कश्मीर के हिन्दू अतीत को सामने रखने से भी घबराती हैं भारत की सरकारें

विस्थापन के बाद जन्म ले चुकी कश्मीरी पंडित पीढ़ी बड़े अटपटे प्रश्न पूछती है।

कल एक मित्र ने कहा कि उनकी आंखों के सामने कांस्टीट्यूशन क्लब में एक कश्मीरी पंडित युवती ने भूतपूर्व राज्यपाल जगमोहनजी से पूछा था कि आपने हमारे परिवारों को कश्मीर से भागने के लिये प्रेरित क्यों किया?

ख़तरनाक प्रश्न है क्योंकि कश्मीरी जिहादी अक्सर जगमोहनजी को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के लिये ज़िम्मेदार ठहराते हैं। आततायियों के विमर्श को अपनाने की यह स्थिति कैसे पैदा हुई यह समझना बहुत कठिन नहीं है। और क्या वास्तव में यह प्रश्न आततायियों के विमर्श का पक्षधर है?

यदि इसे आततायियों के विमर्श की पक्षधरता माना जाये तो ऐसा हुआ ही क्यों?

आततायियों के विमर्श को उत्पीड़ित समुदाय इसलिये अपनाता है कि उसका अपना विमर्श खो चुका होता है या जिस विमर्शात्मक पर्यावरण में वह रहता है उसमें उसके सामुदायिक विमर्श के फलने फूलने की कोई संभावना नहीं होती।

अनेक विस्थापनों का शिकार कश्मीरी पंडित समुदाय भी 1947 में एक नये संविधान में सांस ले रहा था। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख इत्तिहाद का नारा लगाने वाले शेख़ अब्दुल्ला में उसे भरपूर आस्था थी।

कश्मीरी पंडित नेशनल कान्फ्रेंस में चला गया। उसे नया कश्मीर बनाना था। नया कश्मीर तो बनता रहा पर उसके साथ साथ कश्मीरी पंडित भी धीरे-धीरे बाहर होता चला गया।

वह कांग्रेस में गया, नेहरू और इंदिरा का भक्त बना, कम्युनिस्ट बना। नौकरियों से बाहर होता चला गया तो उसने शेष भारत का रुख़ किया। संख्या कम होती चली गयी।

भारत का कोई भी हिन्दू संगठन कुछ नहीं कर रहा था हालांकि अनेक कश्मीरी पंडित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रखर स्वयंसेवक थे और अनेक बार जेल भी जा चुके थे। ये स्वयंसेवक निडर थे और हिन्दुत्व के कार्य के प्रति सदैव प्रस्तुत रहते थे। वे किसी भी कश्मीरी पंडित की सहायता के लिये तत्पर रहते थे। पं. टिक्का लाल टपिलू और पं. सतीश तिक्कू ऐसे ही कश्मीरी पंडित थे। दोनों मारे गये।

ऐसा क्यों हुआ कि नये भारत के बनने के बाद, नये संविधान के बाद कश्मीरी पंडितों की स्थिति बदतर होती चली गयी और मुसलमान मज़बूत होते चले गये? क्यों संविधान पर विश्वास करने वाले कश्मीरी पंडितों को आज कायर कहा जाता है?

वे कहते थे कि हमें छुआ भी तो भारतीय सेना किसी को भी नहीं छोड़ेगी और शेष भारत में हिन्दू मुसलमानों को नहीं छोड़ेंगे।

दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ।

भारतीय सैनिक जिहादियों के हाथों मारे जाने लगे और शेष भारत के हिन्दू चुप थे।

आज भी अक्सर हिन्दू यह सुझाव देते दिखाई देते हैं कि घर में हथियार रखो और हथियार चलाना सीखो क्योंकि सरकार काम नहीं आयेगी। सरकार और संवैधानिक लफ़्फ़ाज़ी में आस्था ख़त्म होती जा रही है।

भारत के हिन्दू चुप थे और अफ़्ग़ानी और पाकिस्तानी आतंकी घाटी में जिहाद करने लगे थे। बहुसंख्यकता के दंभ में भारत के हिन्दुओं के लिये कश्मीर का कोई अर्थ नहीं था।

स्वतंत्र भारत में संविधान की छत्रछाया तले भारतीय हिन्दू का एक हिस्सा काटा जा रहा था और भारत में आज़ादी के आवरण तले काम कर रहे कश्मीर के जिहादी विमर्श का कोई प्रतिविमर्श नहीं था।

भारत धीरे धीरे घुटने टेक रहा था और आज स्थिति यह है कि कश्मीरी नेता धमकी देते हुये दिखाई दे रहे हैं कि 370 हटा तो भारत का झंडा नहीं रहेगा कश्मीर में। यह संविधान का परिणाम है, 370 का परिणाम है।

क्या यह भारत के संविधान की, देश के रूप में भारत की असफलता नहीं है?

