श्रीकृष्ण की मृत्यु व यदुवंश का विनाश : भारत के वर्तमान द्वारा उसके सुरक्षित भविष्य की उद्घोषणा

मैं बहुत पहले से यह मानता रहा हूँ कि वर्तमान में जो भी होता दिख रहा है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमारे इतिहास ने हमें पहले से ही नहीं बता रखा है।

ये तो हम ही हैं जो वर्तमान को सशक्त मान, इतिहास का जानते बूझते तिरस्कार करते हैं। हम वर्तमान के नेत्रों से, भविष्य को गढ़ने का दुस्साहस करते हैं और भूतकाल के इतिहास को या तो पश्चिम द्वारा परिभाषित पौराणिक कथा स्वीकारते लेते हैं या फिर अप्रासांगिक मान लेते हैं।

लेकिन सत्य यह है कि हमें, हमारे भूतकाल का इतिहास जितना दिखाया व बताया गया है उतना वर्तमान में सामर्थ्य ही नहीं है। हमारा भूतकाल अर्थात भारत के सनातनी हिन्दुओं के भूतकाल का इतिहास जहां सृष्टि की गुत्थियों को अपने अंदर समाहित किये हुए है, वही उसने मानवों के आचार विचार के उत्थान व पतन को बड़ी सूक्षमता से लिपिबद्ध किया हुआ है।

मेरे लिए श्रीकृष्ण हमारे इतिहास के युगपुरुष हैं। यदि श्रीकृष्ण द्वारा गीता के संदेश को हटा भी दें, तब भी उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की पूरी जीवन यात्रा, वर्तमान का भविष्य दिखाने का सामर्थ्य रखता है। जिसने श्रीकृष्ण की जीवन यात्रा को समझ लिया, उसके लिए वर्तमान की जीवन यात्रा न सिर्फ सहज हो जाती है बल्कि वर्तमान के गर्भ से निकलने वाले भविष्य को भी वह पढ़ सकता है।

वैसे देखा जाय श्रीकृष्ण के जीवन मे एक से एक घटनाएं हुई हैं जिनकी विवेचना व मीमांसा हमें विस्मित करती है लेकिन मेरे लिए सबसे विस्मयकारी श्रीकृष्ण का अंत था।

जब मैं युवा था तब मेरे सामने हमेशा यह प्रश्न खड़ा होता था कि श्रीकृष्ण जैसे ज्ञानी, योगी, बुद्धिजीवी, त्रिकालदर्शी व व्यवहारिक व्यक्ति ने अपना अंत ऐसा क्यों होने दिया? एक साधारण बहेलिए के तीर से? स्वयं तो ऐसी साधारण मृत्यु से यह लोक छोड़ा लेकिन अपनी आंखों के सामने अपने ही वंश को असाधारण रूप से उजड़ते व उन सबको मृत्यु के गाल में समाते देखा?

क्यों?

क्यों श्रीकृष्ण ने अपने लिए यह नियति निर्धारित की?

मुझे आज उम्र की इस प्रौढ़ अवस्था में यह क्यों, समझ में आ रहा है। उन्होंने द्वापर युग के अंतिम प्रहार में यदुकुल के नाश से, कलयुग के लोगों को यह चेताया था कि जब भी कोई, कुल केंद्रित हो कर अपना उत्तराधिकार व धरोहर अकुलीन उत्तराधिकारियों के हाथ मे जाने देगा, तो उसका अंत न सिर्फ गरिमा विहीन होगा बल्कि असहाय हो, अपने आंखों के सामने अपने बनाये हुए कुल का नाश भी देखेगा।

हम जब अपने अगले बगल के वातावरण को देखते हैं तो यह सहज ही समझ में आ जाता है कि कलयुग के हम लोगों ने यह बात बिल्कुल भी नहीं समझी है। हम सब ने एक से एक साम्राज्यों व कुलीन परिवारों को इन्ही कारणों से नष्ट होता देखा है या फिर इनको किताबों में पढ़ा है।

हम लोग वर्तमान की कोख से अपनों के लिए भविष्य लिखने में इतने अंधे हो जाते हैं कि यह नहीं देखते हैं कि वर्तमान में उसके द्वारा लिखी जा रही थाती, भविष्य की धरोहर नहीं बल्कि कुल के साक्षात विनाश व उसके गरिमाविहीन काल का आह्वान है।

वैसे तो मैं वर्तमान के कई कुलों के विध्वंस के उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन क्योंकि बात श्रीकृष्ण की हो रही है इसलिये वर्तमान के यदुवंशियों की ही बात करूंगा।

वर्तमान भारत में श्रीकृष्ण को अपने कुल का पुरखा मान कर गर्वित होने वाले यादवों को राजनैतिक व सामाजिक पटल पर स्थापित करने वाले दो प्रमुख यादव कुल हैं, उत्तरप्रदेश से मुलायम सिंह यादव और बिहार से लालू यादव। इन दोनों ने ही सामाजिक व राजनैतिक विषमताओं को चुनौती दे कर, निर्धनता व सामाजिक अन्याय के बंधनों को तोड़ कर भारत के कपाल पर सदियों से उपेक्षित वर्ग को न्यायोचित स्थान प्रदान कराया है।

इन दोनों यदुवंशियों ने, वह सब किया जिससे उनका कुल समृद्ध व शक्तिशाली हो। इन दोनों ने एक ही जीवनकाल में वह सब अर्जित किया, जिसको सत्कर्म से अर्जित करने में अन्यों की कई पीढियां निकल जाती हैं। इन दोनों ने ही भूतकाल के अपने ही कुल के इतिहास को नेपथ्य में धकेला और वर्तमान में, अपने कुल के लिए नए मानकों को स्थापित करने का प्रयास किया है। इन दोनों ने वह सब किया जो वर्तमान के दम्भ से अर्जित होता है।

इन दोनों यादव कुल के अग्रज़ों ने सब कुछ किया बस भूतकाल के यदुवंशियों के कुल के इतिहास को या तो पढ़ा नहीं या फिर भविष्य गढ़ने के अहंकार ने, उनको उसके मर्म को समझने नहीं दिया है।

आज जिन मुलायम सिंह यादव और लालू यादव ने अपने हाथों से अपने परिवार और वंश को स्थापित किया वहीं आज यह दोनों असहाय व सामर्थ्यहीन हो, अपने ही परिवार को उजड़ते व वंश को पराभव की तरफ बढ़ते हुए देख रहे हैं।

श्रीकृष्ण ने जब अपने आँखों के सामने अपने पुत्रों और परिवार वालों को आपसी अहंकार, वैमनस्यता, ईर्ष्या और मूर्खता के कारण समाप्त होने दिया था, तब यह शिक्षा दी थी कि किसी भी मनुष्य के पुरुषार्थ की सीमा उसके स्वयं तक ही सीमित रहती है। जब भी कोई उस पुरुषार्थ के तेज को आगे की पीढ़ी को अग्रस्थ करने का प्रयास करता है या आगे की पीढ़ी उसपर अपना मूलभूत अधिकार समझने की गलती कर बैठती है, तब तब मुलायम सिंह यादव, लालू यादव जैसों को वृद्ध श्रीकृष्ण का अंत देखना होता है।

यह भारत का प्रारब्ध ही है कि उसके वर्तमान में नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति, भारत के भविष्य को यदुवंशी विनाश की पुनरावृत्ति से सुरक्षित रहने की उद्घोषणा कर रही है।

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