पांच साल में नहीं जीती जातीं सभ्यताओं की लड़ाइयां

चलिये, कुछ याद कीजिये।

क्या आप ने किसी हिन्दू विरोधी विधर्मियों के राजनेता के मुंह से स्पष्ट हिन्दू विरोधी भाषण या निर्देश सुने हैं?

आप ने यासीन मालिक और गिलानी के मुंह से भी नहीं सुने होंगे। ओवैसी के मुंह से तो बिलकुल नहीं सुने होंगे।

यहाँ मैं उनको कोई हिन्दूबंधु होने का प्रमाणपत्र नहीं दे रहा। वे जो हैं सो हैं।

इतना ही कहना है कि सार्वजनिक मंच से और कैमरा के सामने क्या कहना है यह वे समझते हैं। कुछ संकेत होते हैं उसके हिसाब से सभी चलते हैं।

चुनाव हो या न हो, यह एक सार्वजनिक जीवन की अलिखित आचार संहिता होती है। चाहे तो उच्चार संहिता कह सकते हैं।

अन्तरंग, पुराने यारों के बीच और परिवार के साथ अपने भी अलग अलग व्यवहार होते हैं। यह सब हमारे लिए बिलकुल स्वीकार्य है, किसी को इससे कोई समस्या नहीं।

सही है?

लेकिन हम चाहते हैं कि भाजपा के नेता, ख़ास कर शीर्ष नेता स्टेज से…

समझ तो गए ही होंगे, ठण्ड रखिये, जो काम हो रहे हैं वे देखिये। कई और काम होने बाकी हैं।

मेरी कहूँ तो मैं समझता हूँ कि मेरा पोता या पोती अपने उम्र के पचास सालों के बाद शायद वे परिणाम देखेंगे जिनके लिए मैं जी जान लगा रहा हूँ। और अभी तो संतान का विवाह भी नहीं हुआ है।

एक बात याद रखिये, हमें इस हालात में लाने के लिए हमारे शत्रुओं ने 1000 वर्ष से अधिक मेहनत की है, आज भी कर रहे हैं।

और हम पांच साल में सब मांग रहे हैं जिसमें हमारा योगदान महज एक वोट का है – वो भी है तो, क्योंकि कई ऐसे भी लोग हम से अधिक मुखर हैं जिन्होंने विरोधियों को वोट दिया है, भाजपा विरोध में अपने भाइयों को झूठ कहकर बरगलाया है और आज केवल जन्म के कारण खुद को हिन्दू गिनाकर अपेक्षाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कम्युनिकेशन की स्पीड जैसे बढ़ता है, युद्ध की तीव्रता और नुकसान बढ़ते हैं। डटे रहिये, सभ्यताओं की लड़ाईयाँ पांच साल में नहीं जीती जाती। और इसका अर्थ यह नहीं होता कि घर जा कर आराम कर सकते हैं, कोई आ कर बताएगा कि बधाई हो, लड़ाई ख़त्म हुई।

नहीं, अपने अधूरे योगदान से युद्ध हारे तो उसकी खबर युद्ध स्वयं ही आप को देगा कि आप ख़त्म होने को हैं। ईश्वर का आभार मानिए कि इस युद्ध में शारीरिक हिंसा नहीं हो रही। अब…

बाकी कल क्या होगा किस को पता? क्या कश्मीरी हिन्दुओं को पता था?

तस्मादुत्तिष्ठ!

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