समस्या उन्हें है, जिन्हें मिल रहा है सबकुछ मुफ्त

कन्हैया ने कहा है कि अगर आप झोपड़ी में रहते हैं, और आपके पड़ोस में कोई बंगले में रहता है और रोज मर्सेडीज़ से निकलता है तो आपका मन करेगा ही कि उसकी मर्सेडीज़ का शीशा तोड़ दें।

उसकी इस बात से वामपंथी मानसिकता का पता चलता है… और उसे आगे लेकर जाइये, वामपंथ का रिज़ल्ट क्या होगा यह भी पता चलता है।

लंदन की कहानी बताता हूँ। पहली बात बता दूँ… मेरे पास नई मर्सेडीज़ है। लंदन में कोई बड़ी बात नहीं है। पर मैं जिस इलाके में रहता हूँ, वहाँ के लिए थोड़ी सी बड़ी बात है। यह लंदन का थोड़ा पिछड़ा, गरीब और क्राइम वाला इलाका है।

पर फिर भी झोपड़पट्टी तो नहीं है। फ्लैट्स हैं, हर कोई अपने अपने फ्लैट का मालिक है। सबके पास कारें हैं। मर्सेडीज़ नहीं भी है तो टोयोटा, हौंडा, वॉक्सहॉल तो है।

मेरी भी पिछली गाड़ी हौंडा थी, वह मैंने नहीं बेची। बेटे के लिए रख ली। मेरी नई गाड़ी देख कर मेरी दो पड़ोसिनें जल भुन गईं। मुझसे आकर लड़ने लगीं, तुम दो-दो गाड़ियाँ क्यों रखते हो। हमें पार्किंग की जगह नहीं मिलती…

मैंने कहा, इतनी जगह तो पड़ी है। कॉलोनी में नहीं तो सामने सड़क पर पार्किंग फ्री है।

-ना, तुम अपनी गाड़ी बाहर खड़ी क्यों नहीं करते?

-जब मुझे जगह नहीं मिलती तो मैं अपनी गाड़ी बाहर ही खड़ी करता हूँ।

-हाँ, पर तुम अपनी मर्सेडीज़ कभी बाहर खड़ी नहीं करते।

मैंने समझा, इन्हें पार्किंग स्पेस की दिक्कत नहीं है। इन्हें मर्सेडीज़ से जलन है।

वे दोनों औरतें झोपड़ी में नहीं रहतीं। उसी फ्लैट में रहती हैं जिसमें मैं रहता हूँ। एक के पास होंडा है, एक के पास सिट्रोन है।

एक काम नहीं करती, पेंशन पर है। दूसरी सिंगल मदर है… यानि वह भी बेनिफिट्स लेती है। और मैं 52% टैक्स देता हूँ… जिसपर वे ऐश करती हैं। पर जलन के मारे मेरी होंडा पर आड़े तिरछे स्क्रैच कर जाती हैं। जबकि मेरी एक ही कार वहाँ खड़ी होती है। दूसरी मेरे पास शेफ्फील्ड में रहती है।

यह कन्हैया मेंटेलिटी यहाँ भी है। मुफ्त में सब कुछ मिल जाएगा फिर भी इस जलन का कोई इलाज नहीं है।

वहीं पास में एक और बन्दा है। नाइजीरियन है। दोनों सामान्य जॉब में हैं। उसकी पत्नी नर्स है। पर वह खुद पोर्शे की एसयूवी चलाता है। उसकी पत्नी बीएमडब्ल्यू चलाती है।

वह भी कोई मुँह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुआ होगा। मेरी तरह वह भी खाली हाथ ही आया होगा इस देश में। उसे किसी से जलन नहीं है। वह खुद मेहनत करके अपने शौक, अपनी इच्छाएँ पूरी करने को तैयार है।

समस्या किसे है? गोरे अंग्रेज़ों को है। जिन्हें सबकुछ मुफ्त में मिल रहा है, उन्हें है। कल को जिनका दुनिया में शासन था, जो पूरी दुनिया में शोषक थे, उन्हें है… कि वे निकम्मे हैं तो ठीक है, दूसरा क्यों तरक्की कर रहा है?

और यह जलन, यह घुटन वामपंथियों की कुल संपत्ति है। लंदन वामियों का गढ़ है। गाँव अब भी कंज़र्वेटिव के पास हैं, तो इसका उपाय भी ढूँढ़ लिया है। शेफ्फील्ड के पास के एक गाँव में घर ढूँढ रहा हूँ। एक ऐसा गाँव है जो जरा पॉपुलर है। यहाँ के बहुत से फुटबॉलर और क्रिकेटर उस गाँव में रहते हैं, रिटायरमेंट के बाद। वहाँ किसी को कम से कम मुझसे या मेरी कार से तो जलन नहीं हो सकती।

कन्हैया की भी दुकानदारी यही कहती है। मुम्बई, दिल्ली, पुणे के बड़े बड़े पूंजीपतियों से तो ना तो जलन करने की हिम्मत है, ना वहाँ तक पहुँच है। पर आँख के सामने, बेगुसराय में कोई सम्पन्न नहीं होना चाहिए… वहाँ किसी को बंगले और गाड़ी का सपना नहीं देखना चाहिए।

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