करवट लेता बंगाल

सेक्यूलरिज़्म की प्रयोगशाला जर्जर और खोखली हो चुकी है। सातवें धक्के तक इसका चक्रव्यूह टूट जाएगा।

यह सिर्फ कहावत नहीं है। सच है कि बंगाल जो आज सोचता है वह बाकी भारत सौ साल बाद सोचता है।

हिंदुत्व की अवधारणा भी सर्वप्रथम बंगाल में ही जन्मी थी। हिंदुत्व शब्द का सबसे पहले प्रयोग बंगाल के ही चंद्रनाथ बसु ने किया था।

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर ने इस अवधारणा को विस्तार दिया और जन-जन तक पहुंचाया। बंकिम बाबू का वंदे मातरम आज भी हिंदुत्व का जयघोष है।

बंगाल आज फिर करवट ले रहा है। हिंदुत्व एक बार फिर उसकी चेतना को झकझोर रहा है। आम बंगाली जान चुका है कि एक यूटोपियन और विदेशी विचार के चक्कर में फंस कर उसने क्या खोया है।

आज अस्मिता का संकट खड़ा किया गया है उनके सामने। उन्हीं के नेताओं और सत्ता के गुलाम बौद्धिकों ने किया है। यद्यपि जिन्होंने देश और बंगाल का बंटवारा किया उनकी आबादी एक बार फिर बिलकुल वहां तक पहुंच चुकी है जितना बंगाल के विखंडित होने से पहले पश्चिमी बंगाल के हिस्से में थी।

बंगाल का प्रभु वर्ग जिसने खुद मलाई खाई और देशभक्त सनातनचेता सहोदरों को कम्युनिज़्म और सेक्यूलरिज़्म की अफीम खिलाई आज आतंकित है।

कोलकाता का अंग्रेजीदां लूटियन क्लब अब दबे स्वरों में हिंदु पुनर्जागरण और हिंदु पुनरुत्थान जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग कर हिंदुत्व के खतरे गिनाने में जुट गया है।

वे बंगाल के सेक्यूलर काल की खूबियां गिनाने में लगे हैं। यह कि वाम मोर्चे और तृणमूल के राज में कितनी सामाजिक समरसता थी, जो हिंदुत्व के उदय के बाद खत्म हो जाएगी। वे दीवार पर लिखी इबारत देख रहे हैं। यह कि उन्हें वीआरएस (जबरन रिटायर कर देना) मिलने वाला है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर पले सेक्यूलर कम्यूनिस्ट तृणमूलवाद ने बंगालियों को भूख, पलायन, बेरोज़गारी, गुंडागर्दी और राजनीतिक हत्याओं के अलावा क्या दिया है? लेकिन कोलकाता का लूटियन तबका अगर इसे देखेगा तो उसे इसमें अपनी भूमिका भी बतानी पड़ेगी। इसलिए दूरबीन से वह गुजरात के बच्चों में कुपोषण जरूर देख लेता है।

लेकिन दीवार पर लिखी इबारत साफ है। अब बंगाली हिंदू को धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बता कर उसकी आड़ में तुष्टीकरण, दमन और दूसरे हिस्से के बंगाल से दूसरे धर्म के बंगालियों का आयात कर उन्हें राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड और वोटर कार्ड से लैस कर सत्ता में बने रहने के दिन लद चुके हैं।

सात चरणों में चुनाव के अपने निहितार्थ हैं। यदि निष्पक्ष हुए तो “चेयरमैन माओ इज़ अवर चेयरमैन” की गर्वोक्तियों वाले अभद्र जनों को बंगाल की खाड़ी में जलसमाधि लेनी पड़ेगी।

सेक्यूलरिज़्म की प्रयोगशाला जर्जर हो चुकी है, ढहने वाली है। ग्यारह अप्रैल को बस पहला ज़ोर का धक्का देना है। सातवें धक्के में इसका चक्रव्यूह टूट जाएगा।

भगवे के साथ बंगाल फिर देश का नेतृत्व करेगा। चंद्रनाथ बसु के महाप्रयाण के 109 साल बाद हिंदुत्व फिर घर लौट रहा है। एक बार फिर विवेकानंद, बंकिम चंद्र और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर।

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