कांग्रेस के वादे और इरादे

कांग्रेस का वचनपत्र सबके सामने है। दो चीजें बेहद अहम हैं और एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। पहला देशद्रोह कानून खत्म होगा और घृणा अपराध यानी हेट क्राइम रोकने के लिए एक कानून बनेगा। अफस्पा वगैरह भी खत्म होंगे।

इसका मतलब क्या निकालें।

सहज बुद्धि यही कहती है कि देशद्रोह और आतंक फैलाने की खुली छूट होगी और घृणा अपराध रोकने के लिए बने कानून के मायने क्या होंगे।

यह होगा कि यदि आपके शहर में बम विस्फोट होता है तो आप इसे इस्लामी आतंकवाद या जिहाद भी नहीं कह सकते। आप पर घृणा फैलाने के आरोप में मुकदमा चल सकता है।

यानी अब महागठबंधन की सेक्यूलर सरकार आई तो इस बार आतंक को कानूनी कवच-कुंडल भी उपलब्ध करा दिया जाएगा।

सिमी, पीएफआई और इंडियन मुजाहिदीन के लिए जश्न का दिन है।

कानून के आगे क्या करेंगे आप?

साथ ही, घृणा अपराध कानून का दायरा दिनोंदिन बढ़ता जाएगा। यानी हमलावरों का नाम लेना भी घृणा अपराध की श्रेणी में आ सकता है। घृणा अपराध की परिभाषा बहुत लचीली है और इसे कितना भी खींचा जा सकता है। जिहादी लॉफेयर (Legal Warfare) के लिए यह सबसे उर्वर कानून साबित हुआ है कई देशों में।

लेकिन पहले जान लें कि जिहादी Lawfare है क्या?

कुछ लोग समझते हैं कि इधर साल-दो साल से हमारे शहरों में बम नहीं फूट रहे हैं तो इसका मतलब यही हुआ कि जिहाद की लौ मद्धिम पड़ने लगी है।

लेकिन जिहाद एक सेकेंड को भी नहीं रुका है और न रुकेगा। यह हज़ार तरीकों से जारी है। सेक्यूलरिज़्म की दुहाई देते-देते शरिया के फायदे गिना देना भी जिहाद है। वोट और पॉलिटिकल करेक्टनेस के चलते कोई उनकी बात नहीं काटेगा। प्रतिकार करने पर आप सांप्रदायिक घोषित किए जाते थे। लेकिन अब हेट स्पीच के जुर्म में मुकदमा भी चल सकता है।

सिविल ड्रेस में संविधान की दुहाई देने वाले मुल्ले जो कर रहे हैं, उसे कहते हैं- लॉफेयर। यानी अदालती जिहाद। यानी उदार लोकतंत्रों के उदार कानूनों का जिहाद को बढ़ावा देने में इस्तेमाल करना।

तो पीएफआई का एक नेता सीने पर तिरंगे का बिल्ला लगा कर संविधान और धर्मनिरपेक्षता के जयकारे लगाता है। वही नेता स्टिंग आपरेशन में कहते पकड़ा जाता है- हमारा मकसद पूरे भारत को इस्लामी देश बनाना है।

वही व्यक्ति लव जिहाद की शिकार अखिला को हादिया साबित करने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाता है और हादिया के मुंह से अदालत में कहलवा लेता है कि, “मुझे मेरी आज़ादी और मेरा मज़हब चाहिए।” यह Lawfare है जहां इस्लामी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद ली जाती है।

लॉफेयर की यह विषबेल इतनी पुष्पित पल्लवित हो चुकी है कि इस्लाम के खिलाफ एक शब्द को भी रसूल की तौहीन और ईशनिंदा (ब्लासफेमी) करार देने की तैयारी की जा चुकी है। अकादमिक जगत, अखबार व पत्रकार और इस्लाम के प्रति आलोचनात्मक रुख रखने वाले राजनेता सभी इनके निशाने पर हैं।

इस्लाम की थोड़ी भी आलोचना होने पर ये लॉफेयर जिहादी अदालत दौड़ पड़ते हैं और मानहानि का मुकदमा ठोक देते हैं। मानवाधिकार संगठनों, नस्लभेद के खिलाफ जंग लड़ रहे संगठन और सर्व धर्म समभाव के समझदार पैरोकार इनके पीछे डट जाते हैं।

इसे खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी था एक सऊदी अरबपति और ओसामा बिन लादेन का रिश्तेदार खालिद बिन महफूज़। उसने अकेले इंग्लैंड की अदालतों में ही 30 से ज्यादा लेखकों और प्रकाशकों के खिलाफ मुकदमे किए।

महफूज ने 2007 में रॉबर्ट कॉलिंस और जे. मिलार्ड बर्र की किताब Alms for Jihad (जिहाद के लिए जकात) के प्रकाशन को लेकर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के खिलाफ मुकदमे की धमकी दी। कैब्रिज ने तुरंत घुटने टेक दिए। सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और सभी अनिबकी प्रतियों को जला देने का वादा किया।

