एक दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है…

अगर आपकी रूचि राजनीति में है… या आप थोड़ी ही सही पर देश की राजनैतिक परिस्थितियों पर नज़र रखते हैं तो आपने अनुभव किया होगा कि सार्वजनिक मंचों पर भारतीय राजनीति के घाघ अक्सर एक बात दोहराते नज़र आते हैं कि इस देश में राज करना तो सिर्फ कांग्रेस को आता है।

भावनात्मक दृष्टिकोण को परे रखकर देखें तो आंशिक रूप से ये बात सच भी नज़र आती है। ये अलग बात है कि ये पढ़ते हुए आपको जितना कष्ट होगा, उससे अधिक कष्ट मुझे लिखते हुए हो रहा है, पर सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार लिया जाए उतना अच्छा होता है।

अब आप कहेंगे कि अगर ये बात आंशिक रूप से सत्य है तो इसका आधार क्या है? तो उसके लिए हमें इतिहास में चलना होगा, ब्रिटिश राज में जन्मी एक पार्टी जिसे हम आज कांग्रेस के नाम से जानते हैं जिसका गुलाम भारत में जन्म लेना अंग्रेज़ों के लिए भी उतना ही ज़रूरी था, जितना गांधी और नेहरु जैसे व्यक्तित्व के लिए…

कांग्रेस, जिसे शातिर अंग्रेज़ों का भरपूर सहयोग और सानिध्य मिला। कपट, छल, छिद्र के सियासी दांव पेंच भी कांग्रेसियों ने अंग्रेज़ों से ही सीखे… उन्होंने जाना कि भारत एक खंडित राष्ट्र है जिसमें देशप्रेम और राष्ट्रीयता नाम की कोई भावना नहीं है….ये भी जाना कि भारत अवसरवादियों का एक ऐसा समूह है, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए देश को बेचने से भी गुरेज़ नहीं करता।

बस यही वो कुंजी थी जिसने पहले अंग्रेज़ों के लिए और बाद में कांग्रेसियों के लिए भारत में राज करने की राह आसान बना दी। संभवतः भारत संसार में एक मात्र देश है जिसके देशवासी उन्हें गुलाम बनाने वाले लोगों से भी प्यार करने लगते हैं। काका राजेश खन्ना की फिल्म का एक गीत याद आता है।
मैने देखा, तूने देखा, इसने देखा, उसने देखा,
सबने देखा…
क्या देखा – क्या देखा ?
एक दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है…

ये गीत हमारा आइना है। विदेशी आक्रान्ता आए उन्होंने हमें लूटा, हमारे मंदिर और देवालय खंडित किये, जबरन हमारा धर्म परिवर्तन किया, हमारी बहन – बेटियों के आँचल तार-तार किए पर हम चुप रहे, हमने जजिया भरते हुए अपनी सनातन संस्कृति को पैरों तले रौंदने वालों को ही अपना रहबर मान लिया।

और तो और उन आक्रान्ताओं को महान जैसे विशेषणों से विभूषित करने लगे…. जिस बख्तियार खिलजी ने नालंदा को नष्ट कर हमारी सनातन मेधा को खंडित कर दिया उसी बख्तियार खिलजी के नाम पर नालंदा का नाम बख्तियार पुर कर दिया गया और हम आज तक उसके नाम को संजोए हुए हैं… ये है हमारा असली चरित्र जिसे दुश्मन दोस्तों से प्यारा है….

हमारी इस आदत को अंग्रेज़ों ने जल्द ही पहचान लिया और इसका भरपूर फ़ायदा उठाया और जाते – जाते अपना 200 सालों का अर्जित अनुभव कांग्रेसियों को हस्तांतरित कर चले गए। कांग्रेसियों ने भी एक सुयोग्य शिष्य की तरह इस गुरुमंत्र का सही इस्तेमाल किया…. उन्होंने जुमले फैंके… चुनावी रेवड़ियाँ उछालीं और हम उन रेवड़ियों को लपकने में सब कुछ भूल गए,

हम भूल गए नेताजी सुभाष, हम भूल गए देश का बँटवारा, हम भूल गए कश्मीर और कश्मीरी पंडित, हम भूल गए जीप घोटाला, हम भूल गए हिंदी – चीनी भाई – भाई, हम भूल गए ताशकंद, हम भूल गए इमरजेंसी, हम भूल गए 84, हम भूल गए मुक्तिवाहनी, हम भूल गए 26/11, हम भूल गए वो अनगिनत घोटाले…. हम भूल गए कि हम एक गहरे कुँए में जंगली बेल के सहारे उलटे लटके हैं नीचे विषधर सर्प हैं और ऊपर विकराल हाथी, ये जानते हुए कि जिस बेल के सहारे हम लटके हैं, उसे चूहे कुतर रहे हैं पर हम मगन हैं मधुमख्खी के छत्ते से टपकती शहद की बूंदों को चाटने में…

क्योंकि एक स्वार्थ परक जनता के रूप में यही हमारी नियति है….. पर वो खाली पतीली में उफान लाने की कला जानते हैं, वो एक प्याज को मुद्दा बनाकर आपकी सरकार नहीं बनने देते, वो राम मंदिर भी नहीं बनने देते, वो 15 लाख के उदाहरण को सच बना देते हैं, वो चौकीदार को चोर कहते हैं, वो राफेल को लूट घोषित कर देते हैं, और यही वो लोग हैं जो खाद्य सुरक्षा और मनरेगा लाकर दुबारा सत्ता हासिल कर लेते हैं, वो क़र्ज़माफ़ी से तीन राज्यों में वापसी कर लेते हैं… और अब वो 72000 देने वाले हैं।

क्योंकि वो जानते हैं कि वादों की गंगा में कैसे अपनी पापों की गठरी धोई जा सकती है… हमने उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू तो किया है पर अभी भी वो हमसे कोसों दूर हैं, आखिर अनुभव भी कोई चीज़ है… वो भारत और भारत वासियों को आपसे बेहतर जानते हैं… ये वो देश है जहाँ रेवड़ियाँ बाँटने वाले और रेवड़ियाँ बटोरने वाले दोनों ही अंधे हैं। अभी भी वक़्त है सुधरिए, नहीं तो तुलसी बाबा तो कह ही गए हैं..
सुर नर मुनि सब कै यह रीती ।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति ॥

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