भारत की सरकारें कश्मीर के हिन्दू अतीत को सामने रखने से भी घबराती हैं। प्रख्यात कश्मीरी राजनीतिशास्त्री डॉ. एम. के टेंग का कहना सही है कि भारतीय राजव्यवस्था भारतीय सभ्यता के विरुद्ध रहकर कार्य करती है।

हर समुदाय की एक बाह्य और आंतरिक व्यवस्था होती है। आंतरिक व्यवस्था उसके सदस्यों के उस व्यवहार से बनती है जिससे समुदाय का अंतर्गठन निर्मित होता है। बाह्य व्यवस्था समुदाय से बाहर देश विदेश के स्तर पर किये जाने वाले व्यवहार से निर्मित होती है जिसके अंतर्गत राज्य और केन्द्र सरकार के साथ अंत:क्रिया भी आती है।

कश्मीरी पंडित ने संवैधानिक और सरकारी विमर्शों को जिहादी विमर्श के सामने घुटने टेकते हुये देखा। समुदाय की आंतरिक व्यवस्था छिन्न भिन्न थी। कुछ संघी, कुछ वामी और कुछ कांग्रेसी थे।

संघी तमाम तत्परता के बावजूद निम्न बौद्धिक स्तर के माने जाते थे क्योंकि वे धर्म निरपेक्ष नहीं थे हालांकि अनेक पूजापाठी थे जो संघी नहीं थे। धार्मिक होते हुये भी भाईचारे की भावना रखने वाले थे।

बाह्य व्यवस्था यानी देश और सरकार भी कश्मीरी पंडित के साथ नहीं थे। कश्मीरी पंडित के पास कुछ भी नहीं था। हम लोग जिन्होंने जगमोहन जी को देखा और समझा है, जानते हैं कि जहां संविधान का कोई अर्थ ही न रह गया हो वहां जगमोहन जी हमें बाहर तो निकाल नहीं सकते थे, मगर निकलने से रोक भी नहीं सकते थे। हम निकलते रहे वे कैसे रोकते? कब कौन मारा जाये कुछ कहा नहीं जा सकता था।

लेकिन जो युवा विस्थापन के बाद कश्मीर से बाहर पैदा हुआ उसमें स्थिति को लेकर एक अजीब तरह का क्षोभ है। वह संविधान की बड़ी बड़ी बातें सुनता है और अतीत पर नज़र डालता है तो देखता है कि उसके इतिहास में संविधान हारता चला गया है और जिहाद जीतता चला गया है। क्या फ़ायदा क़ानून और व्यवस्था की बड़ी बड़ी लफ़्फ़ाज़ियों से? राजव्यवस्था के थोथे नैतिक विमर्शों से?

जगमोहनजी निस्संदेह हमारे रक्षक हैं। पर भारतीय राजव्यवस्था के प्रतिनिधि के रूप में उनसे यह प्रश्न बहुत ही उचित है कि उन्होंने क्यों प्रेरित किया कश्मीरी पंडितों को निकलने के लिये? वे जिहादियों पर कार्रवाई करके कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा दे सकते थे? उन्हें बसाये रख सकते थे?

नागरिक सुरक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है और भारत सरकार असफल सरकार थी। निरर्थक सरकार। जिहादियों के सामने झुकी हुई सरकार।

आज की कश्मीरी पंडित पीढ़ी जगमोहन जी की ‘फ्रोज़न टर्बुलेंस‘ जैसी मोटी किताब नहीं पढ़ती। वह सीधे प्रश्न पूछती है। लड़की ने नहीं कहा कि आपने निकाला। उसने कहा कि प्रेरित क्यों किया निकलने के लिये?

सरकार को प्रेरित तो नहीं करना चाहिये था। यह सत्य है। पर जिहादी लगभग ऐसा ही विमर्श पहले ही तैयार रखे हुये थे कि जगमोहन ने निकाला। लड़की का विमर्श इसी के निकट था। जिहादी विमर्श का प्रभुत्व कैसे स्थापित होता है समझना आवश्यक है। उन्होंने सीधे ही प्रशासक को ज़िम्मेदार ठहराया। यह सच ही है। प्रशासक ज़िम्मेदार तो होता ही है।

जगमोहनजी को एक असफल, असहाय सरकार ने कश्मीर भेजा था। उन्होंने जो किया वे तत्कालीन परिस्थितियों में उससे अधिक नहीं कर सकते थे। उन्होंने कश्मीरी पंडितों को निकलने से रोका नहीं। यह उनका ऐतिहासिक योगदान है।

वे एक असफल संवैधानिक-राजनीतिक परंपरा द्वारा भेजे गये प्रतिबद्ध, ईमानदार और अत्यंत साहसी गवर्नर थे जिन्हें सफल होने से पहले ही जिहादी साज़िशों के प्रभाव में वापस दिल्ली भेज दिया गया।

पर यह प्रश्न कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों को निकलने के लिये प्रेरित क्यों किया, गवर्नर जगमोहन से नहीं, उस असफल संवैधानिक-राजनीतिक परंपरा से है जो स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं को उनके जन्मस्थान से उखाड़ फेंकती है और जिहादियों को प्रोत्साहित करती है कि वे भारत के अन्य स्थानों में भी कश्मीर बना दें।

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