हमारी आदर्शवादी बातों के कारण ही तो नहीं, मज़बूत हो रहा टुकड़े टुकड़े गैंग!

परम आदरणीय आडवाणी जी, सादर चरण स्पर्श।

पत्र लिख रहा हूँ तो पहले अपना परिचय देना आवश्यक हो जाता है।

मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि पत्र में मेरे शब्द और विचार ही मेरा परिचय देंगे। और फिर मेरे पास इसके अतिरिक्त और कुछ है भी नहीं।

दूसरी तरफ मेरे शब्द भी बौने होने लगते हैं जब वे आप के विराट व्यक्तित्व के सामने खड़े होने का प्रयास करते हैं। आप का तो नाम ही काफी है आप की पहचान के लिए।

हिंदुत्व के आप, प्रथम तो नहीं कह सकता मगर प्रमुख योद्धा रहे हैं। वो भी तब जब सेक्युलर के नाम पर हिन्दू-विरोधी होना अपने चरम पर था।

यह आप के व्यक्तित्व का आकर्षण ही था जो 2009 के चुनाव में मैंने ईश्वर से आप के लिए विजयश्री का वरदान माँगा था। और यकीन से कह सकता हूँ कि मैं अकेला राष्ट्रवादी नहीं था, अनेक थे और पूरे उत्साह के साथ हर सम्भव प्रयास कर रहे थे। परन्तु नियति को कुछ और स्वीकार था।

पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगता है कि शायद आप इसे आज तक स्वीकार नहीं कर पाए। उस असफलता के विश्लेषण करने की मेरी कोई योग्यता नहीं, लेकिन कुछ एक सवाल मैंने अपने आप से ज़रूर पूछे थे, जिनका जवाब मैं स्वयं नहीं दे पाया। उसमें से एक था सुधींद्र कुलकर्णी का नाम, जो आज तक मेरे लिए एक सवाल ही बना हुआ है कि यह आप का निर्णय आप के स्वयं के लिए कितना उचित था?

बहरहाल, समय आगे बढ़ा, बढ़ना ही था और फिर 2014 आया, अपनी नई पीढ़ी के साथ।

नए समय को तो आना ही है तो फिर पुराने समय को जाना ही पड़ता है। प्रकृति की यही व्यवस्था है। परिवार व समाज में भी इस नए-पुराने का चक्र चलता रहता है।

आजकल मैं सनातन जीवन संस्कृति का अध्ययन और उस पर लेखन कर रहा हूँ। मेरी छोटी-सी बुद्धि यह देखकर आनंद में डूब जाती है, जब यह पाती है कि वैदिक संस्कृति के हर संस्कार के पीछे अध्यात्म और दर्शन के साथ-साथ उसका पारिवारिक और सामाजिक दृष्टिकोण भी है।

सास-बहू-ननद आदि घर की स्त्रियों में आपस में स्नेह बना रहे इसकी भी व्यवस्था सनातन के पर्व-उत्सव और त्योहारों में है। ऐसे ही अनेक उदाहरण हैं जिनका विस्तृत वर्णन मैंने अपनी पुस्तक ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व‘ में किया है। ऐसा ही कुछ कुछ आश्रम व्यवस्था में भी मैं देखता हूँ।

जब इसका सूक्ष्म विश्लेषण करता हूँ तो पाता हूँ कि जीवन की तीसरी पारी संन्यास और चौथी पारी वानप्रस्थ के पीछे भी उत्तम पारिवारिक व्यवस्था बनी रहे, इसके गहरे सन्देश छिपे हुए हैं।

ऐसे में 75 की उम्र पार के राजनेताओं के संदर्भ में भाजपा का जो निर्णय है, वो कितना सनातन जीवन दर्शन से प्रभावित है, यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन यह मुझे सनातन जीवन मूल्यों के बेहद करीब नज़र आता है।

क्या आप इस सनातन व्यवस्था से सहमत नहीं हैं, जिसमें दादा को पोते के आते ही स्वयं सन्यास लेना अपेक्षित है?

इस संदर्भ में बताता चलूँ कि महान भारत में ऐसे अनेक महान सम्राट हुए जिन्होंने अपने जीवन में ऐसा करके इतिहास में आदर्श प्रस्तुत किया। जबकि जिन संस्कृति में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं, वहां का इतिहास ऐसी ऐसी अमानवीय घटनाक्रम से भरा हुआ है कि इतिहास भी लज्जित हो जाए।

भारत में ही खिलजी से लेकर मुग़ल वंश को देख लीजिये, शाहजहां के साथ क्या हुआ था?

