नवरात्रि ही क्यों, नवदिवस क्यों नहीं?

Kali Mata

आपको भी कभी यह विचार आया होगा कि इस 9 दिवसीय पर्व को नवरात्रि ही क्यों कहते हैं, जबकि इस पर्व से संबंधित सभी कर्म कांड हम दिन में ही करते हैं।

समष्टि स्तर पर यह महापर्व सृष्टि के निर्माण के 9 चरण हैं। अतः इस पर्व का सम्बन्ध सम्पूर्ण ब्रह्मांड से है न कि सिर्फ हिन्दू समाज से। ब्रह्मांड के 99% से अधिक भाग में सदैव गहन अन्धकार अर्थात रात्रि रहती है। ब्रह्मांड के सिर्फ 1% भाग में ही प्रकाश या दिन की उपलब्धता होती है।

यदि इस पर्व को नवदिवस कहा जाय तो सृष्टि के 99% भाग के लिए यह पर्व औचित्यहीन हो जाएगा क्योंकि वहाँ दिन कभी होता ही नहीं।

अतः नवदिवस इस पर्व के लिए बहुत छोटा शब्द है। जो इसे प्रकाश युक्त सिर्फ 1% ब्रह्माण्ड तक सीमित कर देता है।

शक्ति या देवी स्वयं भी रात्रि कहलाती है। या यूं कहें कि रात्रि देवी का ही एक रूप है। वेद पुराण के मन्त्र देवी के ही रात्रि होने की बात कहते हैं।

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुण *
(तंत्रोक्त रात्रि सूक्त )

महारात्रि महाsविद्ये नारायणी नमोस्तुते *
( सप्तशती )

कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि तथा दारुण रात्रि ये चार महारात्रियां स्वयं देवी का स्वरूप हैं ऐसा यह मंत्र कहता है।

1 – कालरात्रि – समष्टि स्तर पर महाप्रलय एवं प्रलय पश्चात की खरबों वर्ष की रात्रि कालरात्रि कहलाती है। महाप्रलय की रात्रि में ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी विलीन हो जाते हैं।
सांसारिक धरातल पर हिन्दू धर्म के कैलेंडर में नवरात्रि की सप्तमी कालरात्रि होती है, जो साधक के अहंकार ( महिषासुर ) को मार देती है।

2 – महारात्रि – ब्रह्मांड के स्तर पर महारात्रि निर्माण की रात्रि है जब इस सृष्टि का निर्माण होता है, निर्माण रजो गुण के कारण होता है जिसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है। हिन्दू कैलेंडर में दीपावली की रात्रि को ही महारात्रि कहते हैं। जब लक्ष्मी हंमारे जीवन में प्रवेश करती है।

3 – मोहरात्रि – ब्रह्मांड के स्तर पर मोहरात्रि जीव के माया द्वारा मोहग्रस्त होने की स्टेज है। इस रात्रि में जीव माया के प्रभाव में आकर प्रजनन, पोषण, आदि सांसारिक कार्य करता है। हम इसी मोहरात्रि में जी रहे हैं। धार्मिक कैलेंडर से कृष्णजन्माष्टमी की रात्रि ही मोहरात्रि है। जब अष्ट तत्व युक्त प्रकृति जीव तत्व से सयुंक्त होकर सांसारिक व्यवहार में लिप्त होती है।

4 – दारुणरात्रि – ब्रह्मांड के स्तर पर प्रलय की रात्रि को दारुणरात्रि कहते है जब पूरा संसार आग में जल रहा होता है, अर्थात पृथ्वी जल में, जल अग्नि में समाहित हो जाता है।

सांसारिक व्यवहार में होलिका दहन की रात्रि को दारुणरात्रि कहते हैं। जब जगह जगह रात में अग्नि जलती है, प्रलय के समान।

महाशिवरात्रि पाँचवी है इसका किस्सा अलग है, जिस पर फिर कभी विचार करेगें।

दीपावली, होली, नवरात्रि सप्तमी, एवं कृष्ण जन्माष्टमी की ये चार महारात्रि तंत्रसाधना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

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उपरोक्त विश्लेषण मेरे अपने अध्ययन और मनन पर आधारित है। आपके असहमत होने का अधिकार सुरक्षित है।

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