आलू से सोना बनाने की मशीन तो उनके घर लगी है, हमारे-आपके नहीं

मुफ्तखोरी कैसे पलटवार करती है, मध्यप्रदेश की वर्तमान विद्युत व्यवस्था से समझा जा सकता है।

बहुत आसान था पहले चित्र के आधार पर प्रदेश की काँग्रेस सरकार को कोसना… मैं भी ऐन यही करने जा रहा था।

फिर सोचा कि कुछ भी लिखने से पहले किसी जानकार से इस दशा की वास्तविकता और कारण समझ लिया जाए।

विद्युत मंडल के अत्यंत उच्च पदस्थ अधिकारी से संपर्क कर पूछा – ‘सर, इसका कोई तकनीकी कारण हो सकता है अथवा राजनीतिक?’

उनका उत्तर था – “बिजली खरीदने के पैसे नहीं है। विधानसभा चुनाव पूर्व विभिन्न योजनाओं में बिजली कंपनी को 3000 करोड़ का घाटा हो चुका है। वर्तमान सरकार यह पैसा नहीं दे पा रही है।”

मेरी जिज्ञासा थी – ‘भाजपा काल में तो प्रदेश को सरप्लस विद्युत वाला राज्य कहा जाता था, क्या ये सिर्फ मामाजी की लफ्फाज़ी थी?”

उनका कहना था – “बिजली उत्पादन तो है मगर वितरण कंपनियों के पास बिजली खरीदने की स्थिति नहीं है। पूरे देश में बिजली उत्पादन कंपनियों के 3 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं।”

उनके अनुसार – “चुनाव पूर्व फ्री वाली योजनाएं जैसे सौभाग्य योजना, बिजली बिल माफी योजना, 200 रुपये महीने वाली सरल बिजली योजना आदि ने बिजली कंपनियों को डुबा दिया है। वर्तमान में 100 रुपये वाली इंदिरा बिजली योजना से भी नुकसान हो रहा है।”

उन्होंने कहा – “इन सभी योजनाओं में शासन द्वारा बिजली कंपनियों को दी जाने वाली राशि नहीं मिलती। पेपर पर एकाउंट्स में क्रेडिट होता है, कि शासन से 3200 करोड़ लेना है, यह realized नहीं हो पाता।”

फिर मेरी अखबारी कतरन के उत्तर में उन्होंने पांच कटिंग्स साझा कीं, जो चित्र 2, 3, 4, 5 और 6 हैं। साथ ही दो लिंक्स भी दिए –

[Power sector woes: Govt departments owe Discoms over ₹30,000 cr in dues]

[Rs 3 lakh crore private power investment at risk as discoms delay payments]

चुनाव जीतने के लिए हमारे यशस्वी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने विद्युत चोरों को राहत देते हुए सरल बिजली योजना और बिल माफी का काम शुरू कर दिया था।

नतीजा आज सामने है… उन मुफ्तखोरों के साथ प्रदेश का समय पर बिल चुकाने वाला उपभोक्ता भी त्रस्त है।

ऎसी अनेक मुफ्तखोरी की घोषणाएं काँग्रेस ने अपने manifesto में की हैं… उपरोक्त उदाहरण से समझा जा सकता है कि हर मुफ्तखोरी की कीमत होती है और उसे उसके लाभार्थी के साथ समस्त जनता को भुगतना होता है।

आलू से सोना बनाने की मशीन तो उनके घर लगी है, हमारे-आपके नहीं।

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