यह आर्यभूमि है, यहां होती आई है सिर्फ धर्म की जीत

कोई भी व्यवस्था है तो व्यवस्था बनाये रखने के लिए कोई व्यवस्थापक भी होगा। इस व्यवस्था के तंत्र को प्रशासन भी कह सकते हैं।

शासन है तो शासक भी होगा। और शासक शब्द के आते ही शासित होने का खतरा मंडराने लगता है। क्योंकि यही शासित शोषित बन सकता है।

इसी डर को दिखला दिखलाकर वामपंथियों ने प्रजा का खूब बौद्धिक दोहन किया और कई स्थानों पर सत्ता भी प्राप्त की। यह दीगर बात है कि फिर उन्होंने ही शोषण भी किया, बिलकुल किसी तानाशाह की तरह।

इसी कारण से वामपंथ दुनिया में अलोकप्रिय हो गया। यह शोषण का भाव ही है जो तानाशाही से जनता सर्वाधिक नफरत करती है। यही नहीं, कोई अन्य शासन तंत्र भी शोषण तंत्र में ना बदल जाए इसके लिए जनता सदा आशंकित भी रहती है।

दुनिया में मोटे तौर पर तीन तरह के शासन तंत्र हैं – राजतंत्र, तानाशाही और प्रजातंत्र। तानाशाही में तो शोषण होता ही है लेकिन राजतंत्र में भी इसके होने की सम्भावन हर काल में बनी रही। यही कारण रहा जो यह तंत्र भी दुनिया से ख़त्म हुआ।

अब बात करते हैं प्रजातंत्र की। इसमें भी शोषण की संभावना से इंकार नहीं कर सकते। इन तथ्यों के बीच, आज भी दुनिया में श्रीराम ही एकमात्र उदाहरण हैं जो राजतंत्र के होते हुए भी दुनिया के किसी भी प्रजातंत्र से अबतक अगर श्रेष्ठ हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनके काल में शोषण की संभावना ना के बराबर थी।

और यह न्यूनतम बनी रहे इसके लिए ही उन्होंने प्रजा के छोटे से छोटे हित के लिए भी अपना बड़े से बड़ा व्यक्तिगत अहित होना स्वीकार किया। यही कारण है जो वर्तमान के प्रजातंत्र के युग में भी रामराज्य की बात की जाती है।

एक प्राचीन तंत्र और होता था कबीला-तंत्र, यह राजतंत्र और तानशाह का मिश्रण है! यह दोनों से अवगुण लेता है। अरब की दुनिया में यह तंत्र अब भी प्रचलित है। जिसे देखकर इस तंत्र के बारे में आसानी से समझा जा सकता हैं। इसपर आगे कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।

राजतंत्र ने सबसे अधिक समय तक राज किया। इसलिए इसके निशान प्रजातंत्र में अब भी मिल जाते हैं। जैसे कि इंग्लैंड का राजपरिवार। वैसे राजतंत्र और तानाशाही में नज़दीक का रिश्ता रहा है, कोई भी राजा तानाशाही कर सकता है तो तानाशाही में भी राजतंत्र हो सकता है जैसे उत्तर कोरिया का तानाशाही परिवार।

चीन का वामपंथी शासन भी इन दोनों का ही मिश्रण है। एक ही पार्टी का शासन अर्थात तानाशाही हुई तो हर बार उसी पार्टी के मुखिया का शासन अर्थात राजतंत्र, जिसे यहां पार्टीतंत्र कह सकते हैं। यहाँ परिवारवाद की जगह पार्टीवाद ही वंशवाद का विकृत रूप हुआ।

बहरहाल, अन्य शासन तंत्र में प्रजा की भागीदारी नहीं होती इसलिए प्रजातंत्र को बेहतर माना गया। और कुछ नहीं तो कम से कम एक व्यक्ति या परिवार या पार्टी के हाथ में सत्ता तो नहीं रहेगी। जो फिर शासक को निरंकुश अर्थात तानाशाह बनने की राह पर आगे ले जाती है।

इसका ध्यान वैदिक सनातन की शासन व्यवस्था ने सदियों पहले ही रख लिया था। राजा के पास सत्ता तो होती थी मगर क़ानून बनाने का अधिकार राजऋषि के हाथ में होता था, यह सत्ता का संतुलन था।

हमने तो अपने ईश्वर में भी यह संतुलन रखा, जैसे कि ब्रह्मा के पास निर्माण तो विष्णु के पास संचालन और महेश के पास संहार। एक विधायिका, एक कार्यपालिका, एक न्यायपालिका। यह एक उदाहरण है, एक बार फिर आर्यों को श्रेष्ठ और उनके दर्शन की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए।