जैसे जैसे हम भी ऐसी विदेशी सोच के प्रभाव में आते जा रहे हैं, वैसे वैसे हमारे घर-परिवार में भी किस तरह की समस्या आ रही है, उसको लेकर अखबार भरे हुए होते हैं, जहां कलयुगी बेटा अपने बाप को ही कैद कर लेता है या घर से निकाल देता है या फिर इतना तंग करता है कि जीवन नरक बन जाता है। उत्तरप्रदेश -बिहार से लेकर मायावी नगरी मुंबई के अनेक उदाहरण पिछले दिनों सुर्ख़ियों में थे।

ऐसे में, जब भी कोई विपक्षी आप के मार्गदर्शक मंडल में होने को लेकर भाजपा पर तंज़ कसता है, तो मुझे पक्का यकीन है कि आप को अधिक बुरा लगता होगा, क्योंकि आप नब्बे पार कर रहे हैं फिर भी आप को आज भी पूरा यथोचित सम्मान प्राप्त है। यह संघ के संस्कार हैं।

हाँ, भूमिका में परिवर्तन स्वाभाविक है लेकिन वह भी सनातन संस्कारों की आदर्श व्यवस्था के अनुरूप ही है। हिंदुत्व के योद्धा होने के कारण आप इस बात को तो मानेंगे कि हमारे ऋषियों की कोई भी व्यवस्था गलत नहीं हो सकती, क्योंकि वो लम्बे अनुभव पर आधारित होती है। मगर आप की इस विषय पर चुप्पी मुझे खलती है। दुनिया चाहे आप को लेकर जो कुछ भी कहे मगर मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं कि आप जैसा संगठन का आदमी नई पीढ़ी के आगे आने में रुकावट बनेगा।

इस बीच आप का ब्लॉग एक बार फिर चर्चा में है। इसमें आप ने जब देश प्रथम कहा तो मुझे पुनः गर्व हुआ। मगर फिर अगली पंक्ति समझ नहीं पाया कि मतभेद रखने वाले को दुश्मन नहीं समझा जाए बल्कि सिर्फ विरोधी माना जाए।

यह पढ़ते ही ऐसे अनेक नाम और चेहरे नजरों के सामने घूम गए और उनके कथन कानों में गूँजने लगे, जिसमें वे भाजपा विरोध करते हुए देश विरोध करने लग पड़े हैं।

एक उदाहरण देता हूँ, अंग्रेज़ी की एक तथाकथित लेखिका हैं, जो खुलेआम कहतीं हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी था ही नहीं।

वैसे तो उनके सीमित इतिहास ज्ञान को देखकर कोई भी हंसेगा, क्योंकि जिस कश्मीर के नाम में ही कश्यप ऋषि का नाम आता हो जिसकी राजधानी श्रीनगर में लक्ष्मी का निवास माना गया हो, उसका इतिहास कितना प्राचीन हो सकता है इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

मगर वो महिला समझने और सुनने को तैयार ही नहीं, क्योंकि वह एक एजेंडा के तहत ऐसा कहती और बोलती हैं। क्या यह हमारे देश, जिसे आप स्वयं प्रथम स्थान पर रखते हैं, उस पर वार नहीं हुआ?

ऐसे में देश के दुश्मनों को सिर्फ विरोधी मानकर छोड़ देना कहीं यह भविष्य के लिए घातक तो नहीं? क्या आप को नहीं लगता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उच्छृंखलता के बीच कहीं तो भेद करना आवश्यक है? अगर बेटा अपनी ही माता को टुकड़े टुकड़े कर देने का नारा खुले में लगाए, क्या इसे भी सिर्फ विरोधी मानकर नज़रअंदाज़ करना चाहिए?

मन में यूं ही विचार आया कि हमारी इन्ही आदर्शवादी बातों के कारण ही कहीं भारत में टुकड़े टुकड़े गिरोह मज़बूत तो नहीं होता जा रहा। मैं जब इन सवालों के जवाब ढूंढता हूँ तो पाता हूँ कि आप ने बंटवारें का दर्द सहा है ऐसे में आप इन देश के दुश्मनो को कैसे सिर्फ विरोधी मानकर माफ़ कर दे सकते हैं? और फिर आप तो लौहपुरुष माने जाते रहे हैं।

ऐसे ही अनेक सवाल और मेरे अपने जवाब मुझे आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। सनातन में एक व्यवस्था और है, वह है घर परिवार के बुजुर्ग के अनुभवों का लाभ प्राप्त करना। मैं चाहता हूँ कि आप से व्यक्तिगत रूप से मिलकर आप का चरण स्पर्श कर सकूं और उन चरणों ने जिस जिस मार्ग पर अपने चिह्न छोड़े हैं उसकी धूल को अपने माथे पर लगा कर आपका नमन कर सकूं।

आप इस जिज्ञासु बालक की भावना को समझेंगे और उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उसे आशीर्वाद भी देंगे, ऐसी कामना करता हूँ।

आपका
मनोज सिंह

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