नुकसान 72 हज़ार से कई गुना ज़्यादा

आज से बराबर 2 साल पहले मैं यूरोप में था, कुछ ऑफिशियल काम से। मैडम ने भी कुछ दिनों के लिए जॉइन किया।

एक दिन ऑफिस के बाद ऐसे ही फ़्राइबर्ग शहर घूमने निकले। वहां 7 बजे के बाद खाने पीने के रेस्तरां, होटल्स के अलावा सब कुछ बंद हो जाता है।

घूमते घूमते एक Gem shop पर नज़र पड़ी। कांच के डिस्प्ले में कुछ महंगी रिंग्स, एंटीक घड़ियां और ऐसे ही कुछ महंगे आइटम रखे थे। एक अंगूठी की कीमत लगभग साढ़े सात हज़ार स्विस फ्रैंक थी।

भारतीय जब बाहर जाते हैं तो सबसे पहले किसी भी छपे मूल्य को रुपये में कन्वर्ट करते हैं, और यकीन मानिए तब हमारा गणित किसी आर्यभट्ट से कम नहीं होता। हमने भी कुछ 2 सेकण्ड्स में 65 से गुणा करके लगभग 5 लाख रुपये कीमत निकाली। उस कांच की खिड़की में लगभग 30 लाख तक का गहना और एंटीक्स थे, पूरे शोरूम में तो कहीं ज़्यादा होगा।

उनको निहारने के बाद हमारे दिमाग में सबसे पहले यह ही बात आई कि दुकान बंद है, अंदर जो एक लाइट चालू है वो पूरी इस डिस्प्ले पर ही फोकस की हुई है, ताकि लोग देखें। कैमरा या सीसीटीवी कोई दिखा नहीं, हो सकता है hidden हो।

पूरे स्विट्ज़रलैंड में आपको कहीं भी cctv कैमरा नहीं दिखेगा। एयरपोर्ट या ऐसी कुछ जगह पर hidden camera ज़रूर हो सकते हैं। उनका ये मानना है कि ऐसे कैमरे दिखने से जनता नाराज़ हो सकती है कि हम क्या कोई चोर हैं..?

उस शॉप से आगे बढ़ते काफी देर तक हम दोनों ये ही बात करते रहे कि ऐसा कुछ भारत में तो हो ही नहीं सकता। दुनिया भर के कैमरा, सिक्योरिटी होने के बाद भी चोरियां हो जाती है। गहनों की दुकानों से, कपड़ो की दुकानों से, डिपार्टमेंटल स्टोर से।

मैंने चार साल लक्ज़री रिटेल में काम किया है। हर एक स्टॉक ऑडिट में कुछ ना कुछ शॉर्टेज आती ही आती थी। सिक्योरिटी गार्ड्स और सब चौकस निगाहों के बावजूद। कभी कभी तो स्टोर के कर्मचारियों की मिलीभगत से भी (सारे ऐसे नहीं होते, पर फिर भी)।

कितने ही दुकानों में, स्टोर्स में और यहां तक कि मॉल्स में बड़े ही rude तरीके से लिखा तक होता है कि You are under surveillance… पर फिर भी लोग चोरी का कुछ न कुछ तरीका निकाल ही लेते हैं। यहां तक कि संभ्रांत घरों के लोग, औरतें तक भी चोरियां करती पकड़ी गई हैं।

कभी सोचा है, ऐसे चोरियां क्यों होती हैं..?

ये kleptomaniac behaviour कहीं न कहीं हमारे क्षय हो चुके आत्म-सम्मान से जुड़ा हुआ है। दरअसल हम सब कहीं ना कहीं एक चोर है। अब मुझ जैसे सैलरी वालों को चोरी का ज़्यादा मौका मिलता नहीं, तो हम मार्च में HRA की नकली रसीदें लगाकर व्यापरियों को गरियाते हैं (याद रखिये, मैंने कहा है मौका नहीं मिलता, नहीं तो नौकरीपेशा भी ना चूकें।)।

व्यापारी भी बढ़ते खर्चों और ‘मैं नहीं करूंगा, तो भी बाकी सब तो करेंगे ही’ वाले अंदाज़ का हवाला देकर चोरी करता है। चाहे ग्राहक से, चाहे सरकार से। कभी सोचा है कि हम सब, चाहे व्यापारी हों, नौकरीपेशा हों, किसान हों, हम सब चोरियां क्यों करते आये हैं..?

क्योंकि इस सबकी हमने स्वीकार्यता स्थापित कर दी है। क्यों हुआ ऐसा? क्योंकि हम अगर ईमानदारी से टैक्स भरें तो वो पैसा भी नेता, बाबू खा जाएंगे ये डर आज तक हमें ईमानदार बनने से रोकता आया है।

फिर क्या कारण है कि अचानक 2014 के 3.5 करोड़ इनकम टैक्स रिटर्न्स से हम 2018 में लगभग 7 करोड़ रिटर्न्स तक आ गए। सरकार हलक से निकाल लेगी, इस भय के अलावा एक विश्वास भी इन 5 सालों में आया है कि नहीं, चाहे थोड़ा ही सही पर मेरे टैक्स में पैसे से कुछ न कुछ तो देश हित में होगा।

