आख़िर भाजपा ही क्यों? इतिहास के गवाक्षों से चुनाव 2019

आपने भी देखा होगा, जब काँग्रेस के मित्रों के पास कोई तर्क या तथ्य नहीं बचता तो वे स्वतंत्रता-आंदोलन में अपनी कथित भागीदारी या गाँधी-नेहरू परिवार की शहादत (?) का यशोगायन करना शुरू कर देते हैं।

अव्वल तो आज़ादी से पूर्व काँग्रेस कोई एक विचारधारा विशेष का दल न होकर आज़ादी चाहने वाले भिन्न-भिन्न विचारधारा वालों का सामूहिक मंच था। फिर भी यदि वे सफलता का श्रेय लेते हैं तो विफलता की जिम्मेदारी किसकी बनती है?

क्या मुल्क के बंटवारे और उससे उपजी पीड़ाजनक विस्थापन की जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती? क्या उन्हें इसके लिए देश से माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए?

हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा कि नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता थे। हमें यह क्यों नहीं बताया जाता कि मुल्क के बंटवारे की जड़ों में उनकी लपलपाती महत्त्वाकांक्षा थी, हमें यह क्यों नहीं पढ़ाया जाता कि वे तमाम समस्याएँ जो आज नासूर बनकर देश के पोर-पोर को पिड़ो रही हैं, वे सब नेहरू की ही देन हैं?

क्या कश्मीर की समस्या के लिए नेहरू को माफ़ किया जा सकता है? महाराज हरिसिंह द्वारा जम्मू-कश्मीर को भारत में बिना शर्त विलय की घोषणा के बावजूद उन्होंने क्यों कश्मीर पर ढुलमुल रवैय्या अपनाया?

जब भारतीय सेना के जाँबाज़ वीरों ने कबायली के वेष में घुसी पाकिस्तानी सेना को लगभग खदेड़ ही दिया था, उसी समय उन्होंने सेना या तत्कालीन गृहमंत्री से सलाह-मशविरा किए बिना एकतरफा युद्धविराम की घोषणा क्यों की?

पाकिस्तान द्वारा जबरन हथियाए कश्मीर के हिस्से को वापस क्यों नहीं लिया? एक गैर विवादित क्षेत्र को संयुक्त राष्ट्र संघ ले जाकर विवादित क्षेत्र में क्यों परिवर्तित किया? जनमत संग्रह की बात करके पाकिस्तान और अलगाववादियों के सुर में सुर क्यों मिलाया?

धारा 370 और अनुच्छेद 35A जैसा विशेषाधिकार देकर देश की एकता और अखंडता को क्यों ख़तरे में डाला? क्या दोष है उन लोगों का जो विभाजन के पूर्व ही कश्मीर आकर बसे, पर इस अनुच्छेद के कारण वे आज भी शरणार्थी बनकर जीने को अभिशप्त हैं?

क्या दोष है बाल्मीकि समाज के उन सफाईकर्मियों का जो इन विशेष प्रावधानों के कारण छह दशक से अधिक समय से जम्मू-कश्मीर में रहने के पश्चात भी सामान्य नागरिक-अधिकारों से वंचित हैं?

क्या अनुच्छेद 35A लगाने से पूर्व नेहरू को तत्कालीन सांसदों से चर्चा नहीं करनी चाहिए थी? किस स्वार्थ के वशीभूत हो उन्होंने बिना लोकसभा एवं राज्यसभा में पास कराए राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी करवा अनुच्छेद 35A लागू करवा दिया?

देश उनसे जवाब चाहता है!

हमें पंचशील के सिद्धांत ऐसे रटाए गए जैसे वे वेद-वाक्य हों! पर इसी सिद्धान्त ने उन्हें स्वप्नजीवी बना दिया, वे शांति के कबूतर उड़ाते रहे और चीन ने हमारी 72000 वर्गमील ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया?

क्या 1962 की पराजय और पराजय के बाद की अपमानजनक संधि के लिए काँग्रेस को देश से माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए? क्या नेहरू की अदूरदर्शिता के लिए उनसे प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए?

एक ओर वे कश्मीर में जनमत-संग्रह की बात करते रहे और दूसरी ओर तिब्बत पर चीनी कब्ज़े को बिना उनकी जनता और नेतृत्व की राय जाने मान्यता दे दी। भला हो तत्कालीन सांसद महावीर त्यागी का जिनकी बदौलत अक्साई चीन का क्षेत्र चीन के हाथों जाते-जाते बचा, वरना वे तो उसे भी चीन की झोली में बतौर नज़राना डालना चाहते थे।

आज नेहरू की गलत नीतियों के कारण ही चीन अरुणाचल पर आँखें तरेरने की हिमाक़त करता है। आख़िर उन्होंने किससे पूछकर कोको द्वीप और काबू वैली म्यांमार को दे दी? क्या देश उनकी जागीर थी?

भारतीय राजनीति में राजतंत्रीय वंशवाद एवं भयावह व्यक्तिवाद को भी स्थापित करने का श्रेय नेहरू को ही जाता है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रचंड राष्ट्रवादी नेतृत्व के प्रति उनका व्यवहार कितना कटु और घृणित था? जो व्यक्ति ऐसे राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व के प्रति उदासीन हो उसकी देशभक्ति असंदिग्ध कैसे कहला सकती है?

क्यों उन्होंने उनकी मृत्यु के रहस्य को सुलझाने का प्रयास नहीं किया? क्या उनके परिवारीजन इस सम्मान के भी हक़दार नहीं थे? इस एक गुनाह मात्र के लिए देश को उन्हें माफ़ नहीं करना चाहिए।

सरदार पटेल, डॉ राजेन्द्र प्रसाद के प्रति भी उनका रवैय्या अनुचित रहा। सरदार पटेल के प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में अधिक मत आने के बावजूद उनका प्रधानमंत्री बनना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है? यह कुर्सी के प्रति उनकी आसक्ति नहीं तो और क्या है?

सोमनाथ मंदिर के शिलान्यास में डॉ राजेन्द्र प्रसाद के जाने से वे इतने खिन्न हुए कि उनकी अंत्येष्टि तक में जाने का शिष्टाचार न स्वयं निभाया, न अन्य काँग्रेसियों को ही निभाने दिया।

जिस दौर में आज़ादी के आंदोलन में तपकर निकले एक-से-बढ़कर-एक नेता मौजूद हों, उस दौर में अपनी बेटी को राजनीति में आगे बढ़ाना, उसे पार्टी अध्य्क्ष बनवा देना, क्या इस आचरण को किसी दृष्टि से नैतिक कहा जा सकता है?

उन्होंने वंशवाद का यह जो विष-बेल रोपा, उसने लोकतंत्र को फलने-फूलने देना तो दूर उसकी कोंपलें तक नष्ट कर दीं। उनके इस दृष्टिकोण के कारण कितनी ही राजनीतिक प्रतिभाएँ असमय ही काल-कवलित हुईं।

काँग्रेस के मेरे मित्रों, देश आपसे इन सभी सवालों का जवाब चाहता है। सच यह है कि आपके लिए इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में तो दूर इतिहास के कूड़ेदान में भी कोई स्थान नहीं बचता!

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