादुर अरविंद सर की तरह वे आरोप और गालीगलौज में रत्ती भर फर्क नहीं करते। खून की दलाली, मोदी सर्कस का आदमी है, ये आदमी चोर है, चौकीदार चोर है, मोदी के दोस्तों ने गरीबों को लूट लिया, अंबानी जैसे गरीब आदमी को अरबपति बना दिया, जस्टिस लोया का खून कर दिया।

आसमान में चिड़िया भी उड़ती दिख जाए तो श्री गांधी रफाल-रफाल शुरू कर देते हैं। हां, अब अरविंद सर की तरह मानहानि के बहुत से मुकदमे भी उन पर चल रहे हैं लेकिन उन्होंने वादा किया है कि अगर परिवार की सरकार बनी तो ये मानहानि जैसी चीज़ को ही खत्म कर दिया जाएगा। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।

भाषायी कीचड़ इस हद तक बढ़ चुका है कि आज अखबारों में श्री गांधी का बयान ज्यों का त्यों छापा नहीं जा सकता। भाषा इतनी अभद्र होती है। लेकिन उन्होंने देश की जनता के सामने उदाहरण पेश कर दिया है कि नेता के लिए भाषा में संयमित होना आवश्यक नहीं।

दरअसल उनकी उपलब्धि यह है कि राजनीति में भाषायी शिष्टाचार अब अप्रासंगिक हो चुका है। “आडवाणी को जूते मारकर बाहर निकाल दिया”, युवा अध्यक्ष जी जब ऐसी भाषा का प्रयोग कर सकते हैं तो दरबारी तो दो हाथ आगे ही रहेंगे।

इस गांधी की गुरिल्ला राजनीति अब धूर्तता की पराकाष्ठा पर है। मौत से जूझ रहे मनोहर पर्रीकर से मिलने के बाद रफाल पर गटर किस्म का बयान देना, छोटी सी शिष्टाचार मुलाकात के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति के हवाले से झूठ बोलना अब असामान्य चीजें नहीं रह गई हैं।

श्री गांधी आज भारतीय राजनीति का विद्रूप चेहरा हैं। सपरिवार ज़मानत पर होने और अब भी नित नए कारनामे उजागर होने के बावजूद वे “चौकीदार चोर है” की टेर नहीं छोड़ते तो यह तो मानना पड़ेगा कि असली 56 इंच का सीना श्री गांधी के पास ही है। थोड़े से समय में राजनीतिक शिष्टाचार को रसातल में पहुंचाने का काम कोई पप्पू तो नहीं कर सकता। आदमी टैलेंटेड है।

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