हद तो तब हो गई जब उसने दुनिया की सभी लाइब्रेरियों ये मांग की कि इस किताब को वे अपनी लाइब्रेरी से हटा दें।

इसे कहते हैं खौफ़। महफूज़ हर जिहादी संगठन को और वर्ल्ड ट्रेड टावरों तक पर हमला करने वाले जिहादियों को मनीऑर्डर भेजता रहा। लेकिन जिसने भी यह कहने का साहस किया, उस पर वह मरते दम तक मुकदमा ठोकता रहा। वह 2009 में अल्ला को प्यारा हुआ।

जिहादी लॉफेयर यहीं नहीं रुकता। नीदरलैंड की दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के संस्थापक और फिल्म मेकर गीर्ट वाइल्डर्स घोर संकट में हैं। उनकी डाक्यूमेंट्री ‘फितना’ को लेकर जॉर्डन ने नीदरलैंड से उनके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया है और उन पर शरिया कानून के तहत मुकदमा चलाने की मांग की है। जबकि इस डाक्यूमेंटरी में सिर्फ कुरान की आयतें हैं और मस्जिदों में काफिरों के कत्ल का फरमान सुनाते मुल्लों के भाषण हैं।

वाइल्डर्स अब राजनयिक पासपोर्ट के बिना नीदरलैंड के बाहर पांव नहीं रख पाते। नीदरलैंड को डर है कि उन्हें किसी इस्लामी देश में गिरफ्तार किया जा सकता है। यह आशंका भी है कि इस्लामी देश लॉबिंग करके कहीं वाइल्डर्स के खिलाफ इंटरपोल से गिरफ्तारी वारंट न जारी करा दें।

वाइल्डर्स का मामला बस इससे भी बड़े खेल की शुरुआत है। मुस्लिम देशों का संगठन आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआइसी) अब संयुक्त राष्ट्र के जरिए हर उस चीज पर पाबंदी लगवाने की फिराक में है जिसे वो इस्लाम के खिलाफ मानते हैं।

2007 में पाकिस्तान में इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों ने बढ़ते इस्लामोफोबिया पर चिंता जताते हुए इस्लाम की छवि खराब करने की सभी साज़िशों के सशक्त प्रतिरोध का संकल्प लिया।

यह संकल्प भी पूरा हो गया जब अगले ही साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 7/19 प्रस्ताव पास किया जिसमें मानवाधिकारों को ही शीर्षासन करा दिया गया है।

इसमें इस्लाम की किसी भी तरह की आलोचना को नस्लवाद और भेदभाव के समकक्ष माना गया और सभी देशों से अनुरोध किया गया है कि वे इस भेदभाव को दूर करने के लिए कानूनी कदम उठाएं।

प्रस्ताव में इस्लाम को आतंकवाद, हिंसा और मानवाधिकारों के हनन के साथ जोड़ने पर चिंता जताई गई। साथ ही शरिया कानून पर किसी तरह की आलोचनात्मक बहस को भी इस्लामोफोबिया माना जाएगा। पूरी दुनिया को धार्मिक सहिष्णुता का संदेश देने वाले इस प्रस्ताव पर सऊदी अरब, पाकिस्तान व तमाम इस्लामी देशों के अलावा चीन ने भी दस्तखत किया है।

ये हमें कहां ले जा रहा है?

अब अगर आपके मुहल्ले में कोई बम फोड़ दे तो आप इसे जिहाद या इस्लामी आतंकवाद नहीं कह सकते। ऐसा कहना इस्लाम की बेइज्जती होगी। और इस्लाम की बेहुरमती करना सबसे बड़ा आतंकवाद है।

डेनमार्क की पत्रिका में मोहम्मद पर छपे कार्टूनों के विरोध में इस्लामाबाद में डेनिस दूतावास पर हमले को जायज ठहराते हुए नार्वे में पाकिस्तानी राजदूत ने कहा था- सबसे बड़ा आतंकवाद तो हमारे रसूल की बेइज्जती है।

इसलिए सतर्क रहें। अगर कल को आप के मुंह से कोई ऐसा शब्द निकल गया और आप मारे गए तो कानूनी तौर पर भी माना जा सकता है कि सबसे बड़े आतंकवादी आप खुद हैं। अमेरिका, हथियार वाली जंग जीत कर इतनी उपलब्धियां नहीं हासिल कर पाया जितना लॉफेयर के धुरंधरों ने कर ली है। अब कांग्रेस का हाथ खुलकर इनके साथ है।

कांग्रेस का संदेश स्पष्ट है कि अगर बहुसंख्यक उसे वोट नहीं देंगे तो उन्हें उनके किए की सजा मिलेगी? विभाजन रेखाएं बहुत गहरी हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी काशी से लड़ रहे हैं जो सनातन काल से हिंदुओं की पावन नगरी है। राहुल गांधी केरल के वायनाड से लड़ रहे हैं जहां हिंदू 50 प्रतिशत से कम हैं। जाहिर है कि राहुल गांधी किनके वोट पाने की मंशा से यह कर रहे हैं। काशी और वायनाड के निहितार्थ स्पष्ट हैं।

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