आज जो इस बदलाव के पीछे बड़ा हिस्सा भय का है, अगर यहीं सकारात्मकता बनी रही तो सरकार में विश्वास इस भय का स्थान दिनोंदिन लेता जाएगा। जब हर दिन पिछले दिन से ज्यादा सड़कें बनती हों, जब विष्ठा से भरे रेलवे ट्रैक वाले बदबूदार रेलवे स्टेशन सुधरने लगें, कुछ तो घर से भी सुंदर लगने लगें, जब सरहद पर सिपाहियों को ढंग के हैलमेट, जैकेट यहां तक कि गर्मियों में कूलर तक मिलने लगें, नॉर्थईस्ट जैसे यतीम कर रखे हुए इलाकों को ब्रिज मिलने लगें तो देश की जनता को टैक्स भरते अफ़सोस नहीं होता।

5 सालों में आज 17 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन मिला है, 17 करोड़ में से 5 करोड़ ने पहली बार लोन लिया है। इनमें से कितनों ने ही एक आदमी और भी रखा होगा। यह सब इकॉनमी में निचले तबके या निम्न मध्यम वर्ग से होंगे, हो सकता है इनमें से कई इनकम टैक्स नहीं भरते होंगे। पर एक दिन शायद वहां तक भी पहुंचेंगे।

अगर सब ही कमाने लगे, तो देश की क्रय शक्ति बढ़ेगी, लोग चीजें खरीदेंगे, व्यापार बढ़ेगा, उद्योग बढ़ेगा, सरकार का इनकम टैक्स से डायरेक्ट या GST से इनडाइरेक्ट राजस्व बढ़ेगा।

2G, कॉमनवेल्थ, कोयला, ऑगस्टा, माल्याओं और लगड़पतियों (LANCO) को बांटी बंदरबांट देख चुकी जनता का आज सरकार में थोड़ा विश्वास फिर से जगा है, और सब ठीक रहा तो और बढ़ेगा। आज हर कोई aspirational है, आगे बढ़ना चाहता है।

और इस आगे बढ़ने की कामना का काट कांग्रेस ने 72,000 की मुफ़्तख़ोरी से निकाला है। 12 हजार हर महीने से 72000 हर साल, हर महीने और फिर 72000 करोड़, इस याद ना रहने वाले फरेब के मज़ाक को अलग भी रखें तो भी अब हर कोई गरीब बनना चाहेगा। There would be a race to be at the bottom…

जब मुफ्त ठाले निकम्मे बैठे आदमी को पैसे मिलने लगे तो काम करने वाला सोचेगा कि मैं क्यों तकलीफ पाऊँ? चिदंबरम ने इशारा दे दिया है कि ये सब टैक्स बढ़ाकर ही किया जाएगा।

जहां इन 5 सालों में इनकम टैक्स की दरें कम हुई, लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि आप टैक्स भरते हैं, आप इस देश की अर्थव्यवस्था, इसके आत्म-सम्मान की जड़ का एक मजबूत हिस्सा है; वहीं अब टैक्स भरने वाला मिडिल क्लास, व्यापारी, उद्योगपति कर चोरी की ओर सोचेगा।

और इस तरह से देश का Venezuelisation प्लान कर लिया गया है। पहले भी इस ‘गरीबी हटाओ’ के ढोंग से टैक्स रेट 97.5% के पीक तो पहुँच गयी थी, और जब सारा कमाया सरकार लेने लग जाये तो लोग सबसे पहले या तो कमाना ही बंद करेंगे, या इस कमाई पर टैक्स भरना।

दुनिया में सबसे ज्यादा proven oil reserves वाले देश वेनेज़ुएला में भी इस तरह से सबको सरकारी नौकरी, मुफ्त में हज़ारों और ऐसे मुफ्तखोरियों का लालच दिया गया। आज उस देश की हालत ये है कि 6 बार मिस यूनिवर्स जीतने वाले देश की 14-14 साल की लड़कियां ब्रेड के एक पैकेट के लिए कोलंबिया बॉर्डर पर शरीर बेचने को मजबूर है।

यहां आज हम लोगों के सामर्थ्य बढ़ाने की बात कर रहे हैं कि जो कभी डिपार्टमेंटल स्टोर से चोरी करते थे वो भी सामान खरीदने लगें, वहां आज सभी को वेनेज़ुएला जैसे बनाने की कोशिश है जहाँ अव्वल तो ऐसे स्टोर खाली हैं और जहां कुछ आता है तो तुरंत लुट जाता है। 72,000 से क्रयशक्ति बढ़ेगी पर उससे कहीं ज्यादा बढ़ेगी कामचोरी, करचोरी और निकम्मापन। गरीब दिखने की, और धीरे धीरे गरीब बनने की होड़।

और उससे सिर्फ़ महंगाई बढ़ेगी, मुफ्तखोरी बढ़ेगी और धीरे धीरे ही सही देश और सभ्यता का नाश निश्चित है।

नुकसान साल के 3 लाख 60 हजार करोड़ का ही नहीं, एक ‘पहले परिवार’ की सत्ता में बने रहने की लोलुपता के कारण उससे कहीं ज़्यादा का है – आपके जागते हुए आत्म-सम्मान के वापस खो जाने का है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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