क्या भारत अपने परमाणु बम को धार्मिक मान्यता देना चाहता है?

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भारत ने जब 1998 के वसंत में अपना भूमिगत परमाणु परिक्षण किया तो किसी समाचार पत्र में इसे ‘शक्ति परीक्षण’ और पोखरण को ‘शक्ति-पीठ’ लिखा गया। विदेशी समुदाय को लगा कि क्या भारत अपने परमाणु बम को धार्मिक मान्यता देना चाहता है?

इसी प्रश्न के साथ जून मैकडेनियल अपनी किताब की प्रस्तावना शुरू करती हैं। भारत में शक्ति की उपासना के भिन्न रूपों के अध्ययन पर उन्होंने कई वर्ष व्यतीत किये हैं। उनकी किताब “ओफ्फरिंग फ्लावर्स, फीडिंग स्कल्स” ख़ास तौर पर बंगाल और उससे जुड़े क्षेत्रों की तांत्रिक उपासना पर ध्यान देती है।

भारत के अलग अलग क्षेत्रों में शक्ति की उपासना के रूप भी अलग-अलग हैं। एक अच्छा उदाहरण ये हो सकता है कि जैसे उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में दुर्गा-पूजा के दौरान “चंडी-पाठ” के लिए देवी महात्म्यं का, यानि दुर्गा सप्तशती का इस्तेमाल होता है, वैसे ही दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में “सौन्दर्य-लहरी” भी प्रचलित है।

ये काफी कुछ वैसा है जैसे एक ही समय मनाये जाने वाले पर्व को सांस्कृतिक रूप से कहीं गुड़ी पर्व, कहीं वसंत नवरात्र और कहीं उगाडी भी बुलाते हैं। इस अनेकता से भारत को ये भी फायदा है कि केवल एक उपासना पद्धति को निकृष्ट घोषित करके आक्रमणकारी धर्म परिवर्तन को बढ़ावा नहीं दे पाए।

संभवतः इसी वजह से आजकल सभी मंदिरों में एक सी उपासना पद्धति हो, इसके लिए कानूनी हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं। तांत्रिक उपासना पद्धतियों में अक्सर प्रतीकों का इस्तेमाल ज्यादा होता है। दूर से देख रहे लोगों, कम अनुभवी (अंगूठा चूसने वाले बच्चों), या फिर प्रचलित फिल्मों के आधार पर इसे समझने निकले लोगों के लिए समस्या होगी। उदाहरण के तौर पर मीन (मछली) के प्रयोग को देख सकते हैं। मान्यताओं के अनुसार कुण्डलिनी के जागरण पर रीढ़ की हड्डी में ऊपर और फिर नीचे की तरफ मछली के गुजरने जैसा अनुभव होता है। थोड़े मासूम लोग इसे स्थूल रूप में मछली खाना भी मान सकते हैं।

उन किस्म की फिल्मों को देखकर निकले लोग मारण, मोहन, स्तम्भन, वशीकरण और उच्चाटन के भी अनोखे अर्थ निकालते हैं। मारण, कामनाओं या वासनाओं की समाप्ति का प्रयास होता है। मोहन, इष्टदेव को अपनी ओर आकृष्ट करना, ध्यान दिलाना होता है। स्तम्भन, मन को इधर उधर भागने से रोकने के अर्थ में इस्तेमाल होता है। वशीकरण दूसरे किसी को नहीं, स्वयं को वश में या नियंत्रण में रखने के लिए है। उच्चाटन का मतलब इस जन्म में जिस अध्यात्मिक स्तर पर हैं, उससे और ऊँचे स्तर पर आरोहण के लिए प्रयुक्त होता है।

भारत के लिए धर्म कोई सामाजिक विषय नहीं, अत्यंत निजी मामला है। आप मांसाहारी हैं या शाकाहारी, मंदिर में जाते हैं या नहीं जाते, जाते भी हैं तो शिव मंदिर जाते हैं या दुर्गा-मंदिर, रामायण पढ़ते हैं या दुर्गा सप्तशती, ये सभी आपके निजी फैसले होते हैं। इनके सम्बन्ध में आपको किसी ऊँचे मकान-छज्जे पर चढ़कर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। इसलिए किसी का कहा-लिखा भी पूरी तरह मत मानिये। खुद ही पढ़ना-अभ्यास करना होगा। इस तरह के कोई शोध कभी हिन्दी में लिखे, छापे गए हों, तो मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं। इसलिए पहले ही बता दें कि “ये पुस्तक हिन्दी में आती है क्या?” का प्रश्न जाने दें।

गुड़ी पर्व, वसंत नवरात्र, उगाडी, चैती छठ, रामनवमी जैसे कई पर्वों के आयोजन प्रतिपदा से शुरू होते हैं। आप सभी को त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाएं! आशा है इस नवरात्र धर्म थोड़ा और जागेगा…

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