प्रजातन्त्र की बात आती है तो पश्चिम का उदाहरण दिया जाता है मगर मुझे यह अमेरिका में भी सीमित ही लगता है। क्योंकि वहां मूलतः टू पार्टी सिस्टम है। अब यह कैसा प्रजातंत्र है जिसमे आप बारी बारी से शासन कर रहे हैं।

माना कि अमेरिका ने एक राष्ट्रपति के दो से अधिक बार बनने की व्यवस्था ही नहीं, लेकिन पार्टी के स्तर पर तो प्रजातान्त्रिक अधिकार सीमित हो जाते हैं। इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि चीन में एक पार्टी है तो अमेरिका में दो। अर्थात अमेरिका में राजनैतिक शोषण की संभावना चीन से आधी ही तो हुई।

इस मामले में भारत में प्रजातंत्र उसके डीएनए में है। हमने कभी तानाशाही को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया। बल्कि उसका वध किया। रावण मारा गया तो सत्ता राम ने अपने पास नहीं रखी विभीषण को दी, बाली की जगह सुग्रीव बैठाये गए।

यह वही देश है जहां सत्ता का मोह परिवार का हर सदस्य त्यागने को तैयार हो जाए तो रामायण की रचना होती है और सत्ता के मोह में पड़ते ही महाभारत छिड़ जाती है।

श्रीकृष्ण ने कितने दुष्ट राजाओं का वध किया, चाहते तो चक्रवर्ती सम्राट बन जाते मगर अर्जुन के सारथी बन गए, किसलिए? धर्म की स्थापना के लिए।

तानाशाही नंदवंश को हटाया चाणक्य ने लेकिन सत्ता पर बैठाया चन्द्रगुप्त को। यहां एक बुद्ध ने सत्ता का त्याग किया तो उसी के मार्ग पर चलकर आज दुनिया में अनेक राष्ट्र उत्तम शासन चला रहे हैं।

तो सवाल उठता है कि क्या भारत ने अपना मूल चरित्र गंवा दिया? उत्तर की आवश्यकता नहीं क्योंकि प्रश्न ही आधारहीन है। जो राष्ट्र हज़ार साल की गुलामी में अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ पाया वो आज़ादी के बाद कैसे छोड़ सकता है।

अगर हम सत्य को देख नहीं पा रहे तो यह हमारी आँखों का धोखा है। यकीन नहीं होता तो भारत के सत्तर साल के इतिहास पर नजर डालें। अनेक रोचक घटनाक्रम हैं। यह देवभूमि है, किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखती, उसने अगर वामपंथियों को तीन दशक तक निर्विरोध सत्ता दी तो फिर उन्हें धीरे धीरे अप्रासंगिक भी कर दिया। असम से लेकर दिल्ली तक नए प्रयोग के नाम पर सत्ता के शीर्ष पर किसी को बिठाया और फिर असफल होते ही ज़मीन पर ला पटका।

वैसे सभी जीवित राजनीतिक पार्टियों का विश्लेषण करें तो बड़ा मज़ेदार चित्र उभरता है। यहां तीन तरह की पार्टियां मिलेंगी। एक है परिवार की पार्टी, एक है व्यक्ति की पार्टी, एक है प्रजातान्त्रिक पार्टी।

ध्यान से देखें तो जो भी परिवार की पार्टी है वो सब राजतंत्र का ही रूप है और जो व्यक्ति आधारित पार्टी है वो सब तानाशाही है। भारत में पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक में, सभी पार्टियां एक को छोड़कर, इसी दोनों वर्ग की मिलेंगी।

जो व्यक्ति आधारित पार्टियां हैं वो अगली पीढ़ी में परिवारवादी राजतंत्र में अपना नया रूप धरने का प्रयास करती हैं। मगर कई समय के साथ सत्ता के गलियारों में दफन हो गई और कई इस चुनाव में हो जाएंगी।

जो मैं देख पा रहा हूँ वो यह है कि अनेक राजपरिवार के बहादुरशाह ज़फर अपना अंतिम चुनाव लड़ रहे हैं, कई सूर्पणखाओं की नाक कटने वाली है तो कई होलिका अग्नि में राख हो जाएंगी। यहां कोई अयोग्य धृतराष्ट्र का अहंकारी दुर्योधन जीत नहीं सकता चाहे फिर शकुनि मामा कितने भी कपट भरे षड्यंत्र क्यों ना रच ले।

यह महादेव की भूमि है, शिशुपाल को 99 बार छोड़ सकते हैं तो अंत में मार भी सकते हैं। हम आर्यपुत्र हैं और यह आर्यभूमि है, यहां सिर्फ धर्म की जीत ही होती आई है। इस बार भी वही जीतेगा जो धर्म की चौकीदारी कर रहा होगा।

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