आखिर क्या है इस एक मोदी में, जो इससे नफ़रत करते-करते खुद खत्म हो जा रहे लोग

बीते साल ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जब आई तब भी काँग्रेस को ऐतराज था। इस साल मोदी की बायोपिक आई है तो इस पर भी काँग्रेस को ऐतराज हो गया है।

सेंसर बोर्ड पर ऐतराज किया गया कि सेंसर बोर्ड भाजपाई है। फिल्म पर बैन लगाने के लिए कोर्ट चले गए।

मुंबई हाईकोर्ट ने इस बाबत याचिका आज ख़ारिज कर दी। चुनाव आयोग ने काँग्रेस के ऐतराज को दरकिनार कर फिल्म को हरी झंडी दिखा दिया है। अब काँग्रेस सुप्रीम कोर्ट जाएगी।

बात यहीं तक होती तो गनीमत होती। मणिकर्णिका, केसरी, बाहुबली जैसी फ़िल्मों से भी दबी जुबान ऐतराज। कभी ‘आंधी’ से ऐतराज था, ‘किस्सा कुर्सी का’ से ऐतराज था, ‘इंदु सरकार’ से ऐतराज था।

अभिव्यक्ति की आज़ादी से इतना भय!

कभी सलमान रुश्दी से ऐतराज, कभी तसलीमा नसरीन से ऐतराज।

यह कैसी आज़ादी है? यह कौन सी आज़ादी की तलब है?

अभिव्यक्ति की आज़ादी के दोहरे मापदंड क्यों हैं? इतना भय आख़िर किस बात से है?

रही बात काँग्रेस के खत्म होने की, तो काँग्रेसी दोस्तों आप के यह सारे ऐतराज आप के खात्मे का खुला ऐलान हैं। आप खुद अपनी डाल निरंतर काट रहे हैं। असल डर यही है कि आप खत्म हो रहे हैं, अपनी इन्हीं कारस्तानियों की वजह से।

काँग्रेस के साथ-साथ तमाम विपक्ष भी इसी एक काम के लिए लोगों से परिचित हो रहा है। क्या है आखिर इस एक नरेंद्र मोदी में, जो इस आदमी से नफ़रत करते-करते लोग खुद खत्म हुए जा रहे हैं।

अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार, असहिष्णुता के खिलाफ परचम उठाने वाले लोग भी जाने कहां गुम हैं। कोई तो खोज कर ले आए इन लोगों को।

दाऊद इब्राहिम के पैसों से बनने वाली हिंदी फिल्मों का कभी विरोध क्यों नहीं करते लोग! दाऊद की बहन का चेहरा साफ करने के लिए बनी ‘हसीना पारकर’ पर तो लोग चुप थे। रईस, मुल्क और हैदर जैसी प्रो-आतंकवादी फिल्मों पर तो कोई ऐतराज नहीं किया किसी ने, जब कि करना चाहिए था।

संजू फिल्म में संजय दत्त का चरित्र स्पष्ट बताता है कि खान बंधुओं की फिल्मों पर दाऊद खुल कर पैसे लगाता था, सो मजबूर हो कर मुझे आतंकियों के हाथ का खिलौना बनना पड़ा। संजय दत्त काँग्रेसी हैं। पिता सुनील दत्त काँग्रेस सरकार में मंत्री रहे। मां नर्गिस दत्त भी राज्य सभा में रहीं। बहन प्रियंका दत्त काँग्रेसी सांसद हैं। सो यह भी नहीं कह सकते कि संजय दत्त भाजपाई हैं, ऐसा इस लिए कहा।

ब्लैक मनी और दाऊद के पैसों से फ़िल्में बनाने वाले और करोड़ों, अरबों रुपए नंबर दो का एक करने वाली फिल्म इंडस्ट्री के लोगों की कमाई में ही नहीं, उन की समझ में भी दाऊद इब्राहिम बोलता है।

जो लोग किसी फिल्म से डरते हों, किसी किताब, किसी लेखक और किताब से डरते हों, वह लोग कितने बीमार हैं, उन के इस डर से समझा जा सकता है।

इन्हें इन के हाल पर छोड़ दीजिए। खुद-ब-खुद मर जाएंगे। फिल्म अच्छी बनी है कि बुरी, यह तो देख कर ही बताया जा सकता है। पर इस फिल्म को तो इन मूर्खों ने घर बैठे ही हिट करवा दिया।

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