बोलो जुबां केसरी : भारत के अब टुकड़े होंगे, सोचना भी मत!!

जाके प्रिय न राम वैदेही…..

किंवदंती है कि मीराबाई को जब चित्तौड़ में मारने के षड्यंत्र होने लगे तो वे बहुत खिन्न हुईं और गोस्वामी तुलसीदास को एक पत्र लिखा “मैं क्या करूँ?”

तुलसीदास जी ने जो उत्तर दिया वह विनयपत्रिका का उक्त पद है।
जाके प्रिय न राम वैदेही।
तजिये ताहि कोटि बेरी सम, जद्यपि परम् सनेही।
भक्त को चाहिए कि अपने आराध्य से विमुख लोगों से सारे रिश्ते तोड़ दे।
चाहे वह कितना भी निकट का सम्बंध क्यों न हो?

भक्त है, मुकाबला तो कर नहीं सकता, क्योंकि एक तो वह सबके लिए निरीह प्राणी है। कोई भी आता जाता लात मार दे, भगवान की आँख खुलती नहीं है और उसे तब तक सहन करना होता है, सयानों ने उसे बड़ी खूबसूरती से जस्टिफाई किया है,,, “भगवान परीक्षा ले रहे हैं…!”

दूसरे, सिस्टम पर उनका कब्ज़ा होता है।
भक्त का सिवाय भगवान के कोई नहीं होता, कदाचित उसका भी विश्वास डोल जाता है मगर सिस्टम के ठेकेदार उत्तरोत्तर क्रूर, ढीठ, दम्भी और निर्लज्ज होते जाते हैं।

धार्मिक ग्रंथ ऐसे अनेक आख्यानों से भरे पड़े हैं।
मीराबाई चित्तौड़ त्याग, वृंदावन चली आईं!!
राजपूत की बेटी है, पीहर छोड़, बड़े रीतिरिवाज से ससुराल आई हैं।
पति का साथ जबतक था, तब तक ठीक, अब वे भी नहीं रहे।
देवर भोजराज का सिस्टम पर कब्जा है।
नारी जाति, कहाँ जाए?

चित्तौड़ त्यागते समय मीरा ने जो भजन गाये हैं, सुनकर छाती फट जाती है।
“थारे देशां में राणा,,,,,!! सन्त नहीं है,,,, लोग बसे सब कूड़ो,,,, रे नहीं भावे म्हाने,,, देशड़लो रंग रूड़ो….!”
भाव वही है, जो रफी के गीत ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब यह देश हुआ बेगाना,,,’ में है या कि कवि प्रदीप कहते हैं “विधि ने तेरी कथा लिखी, आंसू से कलम डुबोय,,,”

बड़े हृदयविदारक विलाप करती हुई मीराबाई ने चित्तौड़ त्याग दिया।
लोकभाषा से परिचित जन जब देशी महिलाओं की खुरखुरी आवाज में तार पर जाते आलाप को सुनते हैं तो कलेजा उछलकर बाहर आने को होता है।
कई श्रोता मूर्च्छित हो जाते हैं!!

भक्त को वेदना दी गई, उसने सारे रिश्ते ही त्याग दिये।
विभीषण ने बन्धु छोड़ा, प्रह्लाद ने पिता को और भरत ने माँ को।
भक्त का मज़ाक उड़ाना, लोक में संकट को आमंत्रण है??
उत्पीड़क फरेब से अपनी ही बर्बादी के बीज बो रहे होते हैं।
कालांतर में उनकी बर्बादी का वृक्ष उसमें से पनपता है।

भक्त का क्या है?
वह तो वैसे ही संसार से विमुख, एक समय की दाल रोटी से संतुष्ट है।
करतल भोजन, तरूतल वासा,,,,,।
लेकिन सिस्टम में जमे लोगों को दिक्कत होती है।
जब होती है तो भयंकर होती है।

चित्तौड़ दुर्ग के एक कोने में पसरी वीरानगी का रुदन महसूस नहीं किया किसी ने?
पश्चिमी भाग के वे पत्थर अब तक रो रहे हैं।
किसी ने नहीं रोका???
विधवा, दुःखो की मारी एक नारी तुम्हें छोड़ जा रही है, तुम हँस रहे थे ना।
चित्तौड़ श्मशान बन गया।

जब स्वामी विवेकानंद ने यह घोषणा की “एक बार अपने समस्त देवी देवताओं को भूलकर, कुछ समय के लिए तुम्हारा एक ही आराध्य होना चाहिए,,, यह भारत राष्ट्र!!”
इस कथन को वेदवाक्य समझकर, आज करोड़ों भक्त प्रकट हुए हैं जिनके जागरण से लेकर शयन तक, इसी का चिंतन चलता है।
वे स्वप्न भी इस देश के अभ्युत्थान के देखते हैं।
उनकी हर श्वांस, हर धड़कन में से भारत माता की जय का स्वर निकलता है।
जिन्होंने सारी जवानी होम कर दी।
जो मुस्कुरा कर बड़े से बड़े जख्म को सह गये।

वे निरीह भक्त नहीं है!!
ध्यान दो,,,, मैं चेतावनी देता हूँ, इनकी भृकुटि में प्रलय निवास करता है।
इनके वॉल्व की पिन निकल गई तो परमाणु बम भी छोटा पड़ जाएगा।
यह मीराबाई का युग नहीं है कि कान्हा का स्मरण करते, रोते रोते निकल जाएंगे।
सिस्टम पर भरोसा करने वाले कृपया ध्यान दें
इस किले के कुछ तहखाने न छेड़ें तो ही अच्छा।

भक्त कोई गपशप या व्यंग्य का विषय नहीं है।
यह अलग बात है कि वे इस बकवास को मुस्कुरा कर सुन रहे हैं।
भारत के अब टुकड़े होंगे, सोचना भी मत!!

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