पीएम नरेंद्र मोदी फ़िल्म पर रोक : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला

सुरेश ओबेरॉय द्वारा निर्मित और ओमंग कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म पीएम नरेंद्र मोदी की रिलीज़ पर चुनाव आयोग ने 23 मई यानि लोकसभा चुनावों के सम्पन्न होने तक रोक लगा दी है।

ग़ौरतलब है कि इस फ़िल्म में विवेकानंद ओबेरॉय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का किरदार निभाते नज़र आएंगे। विपक्षी दलों ने इस फ़िल्म के रिलीज़ से डर जाने के बाद चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज की थी और कहा था कि यह फ़िल्म चुनाव को प्रभावित करने के नज़रिए से बनाई जा रही है।

बीच बीच में कई आदेशों से चुनाव आयोग ने ऐसे संकेत अवश्य दिए कि फ़िल्म रिलीज़ होगी, मगर अब संभवतः राजनैतिक दलों के दबावों में आकर चुनाव आयोग ने इस फ़िल्म पर रोक लगा दी है। चुनाव आयोग के इस फ़ैसले पर कई सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

कोई फ़िल्म चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकती है?

आश्चर्य की बात है कि जो लोग यह कहते थे कि कोई फ़िल्म किसी व्यक्ति को प्रभावित नहीं कर सकती, उन्होंने ही इस फ़िल्म के विरोध में याचिकाएं डाली; वे ही लोग इस फ़िल्म से डर गए।

यह बड़ा दुःखद है कि चुनाव आयोग तय कर रहा है हमारे देश में कि फ़िल्म किस दिन रिलीज़ की जानी चाहिए और किस दिन नहीं? क्या यह पूरा विषय निर्माता पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए? यदि फ़िल्म को देर से रिलीज़ करने पर फ़िल्म को कोई आर्थिक घाटा हुआ, तो ऐसे में क्या चुनाव आयोग इसकी भरपाई करेगा?

ऐसी क्या आपातकालीन स्थिति आ गयी कि चुनाव आयोग ने केवल पीएम नरेंद्र मोदी फ़िल्म पर रोक लगाई चुनाव तक? केवल इसलिए कि लोगों को शिकायत है, जैसा तर्क देकर चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को कैसे साबित करेगा?

सवाल केवल यही नहीं हैं। सवाल यह भी हैं कि आखिर चुनाव आयोग चुनाव के समय होने वाली किन गतिविधियों को मानता है कि वह चुनाव को प्रभावित करने के लिए कराई गई हैं?

कल को यदि विपक्षी दल यह कह दे कि मध्यप्रदेश में डलवाई गई रेड चुनाव को प्रभावित करने के लिए है, तो क्या चुनाव आयोग रेड को रोक देगी? या कांग्रेस ने यह कह दिया कि चुनाव के बीच में आतंकवादियों को पकड़ने का मतलब है चुनाव को प्रभावित करना तो क्या चुनाव आयोग यह कह देगा कि लोकसभा चुनावों के बाद ही आतंकवादियों को पकड़ें? केवल शिकायतों के आधार पर हो सकता है कल को चुनाव आयोग ऐसे भी फ़ैसले ले ले।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले निर्माता और साझा बयान पारित करके भाजपा के विरुद्ध वोट करने के लिए आग्रह कर चुके फ़िल्मकार अब इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के यहाँ बंद होने पर चुप हैं। अब वे यह कह नहीं पा रहे हैं कि फ़िल्म बनाना किसी की अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता है और उसकी रिलीज पर रोक लगाकर आप उसकी स्वतंत्रता का हनन कर रहे हैं।

ऐसी ही स्थिति पंजाब में विधानसभा चुनावों से पूर्व आयी थी जब सेंसर बोर्ड ने उड़ता पंजाब फ़िल्म को रिलीज़ करने से रोक दिया था जिसे निर्माताओं ने एकजुट होकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कहा था। अब देखना यह है कि क्या वे निर्माता और निर्देशक इस बार भी साथ आते हैं या उनके विचार उनके छद्म बुद्धिजीवी होने का प्रमाण हैं?

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