चुनाव, काँग्रेस और हम

काँग्रेस ने 1947 में सत्ता हाथ में आते ही यह समझ लिया था कि इस देश को लगातार अपने चंगुल में फंसाए रखना है, तो उसे कुछ उपाय करने होंगे और सोची-समझी रणनीति के तहत उसने ये किए।

-भारत में रह गए मुसलमानों को हिन्दुओं का भय दिखा कर वोट बैंक बनाना।

अ. इसके तहत मुस्लिमों को अपना सब कुछ अलग रखने की आज़ादी दी गई।

ब. उन्हें इस कदर दबाव समूह के रूप में तैयार किया गया कि अपना मदरसा रखते हुए भी वे अन्य शिक्षा संस्थानों में यह कहने का दुस्साहस खुले-आम दिखा सकें – शिक्षा का भगवाकरण नहीं चलेगा।

-हिंदू समुदाय को वर्ण-जाति के मुद्दे पर विभाजित करना, ताकि वह आपस में लड़ते हुए कभी एक शक्ति नहीं बन पाए। साथ ही, उसके समस्त प्रतीकों को क्रमशः शक्तिहीन करना।

अ. इसके तहत दस वर्षीय आरक्षण को लगातार असीमित करते हुए उसे समुदायों में कड़वाहट पैदा करने वाला बना दिया गया। देश के रक्षामंत्री के पद पर पहुंचे बाबू जगजीवन राम के परिवार की मीरा कुमार आरक्षण का समस्त लाभ लेते हुए, ब्राह्मण पति रखते हुए और लोकसभाध्यक्ष होते हुए भी दलित हैं, तो इस व्यवस्था का क्या कहना।

ब. सब जानते हैं कि अंग्रेज़ ‘सर’ की उपाधि किसे देते थे। सर की उपाधि हासिल किए सर सैयद अहमद खान बहुत बड़े शिक्षाशास्त्री हैं। इसके बावजूद कि उन्होंने एक हिन्दू महाराजा से दान में जमीन लेकर मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थापित किया। एक ऐसा विश्वविद्यालय जहां आज भी देश के टुकड़े करने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगी है और हिमायती छात्र संघ के नेता हैं। वे दूरदर्शी हैं। महान इंसान हैं कि उन्होंने अपने समुदाय को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया।

इसी के ठीक बरअक्स पं. मदनमोहन मालवीय धिक्कार के योग्य हैं कि उन्होंने काँग्रेस के बड़े नेताओं के असहयोग के बावजूद खुद के दम पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भी एक ऐसा विद्यालय, जिसमें हिंदू सिर्फ नाम के लिए जुड़ा है और जो चरित्र से पूरी तरह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए है कि हिंदू चरित्र ही धर्मनिरपेक्ष है।

स. ऐसे समस्त नेताओं को ऊपर उठाना, जो मुसलमानों को वोट बैंक बना सकते थे और ऐसे समस्त नेताओं को पार्श्व में धकेलना, जिनकी छवि तनिक भी हिंदूवादी रही। याद करें, विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर के बारे में हुए षड्यंत्र पर अलग से विस्तृत लिखूंगा), गोपालकृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक आदि असंख्य नेता हैं, जिन्हें काँग्रेस ने महज़ उनकी हिंदूवादी छवि के कारण अपनी तिजोरी में बंद कर दिया।

-काँग्रेस ने शुरुआत में यह समझ लिया था कि भारतीय वामपंथियों में इस समय सोवियत संघ का रोमान सर चढ़ कर बोल रहा है, इसलिए जवाहरलाल नेहरू की छवि ऎसी गढ़ी गई कि वे तो वामपंथ और समाजवाद के मसीहा हैं।

आज़ादी के बाद भारत आए वामपंथी कवि पाब्लो नेरूदा से किया गया नेहरू का व्यवहार सिद्ध करता है कि वह निकृष्ट कोटि का वामविरोधी, पूंजीवादी, विलासी और छद्म छविवाहक था, लेकिन ग़ज़ब है कि मेरे वामपंथी मित्र आज भी उसकी भक्ति में लीन हैं।

तो उसने वामपंथियों को चंद टुकड़े फेंक कर सत्ता में भागीदार बनाया। उनसे समझौता किया कि तुम हमारी सत्ता बचाए रखोगे, हम तुम्हें सब कुछ देंगे। यह इसलिए था कि ज्यादातर लिखने-पढ़ने वाले तब रूस से नए-नए प्रकट हुए लाल सूर्य के सम्मोहनपाश में बंधे थे।

अ. अपने इस दांव के तहत काँग्रेस ने समस्त अकादमिक काम वामपंथियों के सुपुर्द कर दिया।

ब. उन्हें नया इतिहास गढ़ने में लगाया गया। एक ऐसा इतिहास जो काँग्रेस का हित साध सके। इसी का नतीजा यह है कि आज आप भारतीयों के बजाय आक्रांताओं को महिमामंडित करने वाला इतिहास पढ़ते हैं।

इसके दो कारण थे।

एक अफ्रीकी कहावत है – अगर हिरणों का अपना कोई इतिहासकार नहीं होगा, तो उनका इतिहास शिकारी सिंह ही लिखेंगे।

ज़ाहिर है, मांस के भूखे या कहें लालची शेरों को हिरणों का इतिहास लिखने के काम में लगा दिया गया।


मित्रो, मुझे उम्मीद नहीं थी कि कलाकारों के समर्थन-विरोध पर लिखना शुरू करते हुए भूमिका ही इतनी लंबी लिख जाऊंगा कि अभी अधूरी है। आगे कल लिखूंगा।

(ज़ारी)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY