आम जनता भक्त कहलवाने के लिए तैयार, क्योंकि नहीं बनना चाहती भिखारी

एक आम आदमी को ही नहीं, खास को भी जीवन में क्या चाहिए होता है?

‘रोटी, कपड़ा और मकान’

रोटी अर्थात दाल रोटी, पेट के लिए भोजन।

कपड़ा अर्थात तन का सम्मान, मान मर्यादा।

मकान अर्थात सर पर छत, सुरक्षा।

क्या आप जानते हैं दाल का रेट पांच साल पहले क्या हुआ करता था और अब क्या है? खाने पीने की अधिकांश चीजों के दाम या तो कम हुए हैं या नियंत्रित हैं। यही कारण है जो पहली बार महंगाई चुनाव का मुद्दा नहीं।

क्या इससे पहले कभी स्वच्छता और शौचालय की बात किसी ने की? तन का सम्मान सिर्फ कपड़े से नहीं होता, खुले में शौच से एक आम महिला को कितना कष्ट होता है यह आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

आज़ादी के बाद यह पहली बार है जो इस पर इस स्तर का काम हुआ। और सफल प्रयास किये गए। योग द्वारा तन को स्वस्थ रखने के लिए जागरुक किया गया।

मकान आप की सुरक्षा है, यह गर्मी, बरसात, ठंड से बचाता है। लेकिन क्या सुरक्षा के मायने आज के युग में सिर्फ यहां तक ही सीमित हैं?

नहीं।

क्या आप ने पिछले पांच साल में सड़क, मॉल, स्टेशन पर बम फूटने की बात सुनी? क्या किसी त्यौहार में आप को सतर्क रहने के लिए कहा गया? क्या आप का भय पिछले पांच साल में कम नहीं हुआ?

उपरोक्त तीन बिंदु पर चाहे जितनी चर्चा कर लीजिये, इन सवालों के जवाब आप को स्वयं मिल जाएंगे।

यही कारण है जो दरबारी, गुलाम, वामपंथी, टुकड़े टुकड़े गैंग, अवार्ड वापसी गिरोह का कुतर्क और पेड मीडिया की अफवाह सुनने को आम जनता तैयार नहीं।

इन लोगों को जब कुछ और नहीं सूझता तो ये भक्त होने का आरोप लगा कर बचना चाहते हैं।

मगर आम जनता भक्त कहलवाने के लिए भी अगर तैयार है तो सिर्फ इसलिए कि वो अब भिखारी नहीं बनना चाहती।

यही नहीं, आमजन पहली बार सड़क पर उतर कर एक नेता और पार्टी का समर्थन के साथ प्रचार भी अगर कर रहा है तो उसके मूल में ‘रोटी, कपड़ा, मकान’ ही है।

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