हमें परिवार, समाज और राष्ट्र में ढूंढना चाहिए, अपने जीवन के अर्थ

एक मित्र ने लिखा कि ‘आदमी एक बंधुआ मज़दूर है इस सृष्टि में, इसके अलावा कुछ नहीं…

20-25 साल बेमन से ज़बरदस्ती की पढ़ाई… 20-25 साल की कमाई कुछ डिग्रियां… फिर काम की भाग दौड़… दिन भर मशीन बनकर देश-दुनिया-समाज-रिश्तेदार-उद्देश्य-लक्ष्य से दूर रहना… देर शाम थककर आने पर फिर से कुछ खाद्य पदार्थ ठूंसकर सो जाना, अगले दिन की फिर से शुरू होने वाली भागदौड़ के लिए।’

इस विषय को मैं विस्तार देना चाहूंगा।

फ़्रांसिसी विचारक जाँ जाक रूसो ने कहा था कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।”

एक पल के लिए सोचिये… पैदा होते ही हमें एक नाम, पहचान, परिवार, समाज और राष्ट्र मिल जाता है। हमें कुछ सामाजिक मर्यादाओ में रहना पड़ता है, अपनी सुरक्षा और प्रगति के लिए सामाजिक अनुबंध से बंधना पड़ता है। नहीं तो हममें और पशुओं में क्या अंतर रह जाएगा?

यह सत्य है कि एक आम भारतीय परिवार बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ज़ोर देता है, उन्हें डिग्री और नौकरी प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है। लेकिन जब नौकरी मिल जाती है, तो कुछ ही समय में उस नौकरी की दिनचर्या और तारतम्य से बोरियत होने लगती है।

मुझे याद है जब मैंने भारतीय सूचना सेवा जॉइन की थी तो ट्रेनिंग के तुरंत बाद ओड़िसा के मंत्री के. पी. सिंह देव के आदेश पर सचिव भास्कर घोष ने पांच प्रोबेशनरी अधिकारियों को ओड़िसा पोस्ट कर दिया। मज़े की बात थी कि वहां पर कोई भी रिक्त पद नहीं था। बाकी बैचमेट अपने कनेक्शन के कारण बच गए, लेकिन मुझे तुरंत कटक जाना पड़ा।

अब मीडिया के क्षेत्र में बिना भाषा (ओड़िया) जाने मैं काम कर ही नहीं सकता था। ऊपर से मेरे बॉस, मुझसे 17 वर्ष सीनियर, एकदम ख़डूस, बद्तमीज़ और कामचोर। कहाँ मैं ओड़िया न जानने के बावजूद काम करने के लिए उतावला हो रहा था, कहाँ बॉस ऑफिस आते ही नहीं थे। निर्देश फोन पर दे देते और स्टाफ उनके साइन करवा लाता था।

महीने में एक-आध दिन भूले-भटके उनसे मुलाकात हो जाती थी। एक बार भी एक कप चाय साथ नहीं पी, भोजन की बात भूल जाइये।

सारा दिन मैं बिना काम के बिना बिजली के एक अँधेरे, गर्म, उमस से भरे कमरे में खाली बैठा रहता था। लगता था रिज़ाइन करके भाग जाऊं।

खैर मैंने कोणार्क के सूर्य मंदिर के ठीक सामने के एक सस्ते होटल में कई वीकेंड बिताये। प्रातः काल सूर्य की पहली किरण जब मंदिर को स्पर्श करती थी और रात में बिजली की रोशनी में चमचमाते मंदिर के प्रांगण में मैंने अकेले घंटों बिताये और एक अतुलनीय शांति और आध्यात्म का अनुभव किया।

एक भी पर्यटक या मनुष्य आस-पास नहीं। इसी प्रकार जगन्नाथ पुरी के मंदिर में पंडो के विघ्न डाले बिना घंटो व्यतीत किये और रात्रि को प्रसाद खरीदकर स्वादिष्ट भोजन किया। कटक में ही खाना बनाना सीखा।

