बाहुबली के बहाने : कुछ तो ऐसा करो कि वामपंथी रात के अंधेरों में बाल नोंचते मिले

बाहुबली फ़िल्म पर जितना विमर्श होना चाहिए, उतना हुआ नहीं। यह फ़िल्म महाकाव्यश्रेणी की है, स्वयं में कई सन्देश समेटे।

जयप्रकाश चौकसे ने अपनी हरेक समीक्षा में एक बार इस फ़िल्म पर खेदपूर्ण खीझ अवश्य निकाली है। भव्य भारत के चित्रण से वामपंथियों को सदैव चिढ़ रही है और ऐसा हरेक प्रसंग आने पर वे प्रायः पागल हो जाते हैं।

जब भी भारत का कोई भी गौरवपूर्ण प्रसंग आता है, ये लोग दारू ज्यादा पी लेते हैं और आधी रात को उठकर अपने बाल नोचते हैं।

बहरहाल, मैं जो विषय उठा रहा हूँ, वह है लोकप्रिय शासक का निर्वासन। जयजयकारा गीत इसी प्रकरण पर आधारित है और बाद में नायक की हत्या भी हो जाती है।

रामायण में भी वनवास है और महाभारत में भी। भले शासक को सत्ताच्युत करने वाली ताकतें कम ही होती हैं लेकिन वे पूरे मनोयोग से इसमें लगी रहती हैं।

जैसे,,, उदाहरण के लिए आपका शरीर है, इसे समाप्त करने का रोग(आसुरी ताकत) उसी दिन से इसके पीछे पड़ गया है जिस दिन यह अस्तित्व में आया था।

अभी आप जीवित हैं, इसलिए…… क्योंकि आपके प्राण ने उसे (रोग को) हावी नहीं होने दिया है। मगर, ज्यों ही उसे मौका मिलेगा, वह एक क्षण की भी देरी किये बिना इस देह को समाप्त कर देगी।

राज्य में कुछ लोग हमेशा से इसी अभियान में लगे रहते हैं कि कब मौका मिले और कब घात लगाएं। भारतीय महाकाव्यों में प्रायः ये लोग विकलांग मानसिकता के दर्शाए हैं।

बाहुबली में बिज्जलदेव, महाभारत में शकुनि और रामायण में मंथरा। शारिरिक विकलांगता तो उनका बाह्य चिह्न है, वस्तुतः वे भयानक भीतरी विकलांगता से आक्रांत होते हैं। भारतीय वामपंथियों की ही तरह वे भी जब दुनिया खुश होती है तब अपने बाल नोचते हैं। परपीड़ा का उत्सव मनाते हैं और मौके का इंतजार करते हैं।

असमय ही मृत्यु से बचना है तो प्राण मजबूत करो। यदि आप चाहते हैं कि लोकप्रिय शासक के निर्वासन की कहानी दुहराई न जाए, तो प्रयत्न करें। आपका आलस्य देह के नाश की गारंटी है, ठीक वैसे ही तटस्थ पब्लिक भी राष्ट्र के विनाश की गारण्टी है।

बाहुबली मर गया तो महिष्मति को 25 साल इंतजार करना पड़ा। यह इंतजार, उन्होंने (जनता ने) कोई मन्त्रजाप करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से नहीं पूरा किया था???? उन्हें रोना पड़ा था। वे लुटे,पिटे, तबाह हुए। आबरू लुटाकर पददलित हुए। उन पर चाबुक बरसाए गये पर वे नीची गर्दन कर, अपनी इज्जत को बेचते रहे, कथमपि जीवित रहे।

हम अनेक अवसरों पर चूके हैं। “मत चूके चौहान” भी नारा तब अस्तित्व में आया, जब कि चौहान तो चूक ही गया था। बाद में एकाकी पराक्रम के कोई मायने नहीं।

हमने महाराणा सांगा को और हेमचंद्र को इसी तरह बाजी हारते देखा है। मराठे भी ऐनवक्त पर चूक गए। 1857 में भी यही हुआ। 1947 में वही कहानी फिर दुहराई गई।

हम अपने महाकाव्यों के सन्देश समझने में हर बार गलती करते हैं। बाद में शताब्दियों तक रुदन और पलायन की यंत्रणा तो सह लेते हैं, मगर जब सक्रिय होना हो, उन निर्णायक क्षणों में व्यामोह में फंस जाते हैं।

क्या इतिहास स्वयं को दुहराता रहेगा? क्या इस अभागे देश में इन आत्मघाती सिलसिलों का कोई अंत नहीं?

क्या सच में तुम एकाकी रुदन की मशीन बनने को जन्मे हो? जो बार बार एक ही ऑडियो रिपीट करती है?

एक बार बाहुबली पुनः देखिये।

यह राजामौली आधुनिक युग में तुलसीदास का ही पुनर्जन्म है।

कुछ तो ऐसा करो यार,,,, कि वामपंथी रात के अंधेरों में बाल नोंचते हुए मिले।
सच में बड़ा अद्भुत आनन्द है उन दृश्यों को देखने में।

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