भारतीय दर्शन भौतिक संसार को क्यों कहता है मायाजाल

कुछ समय से सोशल मीडिया में एक मैसेज चल रहा है जिसमें अंग्रेजी के कुछ वर्णाक्षर और संख्या को मिलाकर लिखे गए शब्दों और वाक्यों को हम पढ़ सकते हैं।

उदहारण के लिए, नीचे लिखे कुछ वाक्य को पढ़ने का प्रयास करिये :

7H15 M3554G3
53RV35 7O PR0V3
H0W 0UR M1ND5 C4N
D0 4M4Z1NG 7H1NG5!
1MPR3551V3 7H1NG5!

कुछ ही देर में आप समझ जाएंगे कि निम्नलिखित वाक्य लिखा है :

This message
Serves to prove
How our minds can
Do amazing things!
Impressive things!

आखिर यह ‘चमत्कार’ कैसे होता है? आखिर निरर्थक, उलटे-पुल्टे ‘शब्दों’ से कुछ सार्थक शब्द हम हवा से कैसे निकाल सकते हैं?

पिछले वर्ष रिलीज़ हुई प्रोफेसर निक चेटर (Nick Chater) की लिखी हुई पुस्तक ‘The Mind is Flat’ या ‘मन सपाट है’ पढ़ी थी जिसमें चेटर लिखते हैं हमारा मन एक चालाक कामचलाऊ मशीन है, जो तुरत-फुरत किसी शब्द, इमेज या व्यक्ति को देखकर कहानी गढ़ देता है।

पढ़ते समय हम एक पेज पर लिखे हुए सभी शब्द कभी भी एक ही समय में नहीं देख सकते हैं, न ही पूरा वाक्य एक ही समय में पढ़ सकते हैं। हम मोटे तौर पर केवल एक समय में एक ही शब्द ‘पहचान’ पाते हैं। हमारा मष्तिष्क हमारे संसार को, हमारे परिदृश्य को आंशिक रूप से देखता और समझता है।

यहाँ तक कि हमारी आँख अधिकतर दृश्य को श्वेत-श्याम रंग में देखती है और केवल वही भाग रंगीन दिखाई देता है जिसपर आँख फोकस कर रही है। और इस ‘समझ’ या ‘आंशिक’ दृश्य को सम्पूर्ण बनाने के लिए मष्तिष्क ‘कहानी’ गढ़ देता है।

उदहारण के लिए, दृश्य बोध के फ्रांसीसी विशेषज्ञ, जाक निनियो (Jacques Ninio) के चित्र में (पहली फोटो) आप कितने काले बिंदु एक समय में देख सकते हैं?

हम ‘सोचते’ है कि हम एक विस्तृत और इंद्रधनुषी दुनिया देख रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं होता। यह एक आश्चर्यजनक और सर्वव्यापी छल है, जिसे दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान में ‘भव्य माया’ या ‘भव्य भ्रम’ (grand illusion) के नाम से जाना जाता है।

तभी भारतीय दर्शन भौतिक संसार को मायाजाल कहता है। क्योंकि हम जो देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं, उसे हम आंशिक रूप से ही समझ रहे हैं। उसको ‘पूर्ण’ बनाने के लिए हमारा मन कहानी गढ़ रहा है, मायाजाल बुन रहा है।

हम कार्टून में से चेहरे को पहचान लेते हैं। पप्पू शब्द में किसी नेता का चेहरा ढूंढ लेते हैं।

उदहारण के लिए, आर्टिस्ट क्रैग मूनी (Craig Mooney) ने कुछ रेखा-चित्र बनाये जो दूसरी फोटो में हैं। हम उन रेखा-चित्रों में न केवल चेहरे ढूंढ़ लेते हैं, बल्कि उन चेहरों के इमोशन और मनोवैज्ञानिक रूप से भरपूर व्यक्तित्व को पहचान लेते हैं।

चूंकि कोई भी चीनी नागरिक अपनी सरकार और राष्ट्रपति की आलोचना नहीं कर सकता, उन्होंने कार्टून करैक्टर Winnie the Pooh (गूगल करके देख लीजिये) के माध्यम से राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया।

अंततः, चीन को Winnie the Pooh पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा। इस समय चीनी लोग ऐतिहासिक करैक्टर की आड़ लेकर अपने राष्ट्रपति का मज़ाक उड़ा रहे हैं। अब ऐतिहासिक करैक्टर को तो बैन नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार कुछ लोग अपने पूजनीय का कार्टून बनाने पर हिंसक हो जाते थे। अब पूरी दुनिया इशारों से बात करती है, मज़ाक उड़ाती है और वे कुछ कर भी नहीं सकते।

फेसबुक को ही लीजिये। फेसबुक ने हमारे अकाउंट की निगरानी करने के लिए एक फौज बैठा रखी है। साथ ही, कृत्रिम बुद्धि को भी ड्यूटी पर लगा दिया।

वे कभी अजित सिंह, कभी पुष्कर अवस्थी, कभी-कभार सुमंत भट्टाचार्य, तो कभी प्रिय लालाजी के अकाउंट को सस्पेंड कर देते हैं।

इसका मित्रगण ने क्या उपाय निकाला? ‘कुछ’ शब्दों में हिंदी और अंग्रेज़ी की वर्णमाला मिला देते हैं और हम अर्थ समझ जाते हैं।

अब कुछ मित्र ‘गाँव’ और ‘झोपड़ी’ की बात करते हैं। फेसबुक वाले – और हम सब भी – निश्चित रूप से यही समझ रहे हैं कि वे ग्रामीण विकास की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं।

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