चूंकि मैंने समझ लिया था कि मेरी पोस्टिंग ओड़िसा में थी, जबकि पोस्ट दिल्ली में, अतः मैंने भारत सरकार लो लिखा और 6 महीने तक वेतन के अलावा DA भी लिया। चूंकि मैंने 6 महीने बाद भी DA की मांग की, मुझे अंततः डेढ़ वर्ष बाद दिल्ली वापस बुला लिया।

दिल्ली में किसी ने भी यह नहीं पूछा कि मैंने ओड़िसा में क्या कार्य किया या नहीं किया। मेरे ट्रांसफर की पेटिशन से नाराज़ और परेशान वरिष्ठ अधिकारियो ने मेरी पोस्टिंग हिंदी यूनिट में कर दी जो ‘बेकार’ और ‘निकम्मे’ अधिकारियों के लिए उपयुक्त जगह मानी जाती थी।

लेकिन फिर भी मैं कार्यालय रोज सुबह ठीक नौ बजे आ जाता था। टाइम पर आना मेरी आदत थी, काम हो या न हो। एक बार विभागाध्यक्ष को कुछ काम करवाना था और पूरे ऑफिस में वे स्वयं अधिकारियों को ढूढने गए। सब नदारद, सिवाए मेरे। उस एक घटना ने मुझे हिंदी यूनिट से बाहर निकाल लिया और फिर एक से बढ़ कर एक पोस्टिंग मिली।

एक तरह से ट्रेनिंग के बाद मेरी सरकारी नौकरी के पहले तीन वर्ष व्यर्थ हो गए थे। बिना कार्य किये वेतन और भत्ता लिया।

जब मैं प्रधानमंत्री कार्यालय का मीडिया मैनेजमेंट देख रहा था, तब मुझे हफ्ते में सातों दिन ऑफिस जाना पड़ता था। छुट्टी बहुत मुश्किल से मिलती थी। उस समय पत्नी अलीगढ़ से MD कर रही थी और तभी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उसी महीने पहली बार पिता को भी 15 दिन की paternity leave (पितृत्व अवकाश) मिलनी शुरू हुई थी जो मना नहीं की जा सकती थी।

खैर, 15 दिन की छुट्टी 3 महीने खींच दी। परिणामस्वरूप कृषि मंत्रालय भेज दिया गया। लेकिन उन तीन महीने पत्नी, अपने शिशु और परिवार के साथ बिताये पल अभी भी याद है।

बाद में फ्रांस गए, वहां स्ट्रासबर्ग में पत्नी Ecole nationale d’administration (राष्ट्रीय प्रशासनिक विद्यालय) के पास स्थित पार्क में पुत्र को खिलाने ले जाती थी। क्लास समाप्त होने के बाद मैं उस पार्क में जाता था, कुछ समय पुत्र के साथ खेलता, फिर स्ट्रासबर्ग की पुरानी सड़को पर टहलते हुए घर वापस चले जाते थे।

यही हाल न्यू यॉर्क में था जब ब्रयांट पार्क में पत्नी-पुत्र प्रतीक्षा करते और मैं ऑफिस के बाद सीधे पार्क में उनसे मिलता और फिर न्यू यॉर्क के कोने-कोने को नापना।

अब कार्य रूटीन लगता है। लेकिन मन लगाए रखने के लिए कार्य सम्बन्धी विषय से अलग पुस्तकें पढ़ना, बागवानी करना, खाना बनाना, पर्यटन, इत्यादि बोरियत का अहसास नहीं होने देते।

सपरिवार भोजन करते समय हम साथ बिताये पलों की बात करते हैं, न कि मैंने क्या कार्य किया, किससे मिला इत्यादि।

आज तक पुत्र ने केवल एक खिलौने की ज़िद की थी, वह भी पेरिस में। पैसे से तंग होने के कारण उसे खिलौना दिलाने से मना कर दिया जिसके कारण वह पहली बार गला फाड़कर रोया था। चूंकि दुकान बंद होने वाली थी, मैं वापस भागकर गया और उसके लिए वह खिलौना – Buzz Lightyear – खरीदकर लाया। आज भी वह खिलौना हमारे पास है।

सारांश यह है, कि हर कार्य एक समय के बाद बोरिंग और रूटीन लगता है। हमें जीवन के अर्थ अपने परिवार, समाज और राष्ट्र में ढूंढना चाहिए।

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